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वो अनुपम खेर बहुत पीछे छूट गया जो एक कलाकार ज्यादा था और बाकी सब कम

बुधवार को पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट का नया चेयरमैन अनुपम खेर को बनाया गया. वे गजेंद्र चौहान का स्थान लेंगे.

अनुपम खेर को ‘हम आपके हैं कौन’ में देखा था 1994 में. फिल्म दो बार बीकानेर के सूरज टॉकीज़ में देखी. दोनों ही बार जहां वो आए बहुत ठंडक मिली. प्रो. सिद्धार्थ का उनका किरदार एकदम मस्तमौला है. पत्नी और बेटियां उसकी मौजूदगी में चहकती हैं, हंसती हैं, मज़ाक करती हैं. उसके आसपास का माहौल बहुत आज़ाद है.

वो खुश रहता है और खुश रखता है.

"हम आपके हैं कौन" में प्रोफेसर बने अनुपम और उनकी बेटी निशा, पूजा औऱ पत्नी के रोल में माधुरी दीक्षित, रेणुका शहाणे और रीमा लागू. (फोटोः राजश्री)
“हम आपके हैं कौन” में प्रोफेसर बने अनुपम और उनकी बेटी निशा, पूजा औऱ पत्नी के रोल में माधुरी दीक्षित, रेणुका शहाणे और रीमा लागू. (फोटोः राजश्री)

1995 में ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ आई. मिनर्वा थियेटर में दो बार देखी. बहुत ही कूल लड़के राज के पिता के रोल में अनुपम थे. नाम था धर्मवीर मल्होत्रा. एक धनी आदमी. विदेश में रहता है. बेटा फेल हो जाता है तो वो उसे पीटता नहीं है बल्कि अपने पुरखों की फोटोज़ के सामने बारी-बारी से ले जाता है और कहता है तुमने तो इनकी परंपरा आगे बढ़ाई है, तुम इनसे भी ऊपर की कक्षा में जाकर फेल हुए. वो बेटे के साथ बीयर भी पीता है. उसे उसका प्यार दिलाने इंडिया, पंजाब चला जाता है. वो पिता से ज्यादा दोस्त होता है.

"दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे" में शाहरुख और अनुपम. (फोटोः यशराज फिल्म्स)
“दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे” में शाहरुख और अनुपम. (फोटोः यशराज फिल्म्स)

अगले साल आई महेश भट्ट की ‘चाहत’ में उन्होंने गाने-बजाने वाले शंभु राठौड़ का रोल किया. एक पिता जिसका अपने बेटे (शाहरुख) से प्रेम और दोस्ती का रिश्ता है.

फिल्म 'चाहत' में राजस्थानी गायकों के रोल में बेटा रूप और पिता शंभू. (फोटोः रेड चिलीज़ एंटरटेनमेंट)
‘चाहत’ में राजस्थानी गायकों के रोल में बेटा रूप और पिता शंभू. (फोटोः रेड चिलीज़ एंटरटेनमेंट)

उनकी ‘रूप की रानी चोरों का राजा’ 1993 में सूरज टॉकीज़ में देखी थी. विशुद्ध मनोरंजन. उड़ते कबूतरों और उनकी फड़फड़ाहट के बीच वो जुगरान आज भी याद है जो विलेन था. अनुपम का डबल रोल था. फिल्म फ्लॉप हो गई थी बुरी तरह लेकिन मुझे बहुत अच्छी लगी थी. बड़े परदे पर शुरुआती अनुभव होने की वजह से.

'रूप की रानी चोरों का राजा' में जुगरान के नेगेटिव रोल में अनुपम.
‘रूप की रानी चोरों का राजा’ में जुगरान के नेगेटिव रोल में अनुपम.

‘सारांश’ में बुजुर्ग बी. बी. प्रधान के पात्र में उन्होंने अवाक कर दिया था. ये 1982 में रिलीज हुई उनकी शुरुआती फिल्म थी. जिंदगी, मौत, मानवता, आशा, निराशा, हौसले की कहानी. जिंदगी बिना मकसद की हो जाए और जीने की इच्छा न बचे तो ये फिल्म मार्ग दिखाती है. इसे देखते हुए मैंने एक बात लिख ली थी जो अंत में डायरेक्टर महेश भट्ट अनुपम के पात्र के जरिए कहते हैं:

मेरा अंत है
तुम्हारा अंत है
लेकिन, जीवन
ये तो अन्तहीन है
अनन्त है.

