सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने एक बार फिर कर्नाटक हाई कोर्ट जज के रूप में एडवोकेट नागेंद्र रामचंद्र नाइक (Nagendra Ramchandra Naik) के नाम की सिफारिश की है. 10 जनवरी को कॉलेजियम की एक बैठक हुई. चीफ जस्टिस (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में कॉलेजियम ने पांच हाई कोर्ट में जजों के लिए 9 नामों की सिफारिश की. इनमें से 7 ज्यूडिशियल ऑफिसर हैं और दो वकील हैं. सबसे ज्यादा चर्चा एडवोकेट नागेंद्र रामचंद्र नाइक के नाम की है.
कॉलेजियम की तीन सिफारिश के बाद भी सरकार वकील रामचंद्र नाइक को हाई कोर्ट जज क्यों नहीं बना रही?
पहली बार अक्टूबर 2019 में रामचंद्र नाइक के नाम की सिफारिश हुई थी.


कॉलेजियम ने सबसे पहले 3 अक्टूबर 2019 को नाइक के नाम की सिफारिश सरकार के पास भेजी थी. लेकिन सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया था. इसके बाद दो बार उनके नाम को दोबारा भेजा गया. पहले 2 मार्च 2021, फिर एक सितंबर 2021 को. लेकिन सरकार ने सिफारिश को नहीं माना. लंबे समय तक पेंडिंग रहने के बाद सरकार ने उनके नाम को लौटा दिया था. जबकि नियमों के मुताबिक सरकार सुप्रीम कोर्ट की सिफारिशों को मानने के लिए बाध्य है.
रामचंद्र नाइक सीनियर वकील हैं. कर्नाटक हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं. कर्नाटक के भटकल के रहने वाले हैं. कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में सीबीआई के वकील रह चुके हैं. अक्टूबर 2019 में नाइक के साथ आठ वकीलों के नाम की सिफारिश हुई थी. सरकार ने नाइक को छोड़कर बाकी सबको बतौर जज नियुक्त किया था.
नियम ये है कि सुप्रीम कोर्ट की सिफारिश को एक बार सरकार वापस कर सकती है और उस पर पुनर्विचार की गुजारिश कर सकती है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट सिफारिश को दोहराता है तो उस नाम को जज नियुक्त करना ही पड़ता है. कॉलेजियम की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस करते हैं. उनके अलावा चार और सीनियर जज होते हैं. अप्रैल 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर कॉलेजियम आम सहमति किसी सिफारिश को दोहराता है तो तीन से चार हफ्तों में जज की नियुक्ति करनी चाहिए. यानी सिफारिश को दोहराने के बाद सरकार के पास कोई विकल्प नहीं बचता है. सरकार कॉलेजियम की सिफारिशों को मानने के लिए बाध्य है.
पिछले दिनों कॉलेजियम सिस्टम को लेकर सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच विवाद भी सामने आया था. केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने अक्टूबर 2022 में कहा था कि जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम व्यवस्था से देश की जनता खुश नहीं है. उन्होंने सीधे-सीधे कहा था कि भारत को छोड़कर दुनिया में कहीं भी ये प्रथा नहीं है कि "जज अपने भाइयों को जज नियुक्त करते हैं."
कॉलेजियम को लेकर विवाद पहले भी हुआ था. मोदी सरकार ने पहले कार्यकाल में संविधान संशोधन करते हुए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) बनाया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संविधान संशोधन विधेयक को रद्द कर दिया था. कोर्ट ने कहा था कि इस व्यवस्था से न्यायपालिका की स्वतंत्रता में खलल बढ़ेगी. क्योंकि इस आयोग में CJI और दो अन्य वरिष्ठतम जज और केंद्रीय कानून मंत्री के साथ-साथ दो ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्ति को शामिल करना था जिनका चुनाव प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता की दो-सदस्यीय समिति करती.
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