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सबरीमाला मंदिर: जहां पीरियड्स वाली महिलाएं नहीं जा सकतीं, पूरे विवाद की कहानी

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर विवाद से जुड़ी सभी याचिकाओं को 7 अप्रैल से सुनने का फैसला किया है. 9 जजों की बेंच रिव्यू पिटीशन पर सुनवाई करेगी.

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सबरीमाला मंदिर. (फोटो- keralatourism.org)

1 जनवरी, 2019. केरल के कासरगोड से तिरुअनंतपुरम तक महिलाएं ह्यूमन चेन बनाकर खड़ी थीं. करीब 620 किलोमीटर लंबी ह्यूमन चेन. ये महिलाएं सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के समर्थन में आई थीं.

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दूसरी तरफ उसी दिन सबरीमाला मंदिर को जाते चढ़ाई वाले रास्ते पर हिंदू संगठनों के कार्यकर्ता जमा थे. वो उस परंपरा को बचाने के लिए खड़े थे, जिसका सदियों से गुणगान किया जा रहा था.

तारीख बदली. 2 जनवरी, 2019. तड़के 3 बजकर 45 मिनट का समय था. भयानक भीड़ और हिंदू संगठनों की निगरानी से बचते हुए बिंदु और कनकदुर्गा नाम की दो महिलाओं ने वो कर दिया जो इतिहास में किसी ने नहीं किया था. दोनों सबरीमाला मंदिर में पहुंचीं, भगवान अयप्पा के मंदिर ना सिर्फ प्रवेश किया और गर्भगृह तक पहुंचने में कामयाब रहीं.

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इतना बवाल तब हो रहा था, जब 3 महीने पहले सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने सबरीमाला मंदिर में सभी महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी दे दी थी. ये सारा घटनाक्रम इसलिए दोहराया जा रहा है क्योंकि सबरीमाला मंदिर विवाद पर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने जा रही है. कोर्ट में रिव्यू पिटीशन पर सुनवाई होगी.

CJI जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की तीन जजों की बेंच ने कहा कि CJI एक एडमिनिस्ट्रेटिव ऑर्डर के ज़रिए 9 जजों की बेंच को अलग से नोटिफाई करेंगे.

केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का समर्थन किया है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से कहा, "हम रिव्यू का समर्थन कर रहे हैं. इसे रिव्यू करने की ज़रूरत है..."

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सबरीमाला मंदिर के बारे में

केरल के सबरीमाला मंदिर में भगवान अयप्पा की पूजा होती है. भगवान अयप्पा को ‘हरिहरपुत्र’ भी कहा जाता है. उन्हें भगवान शिव और भगवान विष्णु के मोहिनी रूप का पुत्र माना जाता है. श्रद्धालुओं के 41 दिन का व्रत रखकर, काले कपड़े पहनकर और कठिन यात्रा कर भगवान अयप्पा के दर्शन करने की मान्यता है.

मंदिर में कुछ कड़े नियम हैं. भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी माना जाता है. इसी वजह से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर शुरू से ही विवाद रहा है. 1991 में हाई कोर्ट ने 10-50 साल की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश पर रोक लगा दी थी. बाकी उम्र की महिलाओं को जाने की इजाजत दी गई. यही विवाद है. कि सभी महिलाओं को मंदिर में जाने की इजाजत मिलनी चाहिए. जबकि मंदिर प्रशासन और हिंदू वादी संगठन इसका मुखर विरोध करते हैं कि जिन महिलाओं को पीरियड्स आते हैं वे मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकतीं.

BBC की रिपोर्ट के मुताबिक बिंदु और कनकदुर्गा ने जब 2019 मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश किया था, तब एक की उम्र 40 बरस थी और दूसरी की एक साल और कम. मंदिर में प्रवेश के बाद कनकदुर्गा को उनकी सास ने बेरहमी से पीटा था. उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा था. जबकि बिंदू पर कम से कम तीन बार हमला किया गया.

