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पेगासस मामले पर SC ने बिठाई कमेटी, जानिए किस किस पहलू से होगी जासूसी की जांच

केंद्र के जवाब से असहमत कोर्ट ने कहा, लोगों की विवेकहीन जासूसी मंजूर नहीं.

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पेगासस मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन कर दिया गया है. (फोटो- आजतक/पीटीआई)
पेगासस कथित जासूसी मामले (Pegasus Spyware Case) में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा है कि पेगासस मामले की जांच एक्सपर्ट कमेटी करेगी. कोर्ट ने कहा कि लोगों की विवेकहीन जासूसी बिल्कुल मंजूर नहीं है. कमेटी से कहा गया है कि पेगासस से जुड़े आरोपों की तेजी से जांच करके अपनी रिपोर्ट सौंपें.  8 हफ्ते बाद फिर से मामले की सुनवाई होगी. कौन करेगा जासूसी मामले में जांच? चीफ जस्टिस एनवी रमणा, जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस हिमा कोहली की बेंच ने इस मामले पर फैसला सुनाया. कोर्ट ने पेगासस मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस आरवी रवींद्रन की अगुवाई में कमेटी का गठन किया है. जस्टिस रवींद्रन के साथ आलोक जोशी और संदीप ओबेरॉय भी इस कमेटी का हिस्सा होंगे. लाइव लॉ डॉट कॉम के अनुसार, आलोक जोशी 1976 बैच के रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं. डॉक्टर संदीप ओबेरॉय सब कमेटी के चेयरमैन होंगे. ओबेरॉय इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेसन ऑफ स्टैंडराइजेशन और इंटरनेशनल इलेक्ट्रो टेक्निकल कमीशन से जुड़े हुए हैं. कमेटी में कोर्ट ने तीन तकनीकी एक्सपर्ट्स को भी शामिल किया है. ये हैं- # डॉक्टर नवीन कुमार चौधरी, प्रोफेसर साइबर सिक्योरिटी एंड डिजिटल फॉरेंसिक्स, नेशनल फॉरेंसिक साइंसेज़ यूनिवर्सिटी, गांधीनगर, गुजरात # डॉक्टर पी. प्रभाकरन, प्रोफेसर, स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग, अमृता विश्व विद्यापीठम, अमृतापुरी, केरल # डॉक्टर अश्विन अनिल गुमासते, एसोसिएट प्रोफेसर कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग, आईआईटी बॉम्बे, महाराष्ट्र इन मुद्दों की जांच करेगी एक्सपर्ट कमेटी सुप्रीम कोर्ट ने जो कमेटी बनाई है, उनके लिए टर्म ऑफ रेफरेंस के तौर पर 6 सवाल तय किए हैं. मतलब इस कमेटी को इन 6 सवालों के इर्दगिर्द अपनी जांच का दायरा रखना है. ये सवाल हैं- # क्या स्पाइवेयर के पेगासस सूट का इस्तेमाल भारत के नागरिकों के फोन या अन्य उपकरणों का एक्सेस लेने के लिए किया गया था? अगर हां तो ये डाटा कहां स्टोर किया गया है? # इस स्पाईवेयर के अटैक से कौन-कौन से लोग या संस्था पीड़ित हैं? # स्पाइवेयर के पेगासस सूट का इस्तेमाल करके भारतीय नागरिकों के वॉट्सएप अकाउंट्स हैक करने के बारे में 2019 में रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद भारत सरकार ने क्या क्या कदम उठाए या कार्रवाई की? # क्या पेगासस स्पाइवेयर को भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार या एजेंसी ने हासिल किया था, और भारत के नागरिकों के खिलाफ इस्तेमाल किया था? # अगर किसी सरकारी एजेंसी ने पेगासस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया था तो वो किस नियम-कायदे, प्रोटोकॉल और कानूनी प्रक्रिया के तहत किया गया था? # अगर किसी ने इस स्पाईवेयर का इस्तेमाल देश के नागरिकों पर किया तो ऐसा किस अथॉरिटी या अधिकार के तहत किया गया? सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी को ये अधिकार भी दिया है कि वो मामले की छानबीन के दौरान इससे जुड़ा कोई और पहलू देखती है तो उसकी जांच भी कर सकती है. सरकार के रुख से कोर्ट असहमत सुप्रीम कोर्ट ने पेगासस कथित जासूसी मामले में साफ रुख पेश न करने पर सरकार की खिंचाई भी की. कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार का कोई साफ स्टैंड नहीं था. केंद्र सरकार का कहना था कि यह सार्वजनिक चर्चा का विषय नहीं है और न ही यह ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के हित’ में है. इस पर कोर्ट ने कहा कि सरकार के सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा की बात करने पर अदालत मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती. देश के हर नागरिक की निजता की रक्षा होनी चाहिए. अगर निजता का उल्लंघन हुआ है तो इसकी जांच होनी चहिए. बता दें कि पेगासस जासूसी मामले में निष्पक्ष जांच के लिए 15 याचिकाएं दायर की गई थीं. ये याचिकाएं वरिष्ठ पत्रकार एन राम, सांसद जॉन ब्रिटास और यशवंत सिन्हा समेत कई लोगों ने दायर की थीं. बेंच ने 13 सितंबर को मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. उस वक्त कोर्ट ने कहा था कि वह सिर्फ ये जानना चाहता है कि क्या केंद्र ने नागरिकों की कथित जासूसी के लिए अवैध तरीके से पेगासस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया या नहीं? क्या है पेगासस जासूसी मामला 18 जुलाई को दुनिया के 17 अखबारों-पोर्टल्स पर खबर छपी, जिस पर भारत समेत दुनिया भर में बवाल मच गया. खबर ये कि इज़रायल में सर्विलांस का काम करने वाली निजी कंपनी के डेटाबेस में दुनिया के हज़ारों लोगों के मोबाइल नंबर मिले हैं. इज़रायल की इस कंपनी का नाम NSO ग्रुप है, और इसके जासूसी करने वाले स्पाईवेयर का नाम पेगासस है. पेगासस का तथाकथित डेटाबेस लीक हुआ, और ये सबसे पहले फ्रांस की नॉन प्रॉफिट मीडिया कंपनी- फॉरबिडन स्टोरीज़ और मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल को मिला. इन दोनों ने ये डेटा दुनिया के 17 मीडिया हाउसेज के साथ शेयर किया. इसमें द गार्डियन, वॉशिंगटन पोस्ट जैसे प्रतिष्ठित अखबार शामिल हैं. भारत से ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल द वायर को ये डेटा मिला. इस डेटा की इन्वेस्टिगेशन को नाम दिया गया पेगासस प्रोजेक्ट. इसमें धीरे-धीरे उन लोगों के नाम सामने आए, जिनके नंबर कथित तौर पर लीक्ड डेटाबेस में हैं. जिन भारतीयों का नंबर पेगासस के संभावित शिकारों की लिस्ट में बताया जाता है, उनमें 40 भारतीय पत्रकारों के अलावा राहुल गांधी और प्रशांत किशोर जैसे लोग भी हैं. सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों, बड़े बिजनेसमैन और मोदी सरकार के दो मंत्रियों के नाम भी इसमें सामने आए हैं. हालांकि खुलासा करने वाली कंपनी का कहना है कि लिस्ट में नाम होने का मतलब यह नहीं है कि सभी के फोन की जासूसी हुई.

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