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अफज़ल गुरु के बेटे और बुरहान वानी के भाई ने वो किया है जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते

इन दोनों लड़कों ने हिंदुस्तान के हर बच्चे के लिए नज़ीर पेश की है.

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बुरहान वानी और अफजल गुरु अक्सर खबरों में रहते हैं. अपनी मौत के बाद भी. अक्सर इनका जिक्र आता है. आज जिक्र इनके करीबी रिश्तेदारों का है. इन्होंने हमें मुस्कुराने और फील गुड करने की एक बड़ी प्यारी वजह दी है.
11 जनवरी, 2018 को कश्मीर में 12वीं के नतीजे आए. एक ग़ालिब गुरु नाम के लड़के को 88 फीसद नंबर मिले. 500 में 441 नंबर. डिस्टिंक्शन. ग़ालिब को 10वीं में भी डिस्टिंक्शन मिला था. इस ग़ालिब को आप शायद नहीं जानते. मगर इसके पापा को आप यकीनन पहचानते होंगे. अफजल गुरु. 13 दिसंबर, 2001 को संसद पर हुए आतंकी हमले का दोषी. जिसे 9 फरवरी, 2013 को फांसी दी गई.
जम्मू ऐंड कश्मीर बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन ने 12वीं की परीक्षा का रिजल्ट निकाला. इस लिस्ट में एक और 'खास' नाम शामिल है. मुहम्मद नवीद आलम. हो सकता है कि आपने नवीद का भी नाम कभी न सुना हो. मगर उसके बड़े भाई का नाम जरूर सुना होगा. बुरहान वानी. हिजबुल मुजाहिदीन का कमांडर. जो मुठभेड़ में मारा गया. बुरहान की मौत के बाद कश्मीर ऐसा सुलगा कि तपिश अब तक बनी हुई है.
आतंकवादियों के रिश्तेदारों, भाई-बेटों पर खबर खर्च करने का क्या तुक है?
हम और आप अफजल को क्या मानते हैं, ये अलग बात है. एक बेटे के तौर पर ग़ालिब अपने पिता से प्यार करता होगा. बाप की मौत उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी ट्रेजडी होगी.
हम और आप अफजल को क्या मानते हैं, ये अलग बात है. एक बेटे के तौर पर ग़ालिब अपने पिता को अलग तरीके से देखता होगा. बाप की मौत उसके लिए बहुत बड़ी ट्रेजडी होगी. इस दर्द से उबरकर डॉक्टर बनने की राह चुनना, उसके इरादों की तारीफ होनी चाहिए.

इतने दर्द के बावजूद इतना सामान्य हो पाना आसान नहीं है हर चीज को देखने की एक लकीर होती है. या तो आप उस लकीर के इस ओर होते हैं. या फिर उस ओर. आप किस ओर हैं, ये दिशा सोच तय करती है. हमारे लिए अफजल गुरु आतंकवादी है. मगर ग़ालिब गुरु के लिए अफजल गुरु उसके अब्बू थे. उसने बहुत कुछ सुना होगा अपने पिता के बारे में. आतंकवादी और बहुत कुछ. कश्मीर में रहता है, तो हमदर्दी की बातें भी सुनी होंगी. ये उसके लिए आसान नहीं रहा होगा. उसने अपने पिता को खोया था. गुस्सा रहा हो अंदर, ये स्वाभाविक है. इतने मार्मिक अतीत के बावजूद इतनी सामान्य जिंदगी जीना और उसमें उपलब्धियां हासिल करना, ये कतई आम नहीं है.
हमने अच्छे-खासे डॉक्टरों, इंजिनियरों को हथियार उठाते देखा है. अच्छी-खासी आराम की जिंदगी जी रहे लोगों के एकाएक आतंकवादी बनने का किस्सा सुना है. उनके साथ कोई हादसा नहीं हुआ होता. कोई ट्रैजडी नहीं हुई होती. ग़ालिब ने जो खोया, जो तकलीफ महसूस की, वो उसकी चॉइस नहीं थी. उसे वो दर्द मिला. इसमें उसका कोई हाथ नहीं था. मगर आज वो जो कर रहा है, ये उसकी चॉइस है. ग़ालिब डॉक्टर बनना चाहता है. AIIMS आकर पढ़ना चाहता है. लोगों का इलाज कर उनकी जान बचाना चाहता है. ऐसे हालातों में जीने के बाद भी कोई इतना इंसान बना हुआ, ये कोई साधारण बात नहीं.
हजारों कश्मीरी युवा बुरहान का पोस्टर थामे उसके जैसा बनने की कसम खा रहे थे. जब गैर बुरहान जैसा बनना चाह रहे हों, तब उसका अपना छोटा भाई अलग राह चुनता है. ये तो नजीर हुई.
हजारों कश्मीरी युवा बुरहान का पोस्टर थामे उसके जैसा बनने की कसम खा रहे थे. जब गैर बुरहान जैसा बनना चाह रहे हों, तब उसका अपना छोटा भाई अलग राह चुनता है. ये तो नजीर हुई.

