स्मृतियों का ध्वंस आसान नहीं होता. कई बार शिलापट्ट पर नाम बदलने से भी स्मृतियां धूसरित नहीं होतीं. उनके निशां बचे रहते हैं, लोगों के जेहन में, कई बार दिलों में भी. पाकिस्तान की सांस्कृतिक राजधानी लाहौर के सरकारी साइनबोर्ड भी अब उसी परंपरा के रंग में रंग गए हैं, जिसे लाहौर वासियों ने लंबे समय से चुपचाप संजो कर रखा था. शहर की साझा संस्कृति. लाहौर की पुरानी सड़कें, गलियों, कूचों और चौकों को अब उनके पुराने हिंदू, सिख, जैन और ब्रिटिश कालीन नाम से जाना जाएगा.
पाकिस्तान में सड़कों, गलियों को कौन लौटा रहा उनके पुराने हिंदू नाम?
पाकिस्तान के लाहौर शहर की पुरानी सड़कें, गलियों, कूचों और चौकों को अब उनके पुराने हिंदू, सिख, जैन और ब्रिटिश कालीन नाम से जाना जाएगा. इस्लामपुरा का नाम बदलकर कृष्ण नगर कर दिया गया है. वहीं बाबरी मस्जिद चौक का नाम जैन मंदिर चौक कर दिया गया है. पिछले दो महीनों में शहर के नौ जगहों के नाम बदले गए हैं.


लाहौर की शहरों के पुराने नाम वापस रखे गए
इस्लामपुरा का नाम बदलकर कृष्ण नगर कर दिया गया है. वहीं बाबरी मस्जिद चौक का नाम जैन मंदिर चौक कर दिया गया है. पिछले दो महीनों में शहर के नौ जगहों के नाम बदले गए हैं. सुन्नतनगर का नाम बदलकर संत नगर हो गया है. मौलाना जफर अली खान चौक अब फिर से लक्ष्मी चौक है. मुस्तफाबाद धरमपुरा हो गया और सर आगा खान चौक को पुराना नाम डेविस रोड से जाना जाएगा. अल्लामा इकबाल रोड फिर से जेल रोड हो गया, फातिमा जिन्ना रोड क्वींस रोड बन गई और बाग-ए जिन्ना एक बार फिर से लॉरेंस गार्डेन के नाम से जाना जाएगा.
पुराने नाम वापस रखने का फैसला कब हुआ?
नाम बदलने का यह अभियान लाहौर अथॉरिटी फॉर हेरिटेज रिवाइवल (LHAR) नाम की एक संस्था कर रही है. इस संस्था को शहर की पुरानी विरासत को सहेजने और उसके जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी मिली है. इस प्रोजेक्ट के लिए 50 अरब पाकिस्तानी रुपया खर्च होना है. इसकी शुरुआत पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज ने साल 2025 में की थी.
द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, LHAR के संचालन समिति के मुख्य संरक्षक पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ हैं. उन्होंने 19 मार्च को एक हाई लेवल मीटिंग बुलाई थी. इसमें लाहौर हेरिटेज एरिया रिवाइवल प्रोजेक्ट पर चर्चा हुई. बैठक में लाहौर के नए नामों को फिर से पुराने हिंदू या ब्रिटिश विरासत के दौर के नाम पर रखने का फैसला लिया गया. लाहौर के चारदीवारी वाले शहर के पूर्व डीजीपी कामरान लशारी ने बताया,
मियां नवाज शरीफ बताते हैं कि नाम क्यों नहीं बदले जाने चाहिए. जब इतिहास या मूल नाम जो प्रचलित और लोकप्रिय हैं और एक खास कालखंड को रिप्रेजेंट करते हैं तो उनको बरकरार रखना चाहिए. फिर हम सभी सहमत हो गए. वैसे भी इनमें से कई जगहों को तो अब भी लोग पुराने नामों से ही पुकारते हैं.
लगता है नवाज शरीफ के इस तर्क को पाकिस्तान के लोगों ने भी स्वीकार कर लिया है. क्योंकि इस्लामिक रिपब्लिक में इस फैसले को बिना किसी संगठित विरोध के स्वीकार कर लिया गया है.
नाम कब बदले गए थे?
लाहौर में नाम बदलने की कवायद 1990 के दशक में बाबरी ढांचे को गिराने के बाद हुई. उस दौर में केंद्र में नवाज शरीफ, फिर बेनजीर भुट्टो और परवेज मुशर्रफ की सरकारें रही हैं. साल 2018 से 2022 तक प्रधानमंत्री रहे इमरान खान ने इस प्रथा पर रोक लगा दी थी.
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