वाराणसी के ज्ञानवापी (Gyanvapi) मस्जिद परिसर में श्रृंगार गौरी की नियमित पूजा की मांग वाली याचिका सुनने लायक है या नहीं? इस पर 31 मई को इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) का फैसला आया. कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की आपत्ति खारिज करते हुए हिंदू पक्ष की याचिका को सुनने लायक माना है. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वाराणसी जिला अदालत के फैसले को बरकरार रखा है.
ज्ञानवापी-श्रृंगार गौरी केस में मुस्लिम पक्ष की कौन सी अर्जी इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज कर दी?
अंजुमन इंतजामिया कमेटी ने वाराणसी जिला अदालत के फैसले को चुनौती दी थी.


जिला अदालत ने भी हिंदू पक्ष की ओर से ज्ञानवापी परिसर में पूजा की मांग वाली याचिका को सुनने योग्य बताया था. जिला अदालत के इसी फैसले को अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमिटी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. उसे इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है. इंडिया टुडे की नलिनी शर्मा की रिपोर्ट के मुताबिक अब ज्ञानवापी परिसर में पूजा की मांग वाली हिंदू पक्ष की याचिका पर सुनवाई शुरू होगी.
ज्ञानवापी-श्रृंगार गौरी केस क्या है?पांच महिलाओं ने याचिका दायर कर ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में हिंदू देवी-देवताओं की रोजाना पूजा की मंजूरी मांगी थी. मुस्लिम पक्ष की दलील इस याचिका के खिलाफ थी. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर वाराणसी जिला अदालत को यह तय करना था कि ये मामला सुनने लायक है या नहीं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में मुस्लिम पक्ष ने दलील दी कि 1991 के प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट और 1995 के सेंट्रल वक्फ एक्ट के तहत मामला सुनने योग्य नहीं बनता है. 1991 का प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 15 अगस्त, 1947 को मौजूद किसी भी पूजा स्थल के धार्मिक चरित्र के बदलाव पर रोक लगाता है.
वहीं इस पर हिंदू पक्ष ने दलील दी कि 1993 तक, “ज्ञानवापी के पीछे की ओर” श्रृंगार गौरी की नियमित पूजा की अनुमति थी. 1993 के बाद वाराणसी के जिला प्रशासन ने वहां रोजाना प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया. बता दें कि अभी याचिका दायर करने वाली महिलाओं को चैत्र और वासंतिक नवरात्र के चौथे दिन ज्ञानवापी परिसर में पूजा करने की मंजूरी मिली हुई है.
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