'सारांश' को 1985 में भारत की ऑफिशियल एंट्री के तौर पर ऑस्कर में भेजा गया था.
‘सारांश’ को 1985 में भारत की ऑफिशियल एंट्री के तौर पर ऑस्कर में भेजा गया था.

अनुपम ने अब तक जो भी 500 के करीब फिल्में की हैं, उनमें उनकी फिल्में ऐसी रही हैं जो छोटी जगहों और कस्बों के दर्शकों तक शुरू से पहुंचती रही हैं. उन्होंने हर तरह का रोल किया है. Critical acclaim और कमाई को अच्छे से बैलेंस किया है. सब बड़े फिल्ममेकर्स और निर्माताओं से उनके बड़े अच्छे रिश्ते हैं और ये नेटवर्किंग ही है जो बॉलीवुड में आपको रोजगार दिलाती रहती है. बहुत अच्छे-अच्छे एक्टर हैं जो खाली बैठे हैं क्योंकि वो अनुपम की तरह नेटवर्किंग को नहीं समझते.

हिमाचल जैसी पोलिटिकली शांत समझी जाने वाली जगह से आए अनुपम खेर महत्वाकांक्षी रहे हैं. उनमें काम, सम्मान और पावर की भूख साफ देखी जा सकती है. पहले उन्हें अभिनय में मुकाम पाना था जो उन्होंने पाया. आर्थिक समृद्धि पानी थी वो उन्होंने कमर्शियल सिनेमा को बिना सवाल किए पूरी तरह स्वीकार करके पाई. मसलन, 2012 में उन्होंने ‘क्या सुपरकूल हैं हम’ की. जिसमें उन्होंने एक रईस पागल फ्रांसिस मार्लो का रोल किया जिसका उच्चारण ‘मार लो’ किया जाता है. फिल्म में एक कुत्ते का नाम फकरू रखा गया है जो सुनने में भारत के पांचवें राष्ट्रपति फक़रुद्दीन अली अहमद जैसा लगता है. फिल्म में एक कुतिया रोज़ मैरी मार्लो को उसकी मां बनाया जाता है जिसका नाम पुकारा जाता है ‘रोज़ मेरी मार-लो.’ एक सीन में सिड (रितेश देशमुख) का कुत्ता आकर रोज़ के साथ संभोग करके चला जाता है, तो अनुपम का कैरेक्टर मारलो रुआंसा हो जाता है कि तमाम नौकरों के सामने भरे गार्डन में उसकी मां की इज्जत लुट गई.

'क्या सुपर कूल हैं हम' में मार्लो बने अनुपम और बेटियों के रोल में नेहा शर्मा और साराह ज़ेन डियेज.
‘क्या सुपर कूल हैं हम’ में मार्लो बने अनुपम और बेटियों के रोल में नेहा शर्मा और साराह ज़ेन डियेज.

जब बॉलीवुड में अनुपम को सम्मान और पर्याप्त पैसा मिल गया तो वो आगे के मैदान की ओर बढ़े. उन्होंने खुद को पोलिटिकली एक्टिव किया.

उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को सपोर्ट करना शुरू किया. कश्मीरी पंडितों के साथ ज्यादती हुई वो उनका रेफरेंस पॉइंट रहता है. ये विषय ऐसा है कि आप आराम से अपना पोलिटिकल करियर बना सकते हैं. उन्हें पता रहा होगा कि बैठे-बैठे इतिहास के पन्नों में पद्म पुरस्कारों के साथ जगह नहीं मिलेगी. सरकारों के बारे में ये अघोषित सत्य है कि वो अपने फेवरेट्स को राज पुरस्कार जरूर दिलवाती हैं. 2004 में कांग्रेस की सरकार आई और अगले ही साल शाहरुख खान को पद्मश्री दे दिया गया. राहुल गांधी, प्रियंका-रॉबर्ट वाड्रा और उनके बच्चों के साथ शाहरुख का पूरा परिवार क्रिकेट मैच के दौरान या अन्य मौकों पर दिखता रहा है.

