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दुनियादारी: Africa के देश आपस में क्यों लड़ रहे? लादेन के संगठन ने क्या कांड करवा दिया?

बढ़ते आतंक से निपटने के लिए अफ़्रीका महाद्वीप के 05 देशों ने एक संगठन बनाया था. अफ्रीकन देश बुर्किना फासो और नाइजर ने अब 'जी 5 साहेल' से निकलने का ऐलान कर दिया है. इसमें ओसामा बिन लादेन के अलक़ायदा और इस्लामिक स्टेट का भी रोल है.

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दुनियादारी में आज कहानी अफ्रीका के जी5 देशों की (फोटो- एएफपी)

वॉर ऑन टेरर के बाद दुनिया ने 02 बड़े आतंकी संगठनों का नाम सबसे ज़्यादा सुना. पहला, अलक़ायदा. और दूसरा, इस्लामिक स्टेट (IS). किसी बड़ी साज़िश में अलक़ायदा का नाम पिछली बार कब आया था? इतिहास के पन्ने पलटें तो सितंबर 2009 की वो शाम याद आती है, जब न्यूयॉर्क के सब-वे को उड़ाने की प्लानिंग फेल हुई थी. फिर मई 2011 में यूएस आर्मी ने पाकिस्तान के एबटाबाद में सर्जिकल स्ट्राइक की. इसमें अलक़ायदा का सरगना ओसामा बिन लादेन मारा गया. उसके बाद से अलक़ायदा का नाम किसी बड़ी आतंकी साज़िश में नहीं आया है. लादेन की मौत के बाद अल ज़वाहिरी जैसे-तैसे ग्रुप को चला रहा था. जुलाई 2022 में अमेरिका ने उसे भी मार गिराया.

इस्लामिक स्टेट का क्या हुआ?

ये गुट 2013 में इराक़ और सीरिया में फैला. इसने दुनियाभर के मुसलमानों को ख़िलाफ़त का ख़्वाब दिखाया था. 2014 आते-आते इसने मिडिल-ईस्ट में तहलक़ा मचा दिया था. फिर अमेरिका के नेतृत्व में गठबंधन सेना उतरी. कुछ बरस पहले तक मीडिया में हर रोज़ IS के सरगना अबू बक्र अल-बग़दादी की मौत की ख़बर चलती थी.  लेकिन अगले दिन फिर वो जिंदा हो जाता था. आख़िरकार, अक्टूबर 2019 में अमेरिका के ड्रोन हमले में वो भी मारा गया. तब से IS का ज़िक्र और उसका प्रभाव लगातार कम होता गया है.

तो क्या ये मान लिया जाए कि एक समय तक दुनिया को दहलाने वाले ये दोनों आतंकी संगठन खत्म हो गए? या, इनका प्रभाव खत्म हो गया है? जवाब है, नहीं. इन्होंने बस अपना फ़ोकस शिफ़्ट कर लिया है. अब ये अफ़्रीका महाद्वीप में अपनी पकड़ मज़बूत बना रहे हैं. पिछले 5 बरसों में अफ़्रीका का साहेल क्षेत्र आतंकवाद का हॉटस्पॉट बन चुका है. इसको एक आंकड़े से समझिए. 2022 में आतंकी घटनाओं में दुनियाभर में जितने लोग मारे गए, उनमें से लगभग 43 फीसदी साहेल क्षेत्र से थे.

आज हम इसकी चर्चा क्यों कर रहे हैं?

दरअसल, बढ़ते आतंक से निपटने के लिए अफ़्रीका महाद्वीप के 05 देशों ने एक संगठन बनाया था. G-5 साहेल. इसमें थे - बुर्किना फ़ासो, नाइजर, माली, चाड और मॉरिटेनिया. ये देश मिलकर आतंकवाद की समस्या से निपटने वाले थे. लेकिन अब नाइजर और बुर्किना फ़ासो ने इस गुट को अलविदा कह दिया है.

तो, आज हम जानेंगे,
- G-5 साहेल की पूरी कहानी क्या है?
- इस गुट में अचानक फूट कैसे पड़ गई?
- और, अफ़्रीका महाद्वीप में आतंकवाद कैसे फला-फूला?


साहेल अरबी भाषा का शब्द है. इसका शाब्दिक अर्थ होता है, तट या किनारा. धरातल पर सहारा रेगिस्तान और सवाना के घास के मैदान के बीच के इलाके को ये नाम दिया गया है. इसका पूर्वी किनारा लाल सागर, जबकि पश्चिमी किनारा अटलांटिक सागर से मिलता है. बीच में सूडान, चाड, नाइजर, माली और मॉरिटेयाना का अधिकांश हिस्सा साहेल में पड़ता है. बाकी कई देशों के थोड़े बहुत इलाके इस रीजन में माने जाते हैं. लोकेशन और डेमोग्राफ़ी की वजह से नाइजर साहेल के सबसे अहम देशों में गिना जाता है.

