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'मनमोहन थे मौन, सोनिया थीं पीएम,' मोदी सरकार के हाथ लग गईं फाइलें

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने से पहले भूचाल आने वाला है राजनीति में.

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source Reuters

राजनीति में किस्सों को मौत नहीं आती. कब गढ़े मुर्दे उखाड़ कर सामने रख दिए जाएं नहीं पता. और ये मुर्दे आपका पीछा नहीं छोड़ते. अब मोदी सरकार कुछ खुलासा करने वाली है. और ये खुलासा वही है जो आपने खुद कई बार सुना होगा. वो ये कि यूपीए के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन नहीं बल्कि सोनिया गांधी सरकार चला रही थीं. मोदी सरकार को कुछ फाइलें हाथ लग गई हैं.  

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खबर में दावा किया गया है कि यूपीए सरकार NAC के ही इशारों पर चल रही थी. NAC सेंटर गवर्मेंट के किसी भी अफसर को 2 मोती लाल नेहरू प्लेस में बने ऑफिस में हाजिर होने का ऑर्डर जारी कर देती थीं. मंत्रियों को लैटर लिखकर उनसे रिपोर्ट मांगी जाती थी. जबकि NAC को गठित करते हुए कहा गया था कि यह सिर्फ सरकार को सलाह देने के लिए बनाई गई है. खबर में ये भी दावा किया गया है कि फाइलों से मिली जानकारी के मुताबिक मनमोहन सरकार के पास NAC के ऑर्डर को मानने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. और परिषद की सिफारिशों को लागू कर दिया जाता था.

मनमोहन सिंह सोनिया गांधी के दबाव में काम कर रहे थे. इस बात को साबित करते हुए मोदी सरकार 710 फाइलें सामने लाने के लिए सोच विचार कर रही है. ये फाइलें सोनिया गांधी की अध्यक्षता में बनी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) की हैं. जानकारी के मुताबिक इन फाइलों से ये क्लियर हो जाएगा कि मनमोहन किस तरह सोनिया गांधी के दबाव में काम कर रहे थे. और सोनिया गांधी का ये दबदबा पूरे 10 साल बना रहा. काम सोनिया गांधी करती रहीं और गलतियों का ठीकरा मनमोहन सिंह पर फूटता रहा. 2004 से 2014 तक चली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् की चेयरमैन खुद सोनिया गांधी थीं. द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक यूपीए सरकार के दौरान में 'NAC' कोयला, उर्जा, डिसइन्वेस्टमेंट, रियल एस्टेट, गवर्नेंस, सोशल और इंडस्ट्रियल सेक्टर के लिए बनने वाली सरकारी पॉलिसी में दखलअंदाजी करती थी. यानी सोनिया गांधी बिना किसी जवाबदेही के ही सरकार को पूरी तरह कंट्रोल किए हुए थीं. एक फाइल के हवाले से छापा गया है कि 29 अक्टूबर 2005 को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की बैठक हुई, जिसमें फैसला लिया गया, 'समिति की तमाम सिफारिशों को लागू कराने की ज़िम्मेदारी सरकारी एजेंसियों और संस्थाओं की होगी. साथ ही इसकी स्वतंत्रतापूर्वक निगरानी और मूल्यांकन भी किया जाएगा.' सवाल ये भी है कि क्या कांग्रेस अध्यक्ष और NAC की चेयरमैन सोनिया गांधी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर यकीन नहीं करती थीं, क्योंकि सिफारिशें लागू करने के ऑर्डर के अलावा परिषद उन पर निगरानी भी रखने की बात कहती थी. फाइलों में स्पष्ट है कि राष्ट्रीय सलाहाकार परिषद कई एजेडों पर अपनी सिफारिशें सरकार को भेजती थी. जैसे 21 फरवरी 2014 में सरकार को एक चिट्ठी लिखी गई, 'जिसमें लिखा था, 'NAC चेयरमैन की ओर से नॉर्थ-ईस्ट में खेलों को बढ़ावा देने से संबंधित सिफारिश सरकार को भेज दी गई है.' रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि देश में सहकारिता के विकास पर भी सिफारिशें सरकार को भेजी जाती रही हैं. जिसे सोनिया गांधी ने इजाज़त दी थी. ये खुलासे कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी कर सकते हैं, क्योंकि पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव सिर पर आ गए हैं. ऐसे में गढ़े मुर्दे बाहर आते हैं तो घबराहट बढ़नी तो तय है. https://www.youtube.com/watch?v=gAf2PZ7xm1Y https://www.youtube.com/watch?v=YKtdmjzRHVs
 

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