दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं. एक वो जो फिल्में बनाते हैं, दूसरे वो जो फिल्में देखते हैं. देखने वाले कैसे भी हों, लेकिन अगर फिल्म बनाने वाले अपना काम गोड़ दें, तो बड़ी तकलीफ होती है. भाई इमोशनल मामला है अपना फिल्मों के साथ. ज़िंदगी में कुछ भले लोग ऐसे मिले, जिन्होंने फिल्में देखना सिखाया. पता चला कि डायरेक्टर कैसे झंडू एक्टर से भी काम निकलवा सकता है, कैसे खराब एडिटिंग पूरी फिल्म की दइय्या कर देती है. ये सारी बातें आपको इसलिए बता रहा हूं, क्योंकि 'जिया और जिया' देखने गया था. अब उसका रिव्यू लिखना है.
फिल्म रिव्यू: जिया और जिया
वो फिल्म, जिसकी कहानी आपको अचानक से 'आनंद' और 'दि बकेट लिस्ट' की याद दिला देती है.

फिल्म के डायरेक्टर हैं हॉवर्ड रोज़मेयर. ये इनकी पहली फिल्म है. हॉवर्ड को ये तो पता है कि फिल्म में क्या-क्या दिखाना है, लेकिन कैसे दिखाना है, कितनी इंटेंसिटी से दिखाना है, कितनी खूबसूरती से दिखाना है, ये नहीं पता है. 'जिया और जिया' दो लड़कियों की कहानी है, जो साथ में एक टूर पर स्वीडन जाती हैं. एक लड़की जीना नहीं चाहती है. वो खुदकुशी के मकसद से स्वीडन जाती है, जबकि दूसरी को कैंसर है, वो मर रही है, फिर भी अपनी बची-खुची ज़िंदगी हंसते-खेलते बिताना चाहती है. ये दोनों कैरेक्टर कल्कि कोचलिन और ऋचा चड्ढा ने प्ले किए हैं.

डायरेक्टर हॉवर्ड रोज़मेयर
फिल्म की कहानी और कॉन्सेप्ट शानदार है. हमने अब तक 'दिल चाहता है' और 'ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा' जैसे कई फिल्में देखी हैं, जिसमें लड़के ट्रिप पर जाते हैं. अगर सिर्फ लड़कियां किसी ट्रिप पर जाएं, तो उनका एक्सपीरियंस दिखाने वाली फिल्में कम ही बनी हैं. हॉवर्ड ने इस पर फिल्म बनाई, अच्छी बात है. उनकी कहानी ऐसी है, जो आपको बीच-बीच में 'आनंद' और 'दि बकेट लिस्ट' की याद दिलाती है, लेकिन इन फिल्मों का ख्याल आते ही आपको झटका लगता है कि 'जिया और जिया' औसत से भी कम है. और फिल्म के लीड अपोज़िट- अर्सलन गोनी... उनसे अच्छी एक्टिंग तो एक सीन में दिखा रेस्ट्रॉन्ट का वेटर करता है.

'दि बकेट लिस्ट' के एक सीन में जैक निकोलसन और मॉर्गन फ्रीमैन
फिल्म में कई मोटी गलतियां हैं. शुरुआत में दोनों लड़कियों के कैरेक्टर मजबूती से स्टैबलिश नहीं किए गए. आपको इंतज़ार करना पड़ता है उनकी बाकी चीजें जानने के लिए. फिल्म की एडिटिंग कमज़ोर है. जैसे फिल्म में किसी शहर को स्थापित करने के लिए उसके कुछ शॉट दिखाए जाते हैं. उन्हें ज़रा ठहरकर दिखाते हैं, ताकि दर्शक कनेक्ट करे. इस फिल्म में हर चीज... मतलब हर चीज स्क्रीन पर आती है और चली जाती है. कहानी एकदम फ्लैट चल रही होती है. कोई उतार-चढ़ाव नहीं. कैमरा कहीं भी जूम-इन जूम-आउट होता रहता है. इससे ज्यादा वैरिएशन तो मच्छरों की तान में होता है.

फिल्म का एक दृश्य
और कुछ स्टीरियोटाइप भी हैं. स्वीडन में वहां की लड़कियां कल्कि और ऋचा के साथ हिंदी गाने पर डांस कर रही हैं. पार्टी करते-करते ऋचा न जाने कैसे बौरा जाती हैं और सुसाइड करने चल देती हैं. कल्कि का एक्सिडेंट होता है, तो उन्हें वहां तुरंत हिंदी बोलने वाला डॉक्टर मिल जाता है. भयंकर बीमारी की हालत में कल्कि जब ऋचा को खोजने निकलती हैं, तो गाड़ी के बजाय पैदल घूमती हैं. मतलब चीजें सामने दिख रही होती हैं कि भाई, ऐसा न किया होता, तो फिल्म कुछ देखने लायक हो जाती. डायलॉग पर मेहनत हुई है, लेकिन कहीं-कहीं ज्यादा ही मेहनत हो गई. फिर वो ज्यादा ड्रमैटिक लगने लगता है.

फिल्म का एक दृश्य
हॉवर्ड की ये पहली फिल्म है. उन्होंने अच्छी कहानी उठाई. अगर उनके अंदर वाकई कोई डायरेक्टर है, तो शायद उनकी अगली फिल्म में कुछ बेहतरी दिखे. अगर ऐसा नहीं होता है, तो उन्हें फिल्में बनानी बंद कर देनी चाहिए. कम बजट का असर दिख रहा था, पर डायरेक्शन कमज़ोर था. कल्कि और ऋचा जैसी बेहतरीन एक्ट्रेसेस को हम पूरी फिल्म में एक ही एक्सप्रेशन के साथ नहीं देख सकते. उन्होंने खुद से अच्छी कोशिश की, पर ऐसी कहानी के साथ उनसे बहुत कुछ निकलवाया जा सकता था.
देखिए 'जिया और जिया' का ट्रेलर
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