अफ्रीका में फैला साहेल रीजन(फोटो- एएफपी)

इसी क्षेत्र में आतंकी संगठनों का सबसे ज़्यादा प्रभाव है. पर यहां तक आतंकवाद पहुंचा कैसे? ये समझने के लिए हमें इतिहास में चलना पड़ेगा.
साल 1996. तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया. उस समय तक ओसामा बिन लादेन पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़ हो चुका था. लादेन ने 1988 में पेशावर में अलक़ायदा बनाई थी. इसका मकसद इस्लामी देशों को पश्चिम के वर्चस्व से कराना था. इस मकसद को पूरा करने के लिए अलक़ायदा ने अमेरिका और इज़रायल के दूतावासों पर हमले किए. फिर 11 सितंबर 2001 को आतंकियों ने अमेरिका की धरती पर सबसे बड़ा हमला किया. इसमें लगभग 03 हज़ार लोग मारे गए. अमेरिका ने हमले का इल्ज़ाम अलक़ायदा और उसके सरगना लादेन पर लगाया. लादेन तब अफ़ग़ानिस्तान में रह रहा था. उसके आतंकियों को वहीं पर ट्रेनिंग मिलती थी. अमेरिका ने तालिबान से उसको सौंपने की मांग की. तालिबान नहीं माना. फिर अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में वॉर ऑन टेरर शुरू किया.

ओसामा बिन लादेन के साथ अल ज़वाहिरी (फोटो-एएफपी)

फिर 2003 में वॉर ऑन टेरर इराक़ पहुंचा. सद्दाम हुसैन की सत्ता गई. सिविल वॉर शुरू हुआ. अलक़ायदा ने मौके का फ़ायदा उठाया. यहां भी अपने पांव पसारे. लेकिन 2013 में इनके लीडर्स के बीच मतभेद पैदा हो गए. यहीं से इस्लामिक स्टेट यानि IS की शुरुआत हुई. उसी समय सीरिया में भी सिविल वॉर हो रहा था. IS को वहां स्कोप दिखा. वे वहां भी फैले.

फिर 2015 में अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों ने मिलकर इस्लामिक स्टेट और अलक़ायदा को खत्म करने के लिए ऑपरेशंस चलाए. इनकी टॉप लीडरशिप को खत्म किया. इससे बचकर आतंकी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचे. इनमें से कुछ अफ्रीका के देश भी पहुंचे. यहां उन्होंने पुराने आतंकी संगठनों को फिर से खड़ा किया. कुछ नए संगठन बनाए.

इस वक़्त कौन से गुट एक्टिव हैं?

पहला है, अलक़ायदा इन इस्लामिक मगरिब
1991 में अल्जीरिया में गृह युद्ध शुरू हुआ. इस युद्ध में एक गिरोह इस्लामिक ख़िलाफ़त लाने की बात करता था, इस गिरोह ने 1998 में  सलाफिस्ट ग्रुप फॉर पीचिंग एंड कॉम्बैट (GSPC) बनाया. कई आतंकी हमलों में इसका नाम आया. 2007 में GSPC ने अलक़ायदा की सरपरस्ती में काम करने का ऐलान किया. फिर इसने अपना नाम बदल लिया और रखा अल क़ायदा इन इस्लामिक मगरिब (AQIM). इसे UN, अमेरिका, UAE समेत 8 मुल्कों ने आतंकी संगठन घोषित किया हुआ है. इसका मौजूदा लीडर अबू उबैदा यूसुफ़ अलन्नबी है.  

दूसरा गुट है, मूवमेंट फॉर वननेस एंड जिहाद इन वेस्ट अफ्रीका (MOJWA).
MOJWA साल 2011 तक अलक़ायदा इन इस्लामिक मगरिब का हिस्सा हुआ करता था. फिर 2 बड़े मतभेदों के चलते वो उनसे अलग हो गया. पहला, हमें इस्लामी ख़िलाफ़त किसी एक देश में नहीं स्थापित करनी है इसके लिए पूरे वेस्ट अफ्रीका पर विचार करना चाहिए. इस्लामिक मगरिब इसके लिए तैयार नहीं था. MOJWA की दूसरी मांग थी कि वेस्ट अफ़्रीका के देशों से फ़्रेंच आर्मी को जल्द से जल्द बाहर किया जाए. फिलहाल, MOJWA अल्जीरिया, माली और नाइजर में एक्टिव है.

