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किशोरों में यौन संबंध को 'अपराध ना माना जाए', रोमियो-जूलियट एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर

याचिका में कहा गया है कि किशोर (18 से कम उम्र के) अपनी मर्जी से शारीरिक संबंध बनाते हैं, लेकिन इसे कानूनी तौर पर अपराध माना जाता है.

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याचिका में तर्क दिया गया है किशोरों के पास इतना दिमाग होता है कि वो जोखिम समझकर सही फैसला ले सकें. ऐसे में एक पक्ष को परेशान करने का कोई मतलब नहीं है. (फोटो- आजतक)

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में किशोरों के बीच सहमति से बने यौन संबंधों से जुड़ी एक याचिका दायर की गई है. याचिका में कहा गया है कि सहमति से बने संबंधों को अपराध न माना जाए. आम बोलचाल में इसे ‘रोमियो-जूलिएट कानून’ कह दिया जाता है. कोर्ट ने इसको लेकर केंद्र सरकार को तलब किया है. 

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नाबालिग यौन संबंध पर क्या है कानून?

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में दावा किया गया है कि किशोर (18 से कम उम्र के) अपनी मर्जी से शारीरिक संबंध बनाते हैं, लेकिन इसे कानूनी तौर पर अपराध माना जाता है. ये दुष्कर्म की श्रेणी में आता है. कानून के मुताबिक, कई मामलों में लड़के को उस वक्त सजा होती है, जब लड़की प्रेग्नेंट हो जाती है. जिसके बाद मां-बाप पुलिस के पास शिकायत लेकर पहुंचते हैं.

रोमियो और जूलिएट कानून को लेकर क्या मांग की गई?

सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका वकील हर्ष विभोर सिंघल ने दायर की है. ये नाबालिगों के बीच यौन संबंधों के मामलों में दुष्कर्म से जुड़े कानून को चुनौती देती है. याचिका में मांग की गई है कि संविधान के आर्टिकल 32 या आर्टिकल 142 में दिए गए अधिकार का इस्तेमाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ऐसे निर्देश जारी करे, जिससे 16 से 18 साल के किशोरों में सहमति से बने संबंध अपराध की श्रेणी से बाहर हों.

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याचिका में तर्क दिया गया है किशोरों के पास इतना दिमाग होता है कि वो जोखिम समझकर सही फैसला ले सकें. ऐसे में एक पक्ष को परेशान करने का कोई मतलब नहीं है.

क्यों जरूरत महसूस हुई?

ये कोई पहली बार नहीं है कि रोमियो-जूलिएट कानून के बारे में बात हो रही हो. याचिका दायर होने से पहले खुद सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इस बारे में बात की थी. उन्होंने कहा था कि पॉक्सो जैसे कानून की वजह से सहमति से बने संबंधों में भी एक पक्ष काफी परेशानी झेलता है. जबकि एक उम्र के बाद बच्चे अपने मन और शरीर का जोखिम समझते हुए फैसला ले सकते हैं. 

भारत में रोमियो- जूलियट कानून को लागू करने की बात भले ही अब शुरू हुई हो, लेकिन कई ऐसे देश हैं जहां पहले से ही यह कानून लागू है. ये कानून नाबालिगों के बीच संबंधों के मामले में सुरक्षा प्रदान करता है. आसान भाषा में समझें तो अगर यौन संबंध बनाने वाले दो लोगों के बीच आपसी सहमति हो और लड़का-लड़की के बीच बहुत ज्यादा उम्र का अंतर ना हो तो ऐसी स्थिति में उसे यौन शोषण नहीं माना जाएगा.

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इस कानून को साल 2007 के बाद से कई देशों में अपनाया गया है. ताकि लड़कों को गिरफ्तारी से बचाया जा सके. आसान शब्दों में समझें तो, अगर किसी लड़के की उम्र नाबालिग लड़की की उम्र से चार साल से ज्यादा नहीं है, और वह आपसी सहमति से संबंध बनाता है तो वो कानून की नजर में दोषी नहीं माना जाएगा. 

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