“लेकिन अगर किसी मरीज़ में कम या हल्के फुल्के लक्षण दिखाई दे रहे थे, तो हम उन्हें उन लक्षणों के लिए दवा दे रहे थे.”यानी पतंजलि की कोरोनिल के अलावा मरीज़ों को अंग्रेज़ी दवा भी दी गयी. इसी बात को लेकर हमने पतंजलि से पूछा भी था कि ट्रायल में शामिल मरीज़ों को और भी दवाएं दी गयीं, जवाब नहीं मिला. इस सबके अलावा राजस्थान सरकार ने भी कोरोनिल के ट्रायल पर सवाल उठाए हैं. कहा है कि उनके राज्य में कोरोनिल के ट्रायल के पहले राज्य सरकार से परमिशन लेनी चाहिए थी, लेकिन पतंजलि ने ऐसा नहीं किया. राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव (स्वास्थ्य) रोहित कुमार सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा,
“नियम ये है कि सबसे पहले राज्य सरकार को ऐसे किसी ट्रायल को सूचना देनी होती है. हम इस आवेदन को राज्य के क्लिनिकल ट्रायल कमिटी और एथिक्स कमिटी को देते हैं. इन जगहों से अनुमति मिल जाने के बाद हम ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया (DCGI) और ICMR को लिखते हैं. वहां से परमिशन मिल जाने के बाद ही दवा का क्लिनिकल ट्रायल किया जा सकता है. राज्य सरकार के पास इस ट्रायल को लेकर कोई रिक्वेस्ट नहीं आयी, न ही ट्रायल की कोई जानकारी थी.”हमने ट्रायल की परमिशन ICMR से लेने के बारे में भी पतंजलि से सवाल पूछे थे, पतंजलि ने उन सवालों के उत्तर भी नहीं दिए. लेकिन NIMS के कुलपति डॉ. बीएस तोमर ने कहा है कि उनके पास सबकुछ की अनुमति थी. तोमर कोरोनिल के लॉन्च के समय मौजूद थे. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा,
“ट्रायल के पहले हमने सबकुछ की परमिशन ले ली थी. हमारे पास क्लीनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ़ इंडिया (CTRI) की अनुमति है, जो ICMR का ही अंग है. मेरे पास परमिशन दिखाने के सारे काग़ज़ भी हैं. हमने राजस्थान के स्वास्थ्य विभाग को भी 2 जून को सूचित कर दिया था.”
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