ये थोड़ा रेयर किस्म का केस है, क्योंकि 20 हफ्ते से ज्यादा का भ्रूण हो तो अबॉर्ट कराने की परमिशन नहीं मिलती. इस केस में 21 हफ्ते में टेस्ट कराने पर पता लगा था कि भ्रूण का सिर नहीं है. लीगल अबॉर्शन से जुड़े जो नियम- कायदे हैं. बात उनकी निकली तो उन्हें जान भी लीजिए.अबॉर्शन से जुड़े कानून गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971 के अंडर आते हैं. 2002 तक आते-आते इसमें कुछ बदलाव हुए. क़ानून में साफ़ लिखा है. महिलाएं अबॉर्शन करा सकती हैं. बशर्ते कोई वाजिब वजह हो. डॉक्टर रजिस्टर्ड हो. वयस्क हों. अगर वयस्क हैं तो घर के किसी भी मेंबर की लिखित अनुमति नही चाहिए होगी. खुद का लिखा चलेगा. लेकिन जो महिला पागल हो या नाबालिग हो, उसके मां या बाप की परमिशन जरूरी है,कम उम्र में ब्याह दी गई हो तो पति का लिखा भी माना जाएगा. अबॉर्शन की वाजिब वजह भी जान लीजिए 1. प्रेग्नेंसी की वजह से फिजिकल या मेंटल ट्रॉमा झेलना पड़ सकता हो या जान का ख़तरा हो. मेन्टल ट्रॉमा में ये बात भी जोड़ी गई कि प्रेग्नेंसी रेप या कॉन्ट्रोसेप्टिव्स के फेल्योर की वजह से हुई हो. 2. बच्चा ऐसा पैदा होने वाला हो जो फिजिकली या मेंटली फिट न होगा. अस्पताल या तो सरकारी हो या क्लीनिक रजिस्टर्ड हो अबॉर्शन करने वाले डॉक्टर में ये योग्यताएं हों. 1. गायनोकॉलजिस्ट के पास मास्टर्स डिग्री हो. 2. गायनोकॉलॉजी के क्षेत्र में तीन साल का एक्सपीरियंस हो. 3. डॉक्टर ने इस क्षेत्र में छह महीने हाउस जॉब किया हो. ध्यान रखें दो बातें गांठ बांध लीजिए, सामान्य अबॉर्शन प्रेग्नेंसी के बारह हफ्ते के अंदर किया जा सकता है. भ्रूण अगर बारह हफ्ते से ज्यादा और बीस हफ्ते से कम का हो तो उसे दो डॉक्टरों की सलाह के बाद ही अबॉर्ट किया जा सकता है. अबॉर्शन के लिए महिला की अनुमति जरूरी होती है. जबरिया अबॉर्शन पर आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा दी जा सकती है. बात भ्रूण की चली तो ये खबर भी पढ़ी जानी चाहिए.
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