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पति-पत्नी ने साथ में जान देने का प्रण लिया, गांव में मेला लग गया, वजह हैरान कर देगी!

इस मौत के इंतजार को शोक नहीं बल्कि 'उत्सव' की तरह मनाया जा रहा है.

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83 साल के पुखराज संखलेजा (फोटो- आज तक)

हेडिंग पढ़कर आप समझ गए होंगे कि खबर एक दंपती की है जो प्राण त्याग रहे हैं. लेकिन साथ में जान क्यों दे रहे हैं? वजह है उनकी आस्था. राजस्थान के बाड़मेर जिले में इन दिनों इसी बुजुर्ग दंपती को देखने के लिए लोग हर दिन जमा हो जा रहे हैं. दंपती पिछले 18 दिन से भोजन-पानी छोड़कर मरने का इंतजार कर रहे हैं. जी हां. उनका भरोसा है कि इससे उन्हें "मोक्ष की प्राप्ति" होगी. दंपती जैन समुदाय के हैं. जैन धर्म में स्वेच्छा से इस तरह जान देने की प्रथा को संथारा कहते हैं. इस पूरी प्रथा को शोक नहीं बल्कि 'उत्सव' की तरह मनाया जा रहा है.

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दंपती को देखने पहुंच रहे जैन धर्म के लोग 

आज तक से जुड़े दिनेश बोहरा की रिपोर्ट के मुताबिक, बाड़मेर के जसोल गांव के रहने वाले पुखराज संखलेजा कुछ दिन पहले बीमार पड़े थे. पुखराज 83 साल के हैं. 7 दिसंबर को उन्हें हार्ट अटैक आया था. जोधरपुर के अस्पताल में इलाज चला. ठीक होने के बाद 27 दिसंबर को अस्पताल से वापस लौटे. घरवालों ने धूमधाम से उनका स्वागत किया. लेकिन अपने फैसले से परिवार के लोगों को चौंका दिया. अगले ही दिन उन्होंने भोजन-पानी छोड़कर संथारा लेने का फैसला कर लिया. जैनमुनि सुमित ने उन्हें यह संथारा ग्रहण करवाया.

इसके बाद पुखराज की पत्नी गुलाबी देवी ने भी संथारा अपनाने का फैसला किया. 6 जनवरी को गुलाबी ने जैन आचार्य महाश्रवण से संथारा लिया. दंपती के फैसले के बाद उनके रिश्तेदार वहां पहुंच गए हैं. जैन धर्म के कई लोग रोज उनके दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं. उनके घर पर एक पोस्टर भी लगा है. जिसमें पुखराज संखलेजा को ‘संथारा साधक’ और गुलाबी देवी को ‘संथारा साधिका’ बताया गया है.

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रिपोर्ट के मुताबिक, जसोल में रहने वाले जैन समुदाय के बीच संथारा काफी चलन में है. पिछले दो दशक में 20 से ज्यादा लोगों ने संथारा ग्रहण किया है. ज्यादातर बुजुर्ग लोग ही ऐसा फैसला लेते हैं. ये प्रथा लंबे समय से चली आ रही है.

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है संथारा का मामला

कुछ साल पहले इस प्रथा को लेकर काफी विवाद हुआ था. कुछ लोगों ने इसे "आत्महत्या" बताते हुए कोर्ट से रोक लगाने की मांग की थी. राजस्थान हाई कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए इस प्रथा पर रोक लगा दी थी. कोर्ट ने कहा था कि ये प्रथा मानवीय नहीं है क्योंकि इससे मौलिक मानवाधिकार का उल्लंघन होता है. ये भी कहा था कि संथारा या मौत तक खाना-पानी छोड़ना जैन धर्म का आवश्यक हिस्सा नहीं है. ये फैसला अगस्त 2015 में आया था. जैन समुदाय ने सुप्रीम कोर्ट में फैसले को चुनौती दी. 20 दिन बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को पलट दिया और संथारा प्रथा प्रैक्टिस करने की अनुमति दे दी थी.

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