The Lallantop

लोग क्या कहेंगे, क्या जज भी ये सोचकर फैसले देते हैं?

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जज ने बताया, राजद्रोह के केसों को लेकर जजों के दिमाग में क्या चलता है

Advertisement
post-main-image
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जज जस्टिस श्रीधरन ने एक वेबिनार के दौरान कहा कि जज भी इंसान होते हैं. केसों की सुनवाई करते वक्त 'लोग क्या कहेंगे' जैसी बातें उनके मन में भी रहती हैं. (फोटो CAN Foundation वेबिनार से)
जब देश में राजद्रोह (Sedition) के आरोप में अक्सर केस दर्ज हो रहे हैं, ऐसे में हाई कोर्ट के जज ने इन मामलों की सुनवाई को लेकर बड़ा सवाल उठाया है. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन (Justice Atul Sreedharan) ने रविवार को कहा कि जजों को राजद्रोह यानी सेडिशन के मामलों में बेल देने में काफी मानसिक दवाब का सामना करना पड़ता है. जज के अवचेतन मन पर भी अपराध के स्वभाव और उस पर बन रही जनभावना का असर पड़ता है. जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि निचली अदालत में ज्यादातर जज आरोपी को जेल भेज देते हैं. वह मान कर चलते हैं कि हाई कोर्ट से बेल मिल जाएगी.
जस्टिस अतुल श्रीधरन ने यह बात एक वेबिनार (Webinar) के दौरान कही. वेबिनार में 'जमानत नियम है, जेल अपवाद है' (Bail is rule Jail is exception) को लेकर चर्चा हो रही थी. जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि जज भी इंसान होते हैं और जब किसी पर देशद्रोह जैसे अपराध का आरोप लगता है तो सुनवाई के वक्त उसका असर जजों के दिमाग पर भी पड़ता है. जस्टिस श्रीधरन के अनुसार,
आजकल देशद्रोह को लेकर बहुत मामले आ रहे हैं. ये सेडिशन का केस बनता है. सेडिशन को सिद्ध करना बहुत मुश्किल है. लेकिन जब सेडिशन की धाराओं में किसी पर केस दायर किया जाता है, जज बेल नहीं देना चाहता. क्यों? लोग क्या कहेंगे! यह कहना बहुत आसान है कि एक जज स्वतंत्र होता है. ये सब ठीक है, लेकिन जज भी तो इंसान है. उसके अवचेतन स्तर पर यह बात काम करती है कि अपराध किस तरह का है. एक इंसान को इसलिए बंद कर दिया गया है क्योंकि वह राज द्रोही है और वह स्टेट के विरुद्ध काम कर रहा है. क्यों, उसका अपराध क्या है? आरोपी को बोलने का अधिकार मिला है और उसे लगता है कि उसे बोलना चाहिए. ऐसा करने पर उसे चिन्हित किया जाता है. इस तरह के कानून संकट पैदा करते हैं.
चर्चा में शामिल मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के दूसरे जज जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल ने इससे अलग राय व्यक्त की. उनका कहना था कि मीडिया या जनभावना के दबाव जैसी कोई चीज़ नहीं होती. उन्होंने कहा कि वह ऐसा दबाव कभी महसूस नहीं करते. उन्होंने स्वीकारा कि वह अखबार ही नहीं पढ़ते क्योंकि उन्हें लगता है कि अखबार में ऐसी कोई जानकारी नहीं होती जिसे न पढ़कर कोई समाज का कोई नुकसान हो रहा है. POCSO एक्ट पर भी उठाए सवाल जस्टिस अतुल श्रीधरन ने निर्भया केस के दौरान पॉक्सो एक्ट में सजा के सख्त प्रावधानों पर चर्चा की. जस्टिस श्रीधरन के अनुसार निर्भया केस के दौरान जनता के गुस्से को देखते हुए पॉक्सो एक्ट में जो सख्ती बढ़ाई गई, उसकी वजह से बाद के मामलों में कई ऐसे लोग भी जेल जा रहे हैं, जिनका जुर्म निर्भया के आरोपियों से काफी कम था. जस्टिस अतुल श्रीधरन ने कहा
एक केस था जिसमें एक आरोपी को 10 साल बाद सजा दी गई. यह बलात्कार का मामला था. रेप के वक्त लड़की की उम्र 16 साल थी और लड़के की 19 साल. दोनों फरार हो गए थे. दो साल बाद दोनों को गिरफ्तार करके वापस लाया गया. युवक पर केस दर्ज हुआ और उस पर आरोप सिद्ध हुआ. उसे 10 साल की सजा हुई. उसकी पत्नी कोर्ट में अपने बच्चे को गोद में लेकर मौजूद थी. उसने कहा कि अगर आप सजा को नहीं रोकते तो बता दीजिए कि मेरी और मेरे बच्चे की देखभाल कौन करेगा. क्या सरकार करेगी?
जस्टिस श्रीधरन के अनुसार ऐसे मामलों में कम्यूनिटी सर्विस की सजा देना 10 साल जेल भेजने से बेहतर साबित होती.
Mphigh Court
जस्टिस श्रीधरन ने पोक्सो एक्ट के तहत उनके सामने पेश हुए एक केस के उदाहरण के जरिए बताया कि बेल न देने से कैसी दिक्कतें पैदा हो जाती हैं.

जस्टिस श्रीधरन ने ट्रिपल तलाक के कानून में भी मुजरिम को जेल भेजने के प्रावधान पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा
क्या होगा जब एक कृत्य बहुत दिनों तक कानूनन वैध था, लेकिन अचानक इसे अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया. हम हाल में लाए गए ट्रिपल तलाक के कानून का उदाहरण ले सकते हैं. यह पहले इस देश में सामान्य और कानूनन वैध था. सरकार इसे गैरकानूनी बना सकती है. इसमें कोई दिक्कत भी नहीं है. समस्या वहां पर खड़ी होती है, जब इसे एक आपराधिक कृत्य करार दे दिया जाता है.
जस्टिस श्रीधरन ने इस तरह के दूसरे मामलों में कोर्ट को कम्यूनिटी सर्विस जैसी सजा देने के लिए सक्षम बनाने पर जोर दिया. इस वेबिनार में जस्टिस श्रीधरन के साथ मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल, सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील सिद्धार्थ लूथर भी मौजूद थे. वैसे कानून के जानकार ट्रिपल तलाक पर कानून बनने के वक्त भी इस बात पर सवाल उठाते रहे हैं कि तलाक देने वाले पुरुष को जेल भेजना कितना सही होगा. उनका तर्क यह रहता है कि जेल भेज कर कानून फैसला तो कर देता है लेकिन मुजरिम की पत्नी और बच्चे बाहर कैसे गुजारा करेंगे, इस पर कोई नहीं सोचता.

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement