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नेपाल बाढ़: एवरेस्ट पर रेस्क्यू से भी ज्यादा मुश्किल है एयरलिफ्ट करना, पायलट्स ने बताई पूरी कहानी

Nepal Flood Rescue Operation: नेपाल में आई अचानक बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है. मलबे के बीच हेलीकॉप्टर से हजारों लोगों को रेस्क्यू किया गया. अधिकारियों का कहना है कि बाढ़ की भयावहता और नेपाल की प्राकृतिक चुनौतियों के बीच रेस्क्यू करना बहुत मुश्किल है.

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हेलीकॉप्टर से हजारों लोगों को रेस्क्यू किया गया. (फोटो: इंडिया टुडे)

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  • नेपाल में आई अचानक बाढ़ के कारण भारी तबाही के बाद, हजारों लोगों को हेलीकॉप्टर से रेस्क्यू किया गया जो अब तक का सबसे बड़ा ऑपरेशन था।
  • बाढ़ के बाद की परिस्थिति इतनी कठिन थी कि पायलटों को बिना कंट्रोल वाले एयरस्पेस में खुद नियम बनाकर घाटियों में घुमना पड़ा और लैंडिंग पॉइंट न होने की समस्या झेलनी पड़ी।
  • रेस्क्यू मिशन के दौरान हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल लोगों को बचाने, राहत सामग्री पहुँचाने और बाद में शव उठाने तक के लिए किया गया, जबकि झूठे अलर्ट ने ऑपरेशन की जटिलताओं को बढ़ाया।

नेपाल में अचानक आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई. कई सड़कें और पुल टूट गए. ऐसे में हेलीकॉप्टर के जरिए लोगों को रेस्क्यू किया जा रहा है. अधिकारियों ने बताया कि बाढ़ के बाद का यह रेस्क्यू ऑपरेशन बेहद खतरनाक था. यह माउंट एवरेस्ट के रेस्क्यू मिशन से भी कहीं ज्यादा मुश्किल था. एवरेस्ट पर ऊंचाई और खराब मौसम जैसी बड़ी चुनौतियां होती हैं. लेकिन इस बाढ़ के बाद के हालात एवरेस्ट से भी बदतर थे.

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नेपाल का सबसे बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन

अधिकारियों ने बताया कि यह शायद नेपाल का अब तक का सबसे बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन था. टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) की रिपोर्ट के मुताबिक, हजारों लोगों को एयरलिफ्ट किया गया. सिम्रिक एयर के कैप्टन बिमल शर्मा ने बताया कि यह ऑपरेशन माउंट एवरेस्ट के रेस्क्यू मिशन से भी कहीं ज्यादा मुश्किल था. आमतौर पर माउंट एवरेस्ट पर हर साल बीमार पर्वतारोहियों और गाइड को बचाने के लिए हेलीकॉप्टर भेजे जाते हैं. उन्होंने बताया, 

"एवरेस्ट पर चढ़ाई के मौसम में भी काफी व्यस्तता होती है, लेकिन वहां एक साफ मकसद होता है कि कहां जाना है और क्या करना है."

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उन्होंने कहा कि यहां अक्सर कोऑर्डिनेट्स मेल नहीं खाते थे और पायलट कभी-कभी ऐसी जगहों पर पहुंच जाते थे जहां लैंडिंग ग्राउंड ही गायब हो चुका होता था. कैप्टन ने आगे बताया,

"हमें आसपास खोजना पड़ता था. कुछ जगहों पर जहां हमें उतरने के लिए कहा गया, वहां उतरने की कोई जगह ही नहीं थी."

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पायलटों ने खुद बनाए थे नियम

कैप्टन बिमल शर्मा ने बताया कि बाढ़ प्रभावित इलाके में कोई अलग एयरपोर्ट नहीं था. इसलिए घाटी के अंदर पायलटों को बिना किसी कंट्रोल वाले एयरस्पेस में काम करना पड़ता था. पायलटों ने अपने नियम खुद बनाए थे. जैसे- घाटियों में बाईं तरफ रहना, अपनी पोजिशन बताना और ऊंचाई का अंतर बनाए रखना.

कैलाश हेलीकॉप्टर के कैप्टन मनिराज लामा ने बताया कि मिशन हर दिन बदलते रहते थे. शुरुआत में हेलीकॉप्टर डॉक्टरों और बचाव कर्मियों को बाढ़ प्रभावित इलाकों तक ले जाते थे और बचे हुए लोगों को बाहर निकालते थे. फिर वे खाना और राहत सामग्री पहुंचाने लगे. बाद में जब शव सड़ने लगे, तो हेलीकॉप्टरों ने कुछ शवों को भी उठाना शुरू किया.

झूठे अलर्ट की वजह से पायलटों को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा. पुराने और फेक वीडियोज कई दिनों तक सोशल मीडिया पर घूमते रहे. लेकिन जब हेलीकॉप्टर और ड्रोन ऐसी जगहों पर भेजे जाते, तो वहां कोई नहीं मिलता.

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