तीसरा गुट है, बोको हराम-
स्कूली लड़कियों को किडनैप करने के लिए कुख्यात. सबसे ज़्यादा चर्चित. सबसे खतरनाक. और अभी तक बताए आतंकी गुटों में सबसे ताकतवर. मकसद, इस्लामी राज की स्थापना करना. नाइजीरिया में बहुत एक्टिव है. बोको हराम का उभार 2002 में उत्तरी नाइजीरिया में हुआ. जहां ये गुट फला-फूला, उस इलाके में मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक थी. इस संगठन का फ़ाउंडर मौलवी मोहम्मद यूसुफ़ था. जो साल 2009 में मारा गया. गुट का मकसद है कि वो नाइजीरिया में शरिया क़ानून का निज़ाम लाए. पहले तो इसका अड्डा केवल नाइजीरिया तक था लेकिन बाद में साहेल रीजन में इसकी पैठ बढ़ी. माली के कुछ इलाकों में भी इसका दबदबा है. वर्तमान लीडर अबू उमैदा है. चीन, तुर्किए, अमेरिका जैसे देशों ने आतंकी संगठन घोषित किया हुआ है.

ये तीन ग्रुप साहेल रीजन में बेहद एक्टिव हैं. पर जब हम पूरे अफ्रीका की बात करें तो एक और ग्रुप है, जो बहुत खतरनाक है. उसका नाम है, अल शबाब.
सबसे ज़्यादा सोमालिया और केन्या में एक्टिव. अलक़ायदा का समर्थक. उन्हीं के नक़्शेकदम पर चलता है. अल-शबाब अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है नौजवान. इस सगंठन का आइडिया ये था कि इसमें ज़्यादा से ज़्यादा नौजवानों की भर्ती की जाएगी.

भारी हथियारों से लैस अल शबाब लड़ाके (फोटो- एएफपी)

साहेल रीजन में इन्हीं आतंकी गुटों ने कई हमले किए हैं. 2023 की ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स की रिपोर्ट पढ़ने पर यहां आतंकी हमलों की दक्षता पता चलती है, क्या कहती है रिपोर्ट? पॉइंट्स में जान लीजिए –
- 2007 से लेकर 2022 तक साहेल रीजन में लगभग साढ़े 6 हज़ार आतंकी हमले हो चुके हैं. इन हमलों में 22 हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए हैं.
- पिछले 15 बरसों में यहां आतंकी घटनाओं की संख्या 2 हज़ार फीसद बढ़ी है. इन 15 सालों में दुनियाभर में आतंकी घटनाओं में जितने लोग मारे गए हैं, उसमें से 43 फीसदी मौतें इसी इलाके से हुई हैं.
- दुनिया की टॉप 10 आतंकवाद से ग्रसित देशों में से 4 साहेल रीजन से हैं.

साहेल में बढ़ती आतंकी घटनाओं के चलते 2014 में 5 देशों ने G-5 साहेल की स्थापना की. इन देशों ने अफ्रीकन यूनियन (AU) की मदद से एक जॉइंट मिलिट्री बनाई. साथ ही यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल (UNSC) से मदद की गुहार लगाई. फ्रांस ने भी UNSC से अलग से दरख़्वास्त की. अफ़्रीका के कई देशों में फ्रांस का उपनिवेश रहा है. आज़ादी के बाद वो वापस तो चला गया लेकिन अभी भी अपना फायदा यहां से लेता रहता है. फ्रांस पर यहां से कई तरह के खनिज सस्ते दाम में खरीदने के आरोप लगते रहे हैं. इसलिए वो G5 साहेल की मदद के लिए अतिरिक्त प्रयास करने लगा. UNSC से मंज़ूरी मिली, और इन देशों की रक्षा के लिए मिलिट्री पर्सन भी दे दिए गए.

कैसे काम करता था ये ग्रुप?

- सभी देशों के सेना प्रमुखों की रेगूलर मीटिंग होती थी.
- सभी देश एक-दूसरे के साथ इंटेलिजेंस साझा करते थे.

मई 2022 में माली इस ग्रुप से अलग हो गया. 03 दिसंबर 2023 को बुर्किना फासो और नाइजर ने भी इस ग्रुप से निकलने का ऐलान कर दिया है. इसकी पीछे 2 बड़ी वजह थी.
पहली, तख्तापलट. पिछले 4-5 सालों से साहेल रीजन के देशों की चर्चा तख्तापलट की वजह से खूब हुई है. कुछ तारीखों पर गौर कीजिये-
- अप्रैल 2021 में चाड के राष्ट्रपति इदरिस डेबी की मौत के बाद उनके बेटे और सेना में जनरल महामत डेबी ने सत्ता हथिया ली. कानूनन, ससंद के स्पीकर को राष्ट्रपति बनाया जाना था. महामत ने अभी तक चुनाव नहीं होने दिया है.
- अगस्त 2022 में  माली के सेना ने राष्ट्रपति इब्राहिम बाउबकर कीता की सरकार गिरा दी.
- 23 जनवरी 2022 को बुर्किना फ़ासो में सेना ने राष्ट्रपति रोच कबोरे को सत्ता से बेदखल किया. फिर अंदरखाने विद्रोह हुआ. महज 8 महीने बाद सेना के दूसरे धड़े ने एक और तख़्तापलट कर दिया.
- 26 जुलाई 2023 को नाइजर के राष्ट्रपति मोहम्मद बज़ूम को हिरासत में लिया गया, फिर सेना ने ताख्तापलट कर सत्ता अपने हाथ में ले ली.

