चैत के बादलमुंह अन्हारेसन्न मारेगांव में माया पसारेकहां से उपरा गएभड़ुए, अघी ये चैत के बादल!बालियों से झुकी-झपकी-पकीधरती संपदा कागेहूंआई आंचलइनकी कृपा पर छोड़कर आश्वस्त होनाभूल होगीइनका, कौन थाया, क्या ठिकाना?बिदबिदाएंगेया पाथर छरछराएंगेछिनगाएंगे पल्लवबालियों से अन्न झारेंगेया करेंगे कुदिनपशु-परानी के लिए पितकोपरोग फैलाएंगेबौर लसियाएंगेलगने नहीं देंगे टिकोरेउखमजी व्यवहार सेमाघ मेंजब सींचना थातब नहीं लौकेजब बयाना हो गई घर की मसूरजब फ़सल पक कर हुई तैयारतब फूंकने खलिहानआए हैंराशि की राशि सड़ाने, गड़गड़ानेचौधराहट दिखानेचैत केइन गीदड़ रोएं बादलों को देख करयाद आते हैंभाद्रपद के वे घने काले मतंगों की तरहमेल्हते, एंडते, मुड़ियाए चले जातेसघन-घन, पनिगर और बतधरखन-खन बदलते रंगचैत केइन नाटकी, मोघी, छछन्नी बादलों को देख करयाद आते हैंवर्ष-वर्षों से तृषितचातकों कोदो बूंद पानीहाथ से अपने पिलातेशरद के शुभ्राभ्र वे सितकेशपितृव्य जैसेस्नेह से भीगे नयन, करुनाअयनभरे परसंताप सेये मिटाने पर उतारूगरल जैसा जल उगलने को विकलचैत केइन कामरूपी बादलों को देख करयाद आते हैंपौष के पीयूषवर्षी मेघजिनका एक लहरा हीफ़सल की डीभियों कोफुन्न रखने के लिएसींक में सद्भाव भरने के लिएदूध से भी अधिक लगता हैवैसे, चैत के इन बादलों काजन्म, इनका कर्मबनना या बिगड़ना, घिरना या घरानानिर्भर हवा पर, हवा के रुख़ परहवा की प्रकृति परकभी पुरबा चलीतो चढ़ गए दोखीलगे बढ़ने, घुमड़ने, घेरने आकाशक्षण में छा गएथोबड़ा दिखाने आ गएकिन्तु उल्टे खींच कर पछुआ चलीतो लगे छंटने, छनमनानेमुंह बनानेइधर आने, उधर जानेजैसे ओसाई जा रही हो राशिऔर भूसा उड़ रहा हो दूर जाकरकहीं पूरब के क्षितिज परद्वादशी का चांदचांदी की नई सेई बनारख उठा आकाश के खलिहान मेंऔर तारे मटर के दानों सरीखेछितरा गये खलिहान मेंकट गयेये चैत के बादलहट गयेये चैत के बादलछंट गयेये चैत के बादल!- अष्टभुजा शुक्ला
ये कौन सा बादल है जिसे देख देस उदास हो जाता है
न कालिदास की तरह प्रेमी का ध्यान. न सलीमा वाले सलीम की तरह दर्शन और भावुकता की बहकी सी बातें. ठसपना.
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फोटो - thelallantop
एक कवि हैं. और चूंकि कवि हैं, तो हमेशा ही रहेंगे. अष्टभुजा शुक्ल. देखेंगे तो सोचेंगे. कोई किसान है. या प्राइमरी का मास्टर. या किसी दोस्त के पापा. जो शहर के चक्कर में जड़ नहीं हुए. जड़ें बचाए रखीं. खादी का कुर्ता पहनते हैं. मिजाज बोरे सा है. चमक से दूर. मगर एक एक तागा गेंहू को बचाकर रखता. ताकि पेट जब भूखा हो तो उलीच सके. गर्माहट भरी रोटी. अष्टभुजा शुक्ला की कविता दिल्ली की बिल्लियों को ध्यान में रख अपना छींका नहीं फोड़ती. खरी खरखरी है. इसलिए उसकी जरूरत आज आधुनिक भक्तिकाल में और ज्यादा है. अब इसे ही देख लीजिए. बादलों पर कविता. न कालिदास की तरह प्रेमी का ध्यान. न सलीमा वाले सलीम की तरह दर्शन और भावुकता की बहकी सी बातें. ठसपना. स्वारथ, पर अकारथ नहीं. इसे वो सबसे ज्यादा समझ सकते हैं, जिन्होंने, जिनके बाप दादाओं ने, मांओं ने, बहनों ने कभी गेहूं बोया हो. चना, मसूर बोई हो. और फिर बनरोजों से रखवाली करते हुए चैत बैसाख का इंतजार किया हो. सोना काटने के लिए. हंसिए से. सरपट-झटपट. पर आजकल क्या है. पूस चल रहा है. आग लगे बादलों को. मुंह सुजाए सूखे से बैठे हैं. बरस नहीं रहे. दो दो बार पलेवा हो चुका है. और अभी न बरस कहीं चैत में बरस गए, तो बचा खुचा नाश भी हो जाएगा. छोटे किसानों की तो बिना मरे मौत है. इन सबके बीच क्या है. तसल्ली. एक दूसरे को. कि सब बीतने के बाद भी होना बचा रहेगा. और उसके लिए हर जतन भी. उसी तसल्ली का एक तरीका है ये. अष्टभुजा शुक्ला की कविता. पर लल्लन, आज अचानक उनका जिक्र क्यों. क्योंकि खाद बनाने वाली कोऑपरेटिव संस्था इफको ने उन्हें इज्जत दी है. इफको वाले एक अवॉर्ड देते हैं. लिटरेचर की फील्ड में. श्रीलाल शुक्ल की स्मृति में. श्रीलाल जी वही राग दरबारी वाले. और इस बार ये सम्मान अष्टभुजा शुक्ल जी को देना तय हुआ है. इसी महीने की 31 तारीख को. कहना न होगा कि दिल्ली में.
अब आप कविता बांचिए.
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