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अंडरग्राउंड रहे, नाम बदला... जान से मारने के फतवे के बाद ऐसी रही सलमान रुश्दी की जिंदगी

ईरान के सुप्रीम लीडर ने 1989 में रुश्दी को जान से मारने का फतवा निकाला था. अभी उनकी हालत गंभीर बनी हुई है.

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बाएं से दाएं. Salman Rushdie और न्यूयॉर्क में उनके ऊपर हुआ हमला. (फोटो: सोशल मीडिया)

भारतीय मूल के जाने माने लेखक सलमान रुश्दी (Salman Rushdie) की हालत गंभीर बनी हुई है. उनके ऊपर 12 अगस्त को न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम के दौरान हमला हुआ. हमलावर ने उनकी गर्दन और पेट पर चाकू से वार किया. आशंका जताई जा रही है कि रुश्दी अपनी एक आंख खो सकते हैं. वहीं उनके लीवर में भी गंभीर चोट है. हमलावर की पहचान 24 साल हादी मतार (Hadi Matar) के तौर पर हुई है. पुलिस का कहना है कि वो हमले के पीछे के मंसूबे का पता लगाने की कोशिश कर रही है.

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Salman Rushdie के खिलाफ फतवा

सलमान रुश्दी के खिलाफ 80 के दशक में फतवा निकाला गया था. ये फतवा उनके उपन्यास 'सैटनिक वर्सेस' के बाद निकाला गया था. ईरान के तत्कालीन सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खोमिनी ने रुश्दी को जान से मारने के लिए कहा था. इस फतवे के बाद से रुश्दी लगातार सुरक्षा के बीच रहे. उन्हें छिपकर रहना पड़ा. अपना नाम बदलकर भी.

सलमान रुश्दी का जन्म 19 जून 1947 को बॉम्बे में हुआ. रुश्दी ने अपनी शुरुआती पढ़ाई बॉम्बे में की. आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए. वापस आए तो पाकिस्तान में अपने परिवार के साथ रहने लगे. उनका परिवार पाकिस्तान चला गया था. बाद में वो हमेशा के लिए यूके में ही बस गए. रुश्दी ने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से इतिहास की पढ़ाई की और 70 के दशक से ही लेखन शुरू कर दिया. उनका पहला उपन्यास ग्रिमस 1975 में प्रकाशित हुआ था.

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1981 में उन्हें उनके दूसरे उपन्यास 'मिडनाइट्स चिल्ड्रेन' के लिए बुकर प्राइज से सम्मानित किया गया. साल 1988 में उनका उपन्यास 'सैटनिक वर्सेस' प्रकाशित हुआ. इसे तुरंत बांग्लादेश, पाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका और दूसरे देशों में बैन कर दिया गया. भारत ने भी इसके आयात पर रोक लगा दी. एक साल बाद 1989 में ईरान ने रुश्दी को मारने का फतवा निकाला.

इस फतवे के बाद सलमान रुश्दी अंडरग्राउंड हो गए. उन्होंने अपना नाम जोसेफ एंटन रख लिया. एक साल बाद 1990 में रुश्दी का एक निबंध प्रकाशित हुआ. इस निबंध में उन्होंने अपने उपन्यास को सही बताया. 1995 में रुश्दी लंदन में सार्वजनिक तौर पर सामने आए. फतवा जारी होने के बाद उन्होंने पहली बार ऐसा किया.

Salman Rushdie का विरोध

साल 1999 में भारत सरकार ने रुश्दी को वीजा दिया. इस कदम के खिलाफ मुस्लिम समुदाय के लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया. साल 2005 में कश्मीर के बारे में उनका एक उपन्यास 'शालीमार द क्लाउन' प्रकाशित हुआ. दो साल बाद यानी 2007 में यूनाइटेड किंगडम की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने उन्हें नाइट की उपाधि दी. इसके खिलाफ पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शन हुए.

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साल 2008 में रुश्दी के उपन्यास 'मिडनाइट्स चिल्ड्रेन' को बुकर ऑफ बुकर्स चुना गया. उनके उपन्यास को पिछले 40 साल का सबसे बेहतरीन बुकर विजेता उपन्यास माना गया. इसके लिए वोटिंग हुई थी. एक साल बाद यानी 2009 में ईरान की तरफ से कहा गया कि रुश्दी के खिलाफ निकाला गया फतवा अभी भी बना हुआ है.

साल 2012 में रुश्दी ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल होने के प्लान को रद्द कर दिया. ये फैसला मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों के प्रदर्शन के बाद लिया गया. इसी साल रुश्दी ने जोसेफ एंटन प्रकाशित किया. ये एक संस्मरण है. जो रुश्दी के अंडरग्राउंड जीवन के बारे में बताता है.

साल 2014 में सलमान रुश्दी को फ्रीडम ऑफ स्पीच के समर्थन के लिए पिंटर प्राइज मिला. अगले साल यानी 2015 में रुश्दी फ्रैंकफर्ट बुक फेयर में शामिल हुए. इस दौरान उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे पर बात की. इस फेयर से ईरान ने अपना बुक स्टैंड हटा दिया. ऐसा रुश्दी के शामिल होने की वजह से किया. साल 2016 में रुश्दी को अमेरिकी नागरिकता मिली. उन्हें न्यूयॉर्क में रहते हुए 20 साल हो चुके थे. साल 2020 में उन्हें फिर से बुकर प्राइज के लिए नामित किया. दो साल बाद उन्हें यूनाइटेड किंगडम में कंपेनियन ऑफ ऑनर से नवाजा गया. 

वीडियो- स्पीच देते सलमान रुश्दी पर अमेरिका में जानलेवा हमला, हमलावर पर क्या पता चला?

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