ग़ौर कीजिए कि ये तारीख़ें 2020 से अब तक की हैं. पिछले तीन साल में सेंट्रल और वेस्ट अफ़्रीका में कम से कम 9 बार तख्तापलट की कोशिश हो चुकी है. अधिकतर मामलों में तख़्तापलट सफ़ल रहा. इसी वजह से इस इलाके को अंग्रेज़ी में ‘कू बेल्ट’ का नाम दिया गया है.
जानकार कहते हैं कि तख्तापलट के बाद यहां के शासकों को वेस्ट दुनिया की खरी-खरी सुननी पड़ी. उनपर जल्द ही लोकतंत्र बहाल करवाने का दबाव था. G5 वैसे भी UN के सपोर्ट से चल रहा था. इसलिए उन्होंने इस ग्रुप से कन्नी काट ली.

दूसरी वजह फ्रांस के प्रभाव से जुड़ी है-
इस ग्रुप पर फ्रांस का ख़ासा असर था. उसके कई सैनिक इसका हिस्सा थे. बुर्किना फासो और नाइजर ने कहा है कि इस ग्रुप से फ्रांस अपने हितों को पूरा कर रहा था. इस ग्रुप का कोई मतलब नहीं रह गया था. इसलिए हम इससे अलग हो गए.

तीसरी वजह एक डिफ़ेंस पैक्ट से जुड़ी थी.
तख्तापलट के बाद ECOWAS यानी इकोनॉमिक कम्युनिटी ऑफ वेस्ट अफ्रीकन स्टेट्स ने जल्द से जल्द लोकतांत्रिक सरकार बनाने को कहा. ये भी कहा कि अगर नहीं किया तो हम सेना उतार देंगे. इसी के चलते माली, नाइजर और बुर्किना फासो ने सितंबर 2023 को एक डिफ़ेंस पैक्ट साइन किया. जानकार इसे भी G5 से निकलने की एक वजह बताते हैं.

 अब कुछ अपडेट्स जान लेते है.

1. क़तर ने इजरायल पर लग रहे नरसंहार के आरोपों की जांच की मांग की है. क़तर, इज़रायल-हमास के बीच मध्यस्थता करवा रहा है. उसी की पहल पर पिछले दिनों 100 से अधिक बंधक रिहा हुए थे.

2. दूसरा अपडेट इजरायल से है. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार केस की सुनवाई फिर से शुरू हो गई है. जंग के दौरान लागू आपातकाल के चलते सुनवाई रुकी हुई थी. पीएम नेतन्याहू पर फ्रॉड, रिश्वत लेने और ब्रीच ऑफ ट्रस्ट यानी भरोसा तोड़ने के आरोप हैं. इन्हें केस 1000, 2000 और 4000 के नाम से जाना जाता है. नेतन्याहू पर लगे आरोप सही साबित होते हैं तो उन्हें रिश्वतखोरी के मामले में 10 साल तक की जेल और जुर्माना या दोनों एक साथ हो सकते हैं. फ़्रॉड और ब्रीच ऑफ ट्रस्ट मामले में 3 साल तक की सजा का प्रावधान है.

3. तीसरा अपडेट वर्ल्ड बैंक से जुड़ा है. वर्ल्ड बैंक पर आरोप है कि उसने स्कूलों की एक ऐसी श्रृंखला को फंडिंग दी जहां साल दर साल बच्चों का यौन शोषण किया गया. ब्रिटिश अखबार 'द गार्डियन' की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ल्ड बैंक की यूनिट 'इंटरनेशनल फाइनेंस कारपोरेशन' ने 'ब्रिज इंटरनेशनल एकेडेमीज़' को फंडिंग की . बैंक के इंटरनल वॉचडॉग CAO ने कहा है कि कॉर्पोरेशन को उत्पीड़न के मामलों की जानकारी थी, फिर भी उन्होंने वहां ऐसे मामलों को रोकने के लिए कोई ऐसा कदम नहीं उठाया.

आज के दुनियादारी में बस इतना ही. शुभ रात्रि.

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