पिछली बार जब भाजपा की सरकार थी 1998 से 2004 के बीच और जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तब अनुपम को बहुत बरकत हुई. 2001 में उन्हें उसी नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा सोसायटी का चेयरमैन बनाया गया जिसमें वो पढ़े थे. 2003 में उन्हें CBFC यानी सेंसर बोर्ड का चेयरपर्सन नियुक्त किया गया. और सरकार जाने से पहले 2004 में उन्हें पद्मश्री दे दिया गया.

इस बार फिर भाजपा की सरकार आई तब से अनुपम बहुत ताकतवर हैं. वे बॉलीवुड में बहुत हाई प्रोफाइल हो गए हैं. सरकार आते ही उन्होंने बहुत अग्रेसिव होकर उनकी विचारधारा और एजेंडा पुश करने शुरू कर दिए थे. इस बार भी उन्हें बरकत हुई है. 2016 में उन्हें पद्म भूषण दिया गया. भारत के तीसरा सबसे ऊंचा नागरिक सम्मान. और इस साल अब उन्हें फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे का चेयरमैन बना दिया गया है.

अब यहां आते-आते दो अनुपम खेर नजर आते हैं. एक वो जो अभिनय का जुनून रखता है, कलाकार है और एक्टिंग की बातें करते हुए जिसकी आंखों में चमक आ जाती है. अगस्त 2014 में उनके टीवी कार्यक्रम ‘द अनुपम खेर शो’ में मेहमान के तौर पर नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी को बुलाया गया था. वहां वे एक-एक सवाल पूछते हुए प्रफुल्लित हो रहे थे. ओम पुरी ने प्रवेश किया तो अनुपम उनके पैर छूकर बहुत प्रेम से मुस्करा रहे थे, खुश थे.

अनुपम के शो पर नसीर और ओम पुरी. (फोटोः कलर्स)
अनुपम के शो पर नसीर और ओम पुरी. (फोटोः कलर्स)

फिर दूसरा अनुपम खेर है जो एक artist होने से ज्यादा एक ऐसी पॉलिटिक्स को महत्व देता है जिस तरफ पारंपरिक रूप से समझदार आर्टिस्ट या आलोचक नहीं खड़े होते. इस पॉलिटिक्स के लिए अनुपम उन्हीं ओम और नसीर पर आक्रामक हो जाते हैं. ज़ाहिर है अभी सत्ता उनके साथ है तो कोई दूसरा कलाकार उनसे जीत नहीं सकता, चाहे वो कितना भी सीनियर या आइकॉनिक क्यों न हो! जब बुद्धिजीवी और रचनाकार लोग असहिष्णुता के माहौल के खिलाफ विरोध करते हुए अपने अवॉर्ड सरकार को लौटा रहे थे तो अनुपम उनके साथ नहीं थे. बल्कि उन्होंने तो ऐसे बहुत सारे सम्माननीय रचनाकारों के लिए कह दिया कि ‘ये लोग भारत को बदनाम कर रहे हैं’ जिनके मुकाबले अनुपम का काम कहीं खड़ा नहीं होता. इन कमजोर विरोध करने वालों की कोशिश को बिखरने और discredit करने के लिए वो दिल्ली गए थे और वहां थोथा प्रदर्शन किया.

FTII के प्रवेश द्वार पर कभी लगा बैनर - 'चुने हुए की निरंकुशता.' (फोटोः एफटीआईआई विज़्डम ट्री)
FTII के प्रवेश द्वार पर कभी लगा बैनर – ‘चुने हुए की निरंकुशता.’ (फोटोः एफटीआईआई विज़्डम ट्री)

