अग्नि-5 के परीक्षण के बाद भारत के पास सैटलाइट को मार गिराने की क्षमता है. ऐंटी सैटलाइट सिस्टम को अच्छे बूस्ट की जरूरत होती है. यह करीब 800 किलोमीटर है. अगर आप 800 किलोमीटर तक पहुंच सकते हैं और आपके पास निर्देशन प्रणाली है तो अंतरिक्ष में सैटलाइट को मार गिराया जा सकता है. भारत ने ऐंटी मिसाइल टेस्ट करके अपनी निर्देशन प्रणाली का टेस्ट पहले ही कर लिया है. हालंकि भारत इस तरह के टेस्ट नहीं करेगा. इस तरह के परीक्षण से अंतरिक्ष में मौजूदा उपग्रहों को नुकसान पहुंच सकता है.आज सफल परीक्षण के बाद डीआरडीओ के चीफ रहे वीके सारस्वत ने कहा-
ये अंतरिक्ष के क्षेत्र में बहुत बड़ी कामयाबी है. 2012 में मैंने अपने इंटरव्यू में कहा था भारत के पास बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस और अग्नि लॉन्च करने के बाद ऐसी क्षमता हो गई है कि हम एंटी सैटेलाइट वेपन भी बना सकते हैं. इस दिशा में हमें थोड़ा और काम करना होगा. अगर हम इस दिशा में आगे कदम बढ़ते हैं तो सफलता मिल जाएगी. मैंने ये भविष्यवाणी की थी. पिछले 4-5 सालों में वो जो एलिमेन्टस तैयार नहीं थे उन्हें तैयार किया गया. जो एलिमेंट्स से उन्हें इंटिग्रेट किया गया और एक ऐसे मिसाइल का रूप दिया गया जो लो अर्थ ऑर्बिट में घूमते हुए मिसाइल को खत्म कर सके. सरकार ने इस कार्य के लिए वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित किया और उन्हें रिसॉर्स मुहैया कराया. 2012 में हमने इस बारे में बात की थी. लेकिन तब तक हमें कोई निर्णय नहीं मिला था. ये निर्णय अभी ही हुआ है. मोदीजी के शासन काल में हुआ है. पिछले चार सालों में इस क्षमता को आगे बढ़ाया गया है.अंतरिक्ष से उभरते हुए खतरे से निपटने के लिए अंतरिक्ष सुरक्षा समन्वय समूह SSCG की स्थापना 2010 में की गई थी. कांग्रेस का कहना है कि एंटी सैटलाइट सिस्टम मिशन को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार के समय शुरू किया गया था जिसने आज सफलता हासिल की है. कांग्रेस के सीनियर नेता अहमद पटेल ने ट्वीट किया, इसके साथ ही एक मीडिया रिपोर्ट को भी अटैच किया. जवाब में केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि हमारे वैज्ञानिकों की ओर से पहले ही कहा गया था कि हम इसको करने के लिए सक्षम है, लेकिन यूपीए सरकार ने अनुमति नहीं दी थी. हमारी सरकार ने इसके लिए अनुमति दी. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक 2012 में डीआरडीओ के तत्कालीन चीफ वीके सारस्वत ने कहा था कि ASAT प्रोग्राम के लिए सरकार की ओर से इजाजत नहीं मिली थी. खैर अब यह तथ्य जरूर है कि भले ही यूपीए के वक्त यह तकनीक भारत के पास थी, लेकिन उसका परीक्षण नरेंद्र मोदी की सरकार में किया गया.
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