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शराब में धुत औरत का पुलिसवाले को जबरन किस करना भी यौन उत्पीड़न ही है

'इज़्जत' मर्दों की भी होती है और रेप औरतें भी करती हैं.

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फोटो - thelallantop
जब हम 'यौन उत्पीड़न' के बारे में सोचते हैं, तब हमारे दिमाग में एक तस्तीर बनती है. उस तस्वीर में एक आदमी अपने आप को एक औरत पर जबरन थोपता नज़र आता है. ऐसा क्यों? क्योंकि हमें लगता है 'इज़्जत' सिर्फ़ औरतों की होती है और मर्दों के पास ऐसा कुछ नहीं होता जिसे 'लूटा' जा सके. वैसे 'इज़्ज़त' शब्द जिस अर्थ में प्रचलित है, वो कॉन्सेप्ट ही बेहूदा है. लेकिन ये कहने में कोई हर्ज़ नहीं कि किसी औरत की ही तरह मर्द के मन पर भी हिंसा से खरोच पड़ सकती है. ये सच किसी से छुपा नहीं कि रेप औरतें भी करती हैं.
किसी के साथ रेप होने से उसकी इज़्जत नहीं चली जाती. लेकिन आत्मा को आघात होता है. कोलकाता में 26 जुलाई को देर रात एक औरत शराब में धुत होकर गाड़ी चला रही थी. उसके साथ गाड़ी में उसका पति और एक और औरत थी. गाड़ी चिंग्रिघाटा मोड़ पर डिवाइडर से टकरा गई. मौके पर एक पुलिसवाला आया तो औरत ने उसे गले लगाना और ज़बरदस्ती किस करना शुरू कर दिया.
 
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पुलिसवाले ने वहां मौजूद एक और औरत की मदद ली और तीनों को थाने लेकर गया. सुबह तक तीनों को छोड़ दिया गया.
औरत पर केस किस जुर्म का दर्ज हुआ?
शराब पीकर तेज़ गाड़ी चलाने का.
अब एक बार के लिए इस वाकये को पलट दीजिए. अगर पुलिसवाले ने जबरन औरत को किस करना शुरू कर दिया होता तो अब तक हमारे देश में कोलकाता पुलिस के खिलाफ़ हैशटैग(#) चल चुके होते. लेकिन एक औरत का ऐसा करना लोगों को पुलिसवाले पर 'यौन उत्पीड़न' नहीं लगा. क्योंकि हमारे समाज में महिलाओं और पुरुषों की एक छवि बनी हुई है. छवि ये कि महिलाएं कमज़ोर होती हैं और वो पुरुषों का रेप नहीं कर सकतीं. पुरुषों की छवि ऐसी कि दुनिया का कौन सा मर्द होगा जो किसी औरत को 'इस चीज़' के लिए मना करेगा?
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इस मामले में मीडिया द्वारा दी गई हैडिंग

महिला पर 'यौन उत्पीड़न' का केस दर्ज नहीं किया गया. पुलिसवाले ने भी इस पर वो प्रतिक्रिया नहीं दिखाई जिसकी ज़रूरत है. जो पुरुषवादी सोच औरतों को पीटने को जस्टिफाई करती है, वही पुरुष के पिटने पर कहती है, ‘औरत से पिट गए?’. दिक्कत यही है, हम समाज में बराबरी की बात करते हैं और 'यौन उत्पीड़न' के मामले में औरत और पुरुष को अलग-अलग तराजू में तोलते हैं. जहां सामने वाले की स्वीकृति न हो, वहां हरकतें 'यौन उत्पीड़न' बन जाती हैं. उसे सेक्स या 'पैशनेट किस' से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. कुछ मीडिया संस्थानों ने इस मामले में जो रुख लिया वो बहुत गलत था. यहां कहीं भी पुलिसवाले की हामी नहीं थी. लेकिन इसे 'यौन उत्पीड़न' की बजाए महज़ 'किस' या 'चूमे जाने' का नाम दिया गया.
किसी लड़के की मर्जी को कुचलकर, उसे बहला-फुसलाकर या उसके साथ जबरन सेक्स करके लड़की भी यही साबित करने की कोशिश कर रही होती है कि वो ज़्यादा ताकतवर है. सहमति के साथ सेक्स से कोसों दूर हमने ये मान लिया है कि बिस्तर पर हावी और आक्रामक होना ज़रूरी है और जो ऐसा कर पाएगा, वो ज़्यादा ताकतवर माना जाएगा.
जब हम ऐसी खबरें पढ़ते हैं कि महिला ने पुरुष के साथ ज़बरदस्ती की, तो ऐसे आंखें मूंद लेते हैं, जैसे वो कोई अपराध न हो. जबकि किसी महिला का रेप करना उतना ही बुरा, खतरनाक, डरावना और हिंसक है, जितना किसी पुरुष का रेप करना.


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