शैक्षणिक संस्थानों में माहौल को चेंज करने की जैसी कोशिश कुछ वक्त से हुई है उसमें चाहें तो अब अनुपम सरकार के एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम कर सकते हैं या फिर वाकई अपने अंदर के कलाकार को आगे रखकर कला की सारी आज़ादी छात्र/छात्राओं को दे सकते हैं. गजेंद्र चौहान के रहते हुए एफटीआईआई में फिल्ममेकर्स की स्कॉलरशिप रोक दी गई थी ताकि उन्हें ‘तमीज़’ सिखाई जा सके क्योंकि उन्होंने सत्ता के खिलाफ प्रोटेस्ट किए थे. जो नेतृत्व इन संस्थानों को चेंज करना चाहता है उसे ये नहीं पता कि ये विश्व के सबसे बड़े फिल्म संस्थानों में से एक है जिसे बाहर बहुत इज्जत से देखा जाता है और जिसने हिंदुस्तान से बहुत वर्ल्ड क्लास आर्टिस्ट तैयार किए हैं. लेकिन आर्टिस्ट बंधे दिमाग से, तमीज़ सिखाकर और कतारबद्ध नहीं पैदा किए जाते.

जब ये स्टूडेंट्स की स्कॉलरशिप बंद करने में लगे थे तब इसी संस्थान की पायल कपाड़िया अकेली थीं जो फ्रांस में 70वें इंटरनेशनल केन फिल्म फेस्टिवल में अपनी फिल्म ‘आफ्टरनून क्लाउड्स‘ से भारत का प्रतिनिधित्व कर रही थीं. गजेंद्र चौहान का विरोध करने वालों में पायल भी थीं.

पायल की फिल्म 'आफ्टरनून क्लाउड्स' का एक दृश्य.
पायल की फिल्म ‘आफ्टरनून क्लाउड्स’ का एक दृश्य.

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हिसाब सीधा है या तो आप कलाकार बनकर संस्थान चलाना. उससे नतीजे निकलेंगे. दुनिया में नाम कमाने वाली फिल्में और फिल्ममेकर्स निकलेंगे. या आप राजनीतिक पूर्वाग्रह थोपना. उससे संस्थान पर आपका कब्जा हो जाएगा लेकिन कला का सृजन बंद हो जाएगा और ऐसी फिल्में भी निकलनी बंद हो जाएंगी जिन्हें कोई केन या बर्लिनेल प्रदर्शन लायक समझेगा.

वो अनुपम खेर जिसे फिल्मों में देखकर बहुत एंजॉय किया है और शायद मरते दम तक उसकी बहुत सारी यादें मन में रहेंगी, वो देश के इतने अच्छे फिल्म संस्थान का नेतृत्व कर रहा है, इससे बड़ी खुशी कोई हो नहीं सकती. लेकिन वो अनुपम खेर बहुत पीछे छूट गया है जो कलाकार ज्यादा था और राजनीतिक पूर्वाग्रहों वाला कम. अब सिर्फ पोलिटिकल वजहें ही हैं जो उन्हें चलाती दिखती हैं. इसे खुले तौर पर देखा जा सकता है और वो भी इसे छुपाने की कोई कोशिश नहीं करते.

हो सकता है जब ये सत्ता एक या दो टर्म के बाद न रहे तो फिर से हमें हमारा अनुपम खेर मिल जाए.

अनुपम की तब की एक छवि जब हमारे लिए वो सिर्फ एक कलाकार थे. (फोटोः राजश्री, हम आपके हैं कौन)
अनुपम की तब की एक छवि जब हमारे लिए वो सिर्फ एक कलाकार थे. (फोटोः राजश्री, हम आपके हैं कौन)

या फिर वो चाहें तो अभी एफटीआईआई के कार्यकाल के दौरान ही ऐसा करके दिखा दें. वे स्टूडेंट्स को खूब सारी पावर दे. आज़ादी दे. उन्हें कहे कि तुम सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाली और सत्ता का विरोध करने वाली फिल्में बनाओ, चर्चाएं करो मैं तुम्हारे साथ हूं. कोई तुम्हारी स्कॉलरशिप नहीं रोकेगा और कैंपस में तुम्हे किसी किस्म की घुटन महसूस नहीं होगी.

इंतजार है कि वे ऐसा करें. या फिर उनके बाद कभी कोई आएगा, वो करेगा ही.

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