बुरहान वानी का छोटा भाई होना भी कतई आसान नहीं है इसीलिए आज नावेद आलम का भी जिक्र है. अगर आपके होने की सबसे बड़ी पहचान 'बुरहान वानी का भाई होना' हो, तो स्थितियां कैसी होती हैं, इसकी कल्पना कर पाना मुश्किल है. ऊपर से तब, जब आप कश्मीर में रहते हों. जब बुरहान की मुठभेड़ में मौत हुई, तो लगा पूरा कश्मीर बिफर पड़ा. हमारे लिए बुरहान आतंकवादी है. मगर कश्मीर में कई लोगों के लिए वो उनका 'शहीद' है. बुरहान की मौत के बाद कश्मीर में स्थितियां बहुत बिगड़ गईं. पांच महीने तक कश्मीर लगातार सुलगता ही रहा. करीब 92 लोग मारे गए. 12,000 से भी ज्यादा लोग घायल हुए. जुलाई 2016 में हुई बुरहान की मौत का जिक्र कश्मीर में कमोबेश हर दिन होता है. चर्चा तो उसका पाकिस्तान में भी होता है. हाफिज सईद जैसे आतंकवादी उसे हीरो बनाते हैं. पाकिस्तानी हुकूमत उसका नाम लेती है. ये सब मिलाकर अपने दिमाग में बुरहान वानी के छोटे भाई की तस्वीर बुनिए. उस तस्वीर में शायद आप पढ़ाई-लिखाई की कल्पना नहीं कर पाएंगे. शायद आपको ये जमेगा नहीं. मगर सच ये ही है. नावेद आलम डिस्टिंक्शन से परीक्षा पास कर रहा है. वो कुछ बनना चाहता है. इसका मतलब है कि उसे सिस्टम पर भरोसा है.
इसका श्रेय हम नहीं ले सकते, ये हमें किस्मत से मिली है ग़ालिब और नावेद, दोनों की कहानी सुनाई जानी चाहिए. इन दोनों की कामयाबी के पीछे इनके परिवार का भी हाथ है. उन्हें हौसला देने, संभालने का जिम्मा उनका ही था. उन्होंने बड़ी खूबसूरती से ये जिम्मेदारी निभाई. ग़ालिब और नावेद की कामयाबी इस सिस्टम की भी कामयाबी है. लेकिन सिस्टम उनकी सफलता का श्रेय नहीं ले सकता. उसे ये किस्मत से मिला है. सारा श्रेय इन दोनों लड़कों को मिलना चाहिए. उनकी ये कामयाबी बड़ी अनमोल है.
हिंदुस्तान नाम का जो ये लोकतंत्र है, उसके लिए उसका 'हासिल-ए-दिन' है ये.


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