सारी सीटें साफ़ हो गईं, तो भी एक सीट थी जहां वोटों की गिनती पूरी नहीं हुई थी. इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर लिखा था. कि कांग्रेस 113 सीटें जीत गई है और एक पर आगे चल रही है. ये जो एक सीट अटकी हुई थी, उसका नाम है मेहगांव. ये भिंड जिले में पड़ती है. वहां कांग्रेस के उम्मीदवार थे ओ पी एस भदौरिया. उनके सामने थे बीजेपी के राकेश शुक्ला. दोनों के बीच 24 हज़ार से ज़्यादा वोटों का अंतर दिखा रहा था. मगर काउंटिंग पूरी नहीं हुई थी. साढ़े आठ बजे के करीब जाकर चुनाव आयोग ने वेबसाइट अपडेट की. बताया कि भदौरिया जीत गए हैं. ठीक 25,814 वोटों से. भिंड की सबसे बड़ी विधानसभा सीट है मेहगांव. 290 के करीब पोलिंग बूथ थे यहां पर. वैसे चुनाव आयोग ने अपनी वेबसाइट अपडेट करने से तकरीबन डेढ़ घंटे पहले, सुबह सात बजे के आसपास भदौरिया को जीत का सर्टिफिकेट दे दिया था.

ये मेहगांव सीट के रिज़ल्ट का पेज है. सुबह तकरीबन साढ़े आठ बजे रिज़ल्ट क्लियर हुआ है. उसके पहले तक काउंटिंग चालू है ही लिखा आ रहा था.
इस सीट पर काउंटिंग इतनी क्यों खिंची? ये जानने के लिए हमने ग्वालियर में 'आज तक' से जुड़े पत्रकार सर्वेश पुरोहित से बात की. उन्होंने बताया कि इस सीट पर 23 राउंड की गिनती हुई. एक गड़बड़ी ये हुई कि वोटिंग शुरू होने से पहले EVM मशीन पर जो मॉक पोल होता है, उसमें दर्ज वोट डिलीट नहीं हुए थे. मतदान से पहले राजनैतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों, उम्मीदवारों के सामने EVM मशीन की टेस्टिंग की जाती है. ताकि उन्हें ये भरोसा हो कि EVM ठीक काम कर रही है. इसमें झूठमूठ की वोटिंग होती है. इसी को मॉक पोल कहते हैं. फिर असली मतदान शुरू होने से पहले पोलिंग ऑफिसर उस मॉक पोल का डेटा डिलीट कर देता है. जब ऐसा नहीं होता, तो असली वोटिंग और EVM में दर्ज वोटों के बीच अंतर आ जाता है. जिन मशीनों में भी ये दिक्कत आई, उन्हें आखिरी राउंड में VVPAT की पर्चियों के साथ मैच किया गया.

इलेक्शन कमिशन की वेबसाइट पर ये फाइनल रिज़ल्ट 12 दिसंबर की सुबह आया.
फिर बाकी मध्य प्रदेश में क्यों धीमी हुई काउंटिंग? ये वाला कारण छोड़ दें, तब भी मध्य प्रदेश में काउंटिंग काफी धीमी थी इस बार. आधी रात तक चुनाव आयोग ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर बस 170 सीटों के रिज़ल्ट का ही ऐलान किया था. 60 सीटों का नतीज़ा आना बाकी था. इसकी एक बड़ी वज़ह ये थी इस बार चुनाव आयोग ने नतीजों के ऐलान में ज़्यादा सावधानी बरती. कोशिश थी कि विवाद और कन्फ्यूजन का स्कोप ही न रहे. और कोई ग़लती भी न हो, ताकि किरकिरी से बचा जा सके. इसी वजह से रिज़ल्ट ऐलान करने में भी अतिरिक्त सावधानी बरती गई.
क्या शिवराज के कहने पर कलेक्टरों ने परिणाम लेट किए?
सोशल मीडिया पर इस बात के खूब चर्चे हैं कि मध्यप्रदेश में चुनाव परिणाम इसलिए लेट आए क्योंकि प्रदेश की भाजपा सरकार (जो अब भूतपूर्व हो गई है), का दबाव ज़िला कलेक्टरों पर था. कि 'सेटिंग' कर लें. ये एक गंभीर आरोप है. लेकिन ऐसा होने की संभावना बेहद कम है. देरी की वजह ज़्यादातर जगह यही रही कि मध्य प्रदेश में कई सीटों पर बड़ा करीबी मुकाबला था. जैसे ग्वालियर दक्षिण सीट कांग्रेस के प्रवीण पाठक ने मात्र 121 वोटों से बीजेपी के नारायण सिंह कुशवाह को हराया. जबलपुर नॉर्थ में कांग्रेस के विनय सक्सेना 578 वोट से जीते. जाओरा में बीजेपी के राजेंद्र पाण्डेय बस 511 वोटों से जीते. बीना में बीजेपी के महेश राय 632 वोट से जीते.
इसी तरह दामोह में कांग्रेस के राहुल सिंह ने बस 798 वोट से बीजेपी के जयंत मलैया को हराया. ऐसा ही कोलारस में हुआ जहां 720 वोटों ने बीजेपी के बीरेंद्र रघुवंशी को जिताया. ऐसा होने पर जीतने और हारने वाले दोनों प्रत्याशी ढेर सारी आपत्तियां लेते हैं. प्रशासन भी कम मार्जिन के कारण और भी ज़्यादा सावधानी बरतता है.
और ऐसा भी नहीं है कि रात 12 तक सिर्फ मध्यप्रदेश के नतीजे रुके थे. छत्तीसगढ़ की पाटन सीट के नतीजे भी चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर देर रात तक नहीं थे. 'काउंटिंग इन प्रोग्रेस' लिखा आ रहा था. जबकि पाटन में कांग्रेस के भूपेश बघेल बहुत आगे चल रहे थे. और ये साफ भी हो गया था कि छत्तीसगढ़ में सरकार कांग्रेस की ही बननी है. तो इसी तरह के कई कारण होते हैं जिनसे नतीजे लेट हो जाया करते हैं.
जहां किसानों पर गोली चली वहां बीजेपी हारी या जीती ये जानना नहीं चाहेंगे ?





