सबरीमाला मंदिर विवाद का इतिहास 

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर बहस 1990 में शुरू हुई थी. तब महिलाओं की एंट्री पर पूरा बैन लगाने के लिए केरल हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी. हाई कोर्ट ने 1991 में फैसला सुनाया, लेकिन सभी महिलाओं की एंट्री को बैन नहीं किया. हाई कोर्ट ने 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पर प्रतिबंध लगा दिया.

2006 में मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा. 2008 में केस तीन जजों की बेंच के पास भेजा गया. 2016 में केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वो मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में है. अप्रैल 2017 में केरल सरकार अपने पुराने बयान से पलट गई. सरकार ने कहा कि वो भक्तों के धार्मिक अधिकार की रक्षा करने के पक्ष में है.

2018 में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच ने इस मामले की सुनवाई शुरू की. 28 सितंबर 2018 को 4-1 के मत से महिलाओं के प्रवेश को जायज ठहराया गया. और महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दे दी. अक्टूबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर रिव्यू पिटीशन दायर किया गया. सुप्रीम कोर्ट को 15 नवंबर 2019 को इस याचिका पर फैसला सुनाना था. उन्होंने 3-2 के मत से इस केस को बड़ी बेंच के पास रेफर कर दिया. 10 फरवरी, 2020 को तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली 9 न्यायाधीशों की पीठ ने माना कि समीक्षा याचिकाएं स्वीकार्य हैं.

लेकिन बड़ी बेंच में सुनवाई हो ही नहीं पाई. अब सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर विवाद से जुड़ी सभी याचिकाओं को 7 अप्रैल से सुनने का फैसला किया है. CJI की बेंच को गठित करेंगे. तीन जजों की बेंच ने कहा है कि कोर्ट के फैसले पर रिव्यू का समर्थन करने वाली पार्टियां 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक अपनी दलीलें देंगी. और इसका विरोध करने वाली पार्टियां 14 से 16 अप्रैल तक अपनी दलीलें पेश करें. बेंच ने कहा कि वह 21 अप्रैल को जवाबी दलीलें सुनेंगी और कोर्ट संभवतः 22 अप्रैल को सुनवाई खत्म कर लेगा.

केरल सरकार क्या कहती है?

केरल के लॉ मिनिस्टर और CPI(M) लीडर पी राजीव ने मीडिया को बताया कि LDF सरकार “हमेशा आस्था की रक्षा के लिए खड़ी रहेगी”. उन्होंने कहा

“सरकार भक्तों की आस्था की रक्षा के लिए खड़ी है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में क्या स्टैंड लेना है, इस पर फैसला करने के लिए काफी समय है. यह एक मुश्किल संवैधानिक मुद्दा है और एक मिनट में फैसला नहीं लिया जा सकता. यह ‘हां’ या ‘नहीं’ कहने की सिचुएशन नहीं है.”

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक इससे पहले, CPI(M) के स्टेट सेक्रेटरी एम वी गोविंदन ने कहा, 

“सबरीमाला मुद्दे पर, सरकार और पार्टी का स्टैंड ज़रूरी नहीं कि एक जैसा हो. सरकार का हमेशा अपना स्टैंड होगा.”

CPI(M) लीडरशिप के इस रुख से विपक्ष को आलोचना का मौका मिल गया. विधानसभा में UDF के विपक्ष के नेता (LoP) वी डी सतीशन ने कहा कि राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट में अपने पहले के एफिडेविट को ठीक करना चाहिए, जिसमें उसने पहाड़ी मंदिर में जवान महिलाओं के प्रवेश का समर्थन किया था. 

वहीं BJP के स्टेट प्रेसिडेंट राजीव चंद्रशेखर ने कहा कि यह मामला भी LDF सरकार के “यू-टर्न” लेने का फैसला का एक उदाहरण है. उन्होंने कहा, “आने वाले असेंबली इलेक्शन को देखते हुए, सरकार कोई भी स्टैंड ले सकती हैं. हम अंदाज़ा नहीं लगा सकते.”

अगले दो से तीन महीने बाद केरल में चुनाव होने हैं.

वीडियो: सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर सुनवाई हो रही है

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