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गैस का चूल्हा या बिजली वाला इंडक्शन, आपकी जेब का असली ‘दुश्मन’ कौन?

Iran War and LPG Crisis: मिडिल ईस्ट में जारी ईरान-इजरायल और अमेरिका की जंग का असर इंडियावालों की रसोई पर दिखने लगा है. पर्याप्त गैस स्टॉक होने के तमाम सरकारी दावों के बावजूद आम आदमी LPG सिलेंडर के लिए लाइन में लगा है. ऐसे 'इंडक्शन चूल्हा' एक विकल्प नजर आता है. मगर लाख टके का सवाल ये है कि बिजली बनाम सिलेंडर के गणित में किसका पलड़ा भारी पड़ेगा?

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गैस का चूल्हा vs इंडक्शन. जेब के लिए कौन है असली ‘खलीफा’?

ईरान पर अमेरिका और इजरायल ने हमला कर दिया. हमले से भड़के ईरान ने UAE, कतर और कुवैत समेत अपने तमाम पड़ोसियों पर ताबड़तोड़ मिसाइल और ड्रोन बरसा दिया. गुस्सा इतने से भी शांत नहीं हुआ तो ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) से जहाजों की आवाजाही रोक दी. बस यही वो काम था जो ईरान को नहीं करना था.

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क्योंकि उधर ईरान ने ‘होर्मुज’ पर तेल टैंकरों का ट्रैफिक जाम लगाया और इधर हमारे ऑफिस के बाहर बैठे ‘नंदू भैया’ ने चाय की कीमत दस रुपये से बढ़ाकर 15 रुपये कर दी. सीधा पचास परसेंट का जंप. हमने शिकायत की तो जवाब मिला कि “भइया गैस की किल्लत हो गई है. बहुत महंगे में खरीदना पड़ रहा है”. 

पांच मिनट में पूरे पांच रुपये का नुकसान करवाकर वापस लौटे तो पता चला कि वाकई LPG सिलेंडर के लिए जनता जनार्दन दर-दर भटक रही है. हमारे दफ्तर वाले अभय जी ने तो सिलेंडर की जगह ‘इंडक्शन चूल्हा’ इस्तेमाल कर की तैयार भी कर ली. और इसी से सवाल उठा कि मजबूरी में तो ठीक है, मगर गैस और इंडक्शन की इस जंग में हमारी जेब के लिए क्या सस्ता पड़ेगा. 

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रसोई में दो धड़े हैं. एक टीम नीली लौ वाली गैस के साथ खड़ी है. दूसरी टीम बिजली वाले इंडक्शन पर भरोसा करती है. दोनों के अपने तर्क हैं. लेकिन असली सवाल है जेब का. यानी खाना पकाते समय आपकी कमाई किस तरफ कम खर्च होती है.

कई शहरों में गैस सप्लाई की दिक्कतें भी दिखाई दे रही हैं. दक्षिण भारत के औद्योगिक शहर कोयंबटूर (Coimbatore) हो या बेंगलुरु या फिर भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई. कई जगहों पर होटलों और हॉस्टलों में गैस की किल्लत के चलते किचन ठप होने की नौबत आ गई. तब बहस पसंद की नहीं रही. बहस हो गई कि खाना बनेगा कैसे?

तो ‘लल्लनखास’ की इस कड़ी में पूरा हिसाब किताब खोलते हैं. टेक्नोलॉजी, खर्च, स्पीड, सुरक्षा और भारत के किचन की असली जरूरत.

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किचन की असली लड़ाई: लौ vs बिजली

भारत में दशकों से खाना पकाने का राजा रहा है LPG गैस चूल्हा. सिलेंडर बदला, चूल्हा जलाया और काम खत्म. लेकिन पिछले 10 साल में इंडक्शन कुकटॉप तेजी से घरों में घुसा है. वजह साफ है- तेज, साफ और ऊर्जा की बचत वाला जुगाड़.

यह बहस सिर्फ टेक्नोलॉजी की नहीं है. यह थर्मोडायनामिक्स और पैसे की भी है.

एक नजर में फर्क

बात निकली है तो दूर तलक तो जाएगी ही. पैसों के बचत वाली बात भी आएगी ही. मगर उससे पहले जरा बाकी खूबियों के पैमाने पर भी गैस और इंडक्शन को कस कर देख लेते हैं. मिसाल के तौरपर ऊर्जा का इस्तेमाल कौन बेहतर करता है? कहां ऊर्जा का नुकसान ज्यादा होता है? किस पर तेज खाना पकता है? कहां थोड़ी दिक्कत होती है? और किस पर खाना पकाने के लिए अलग से तैयारी करनी पड़ती है.

किचन टेक मुकाबले को इस टेबल के जरिए समझने की कोशिश करते हैं.

 गैस चूल्हाइंडक्शन चूल्हा
ऊर्जा दक्षता40% 85-90%
ऊर्जा नुकसान60%10%
स्पीड सामान्यतेज
सुरक्षागैस लीक संभवगैस लीक नहीं
बर्तनकोई भीमैग्नेटिक बर्तन
रोटी/फुलकाआसानथोड़ा मुश्किल
लागत स्थिरतासिलेंडर पर निर्भरबिजली टैरिफ पर निर्भर

अब चलिए एक-एक करके इन सभी पॉइंट्स पर डिटेल में चर्चा करते हैं. शुरुआत ऊर्जा क्षय यानी एनर्जी की बर्बादी से.

गैस चूल्हे में गर्मी उड़ जाती है?

गैस चूल्हे की सबसे बड़ी कमजोरी बताई जाती है ऊर्जा या एनर्जी की बर्बादी. आम बोलचाल की भाषा में लोग कहते हैं कि गैस पर गर्मी उड़ जाती है. मतलब 100 फीसदी में से 40 फीसदी एनर्जी ही काम आती है. बाकी का 60 परसेंट बर्बाद. 

अब जरा इसके पीछे की असली साइंस समझते हैं. LPG चूल्हे की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा बर्तन तक पहुंचता ही नहीं. रिसर्च के अनुसार गैस चूल्हे की औसत थर्मल एफिशिएंसी लगभग 35 से 45 प्रतिशत होती है. यानी अगर आपने 100 रुपये की गैस जलाई तो सिर्फ करीब 40 रुपये की ऊर्जा खाना पकाने में लगी.

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LPG चूल्हे की दिक्कतें (फोटो- आजतक)

बाकी करीब 60 रुपये की ऊर्जा सीधे रसोई की हवा को गर्म करती है. इसलिए गैस पर खाना बनाते समय गर्मी ज्यादा महसूस होती है. यह सिर्फ असुविधा नहीं. यह ऊर्जा का नुकसान भी है.

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इंडक्शन कैसे खेल पलट देता है

इंडक्शन चूल्हा गैस की तरह लौ नहीं बनाता. यह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड से बर्तन के तले को सीधे गर्म करता है. इस वजह से गर्मी हवा में नहीं जाती. सीधे बर्तन में बनती है.

इसका मतलब? ऊर्जा का इस्तेमाल ज्यादा प्रभावी. इंडक्शन की थर्मल एफिशिएंसी आम तौर पर 85 से 90 प्रतिशत मानी जाती है. यानी 100 रुपये की बिजली में लगभग 90 रुपये का काम सीधे खाना पकाने में लगता है.

जिसके चलते गर्मी कम फैलती है. इसलिए गर्मियों में किचन भी कम तपता है.

असली सवाल, आखिर जेब पर क्या असर

अब आते हैं सबसे जरूरी सवाल पर. जेब के लिए कौन अच्छा है? भारत में आम तौर पर घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत लगभग 900 से 1100 रुपये के बीच रहती है. शहर के हिसाब से फर्क होता है.

दूसरी तरफ बिजली का घरेलू टैरिफ लगभग 6 से 10 रुपये प्रति यूनिट के बीच होता है. अब थोड़ा गणित समझिए. इसके लिए एक उदाहरण का सहारा लेते हैं,

अगर एक यूनिट बिजली को एक किलोवॉट ऊर्जा के बराबर मानें. तो इंडक्शन की दक्षता लगभग 90% होती है. जबकि गैस की लगभग 40%. इसका मतलब वही खाना पकाने के लिए गैस को लगभग दोगुनी से ज्यादा ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है. 

यही कारण है कि कई स्टडीज इंडक्शन को बेहतर बताती हैं. मान लीजिए अगर बिजली की कीमत लगभग 8 रुपये प्रति यूनिट से कम है तो इंडक्शन की कुल लागत गैस के बराबर या कभी कभी कम पड़ सकती है.

लेकिन जहां बिजली महंगी है. वहां गैस अभी भी सस्ती लग सकती है.

बड़े किचन में क्यों बढ़ रहा इंडक्शन

बड़े हॉस्टल, अस्पताल और कम्युनिटी किचन में एक और समस्या होती है. गैस लॉजिस्टिक्स प्रॉब्लम. यानी पहले सिलेंडर मंगाना, फिर उसे स्टोर करके रखना, जरूरत पड़ने पर बदलना और सबसे बड़ी टेंशन सुरक्षा.

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इंडक्शन चूल्हा तेजी से लोकप्रिय हो रहा है (फोटो- विकिपीडिया)

जब गैस सप्लाई में बाधा आती है तो पूरा सिस्टम प्रभावित हो सकता है. इसी वजह से कई संस्थान इलेक्ट्रिक कुकिंग पर भी शिफ्ट होने लगे हैं.

कोयंबटूर के हेल्थकेयर नेटवर्क ‘कोवाईकेयर’ (CovaiCare) के संस्थापक अचल श्रीधरन (Achal Sridharan) ने समाचार पत्र ‘द हिंदू’ को दिए गए एक इंटरव्यू में कहा था कि गैस शॉर्टेज की स्थिति में इलेक्ट्रिक कुकिंग ही बैकअप बनती है. चाहे खर्च थोड़ा ज्यादा क्यों न हो.

इंडक्शन की शर्तें भी हैं

इंडक्शन हर मामले में परफेक्ट नहीं है. इसे इस्तेमाल करने के भी कुछ नियम हैं.

1. बर्तनों का नियम: इंडक्शन पर सिर्फ फेरोमैग्नेटिक बर्तन चलते हैं. यानी स्टील, कास्ट आयरन और मैग्नेटिक बेस कुकवेयर ही इस्तेमाल किये जा सकते हैं. पुरानी एल्यूमिनियम कढ़ाई या कुछ तवे काम नहीं करेंगे.

2. रोटी का मामला: भारत में रोटी सिर्फ खाना भर नहीं है बल्कि एक इमोशन है. गैस की खुली आंच पर फूली हुई रोटी बनाना आसान है. मगर इंडक्शन पर यह थोड़ा मुश्किल हो सकता है. हालांकि आजकल फ्लैट तवे और इलेक्ट्रिक तवे इस समस्या को कुछ हद तक हल करते हैं.

3. बिजली पर निर्भरता: इंडक्शन पूरी तरह बिजली पर निर्भर है. मतलब जहां बिजली कटौती ज्यादा है. वहां गैस अभी भी भरोसेमंद विकल्प है. वरना खाना बनाने के लिए बिजली का इंतजाम करना ज्यादा मुश्किल काम है.

सुरक्षा: यहां इंडक्शन आगे

गैस चूल्हे में हमेशा दो जोखिम रहते हैं. पहला- गैस लीक का खतरा और दूसरा- खुली आग के चलते किसी हादसे के होने का अंदेशा. वहीं दूसरी तरफ इंडक्शन में खुली आग नहीं होती. कई मॉडल में ऑटो कटऑफ भी होता है.

इसलिए हॉस्टल, बुजुर्गों के घर और छोटे अपार्टमेंट में इंडक्शन को सुरक्षित माना जाता है.

स्पीड टेस्ट: कौन तेज

इंडक्शन आम तौर पर गैस से तेज होता है. पानी उबालने का टेस्ट अक्सर यही दिखाता है. इंडक्शन 30 से 50 प्रतिशत तक तेज हो सकता है. ऐसा इसलिए मुमकिन हो पाता है क्योंकि ऊर्जा सीधे बर्तन में बनती है.

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अंतिम फैसला: जेब का असली खलीफा कौन

LPG गैस से जलने वाला चूल्हा बेहतर है या इंडक्शन चूल्हा? अगर सीधे बोलें तो जवाब एक लाइन में नहीं है. गैस बेहतर है अगर,

  • बिजली कटौती ज्यादा है
  • रोटी और फुलका रोज बनता है
  • पुराने बर्तन इस्तेमाल करना चाहते हैं

वही दूसरी तरफ इंडक्शन बेहतर है अगर,

  • बिजली स्थिर है
  • ऊर्जा बचत चाहिए
  • छोटा किचन है
  • सुरक्षा प्राथमिकता है

कुल मिलाकर दुनियाभर में जंगें तो चलती रहेंगी. उसकी वजह से कभी कभार रसोई गैस की किल्लत भी हो सकती है. मगर सौ बात की एक बात ये है कि भारत के किचन का भविष्य शायद एकतरफा नहीं होगा.

ऐसे में सबसे समझदार रास्ता है -हाइब्रिड किचन. यानी ऐसी रसोई जिसमें गैस भी हो और इंडक्शन भी. मतलब चावल-दाल इंडक्शन पर बना लिया और रोटी गैस पर.

ऐसा करने पर स्पीड भी मिलेगी. बैकअप भी रहेगा. और जेब का गणित भी कंट्रोल में रहेगा. आप क्या सोचते हैं हमें कमेंट सेक्शन में लिखकर बताइये.
 

वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: 'रसोई गैस की कमी नहीं', LPG Crisis पर सरकार के दावे का सच क्या है?

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