
हमारे देश में 20 हफ्ते तक के गर्भ को गिराने की अनुमति है. इसके बाद कोर्ट ही फैसला कर सकती है.
झारखंड हाई कोर्ट का गठन वर्ष 2000 में हुआ था. तब से ये पहला मौका है, जब छुट्टी के दिन एक मुकदमे का फैसला सुनाने के लिए हाई कोर्ट खुला था. मामला जमशेदपुर की एक लड़की से जुड़ा हुआ है. यहां के सिदगोड़ा इलाके की रहने वाली 12 साल की नाबालिग ने रेप का केस दर्ज करवाया था. रेप के बाद नाबालिग गर्भवती हो गई थी, जिसे देखते हुए घरवाले उसे जमशेदपुर के महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज (एमजीएम) ले गए. डॉक्टरों ने गर्भपात से इनकार कर दिया था और कहा था कि इससे पीड़िता की जान को खतरा है. इसके बाद पीड़िता की मां ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की.
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई कर 15 अक्टूबर को डॉक्टरों को जांच के आदेश दिए. रांची के राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (रिम्स) के डॉक्टरों ने एक टीम बनाई, जिसमें स्त्री विभाग की अनुभा विद्यार्थी, रेडियोलॉजी से डॉ सुरेश टोप्पो, मेडिसिन से डॉ आरके झा और फॉरेंसिक से डॉ संजय कुमार शामिल थे. उन्होंने अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में कोर्ट को सौंप दी. रिपोर्ट मिलने के बाद जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय ने छुट्टी के दिन ही कोर्ट खुलवाया और सुनवाई शुरू की. 15 मिनट की सुनवाई में ही जस्टिस मुखोपाध्याय ने एमजीएम अस्पताल की रिपोर्ट खारिज कर दी और रिम्स की रिपोर्ट के आधार पर गर्भपात की इजाज़त दे दी. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा,
पीड़िता 23 सप्ताह की गर्भवती है, इसलिए एसएसपी सरकारी खर्चे पर पीड़िता और उसके परिवार को 16 अक्टूबर को रिम्स पहुंचाएं. 17 अक्टूबर को डॉक्टर पीड़िता का गर्भपात करवाएं. भ्रूण को संरक्षित किया जाए और इसे फॉरेंसिक लेबोरेटरी भेजा जाए, जहां इसकी डीएनए जांच हो सके. बच्ची और उसके घरवालों को रांची में रुकने के लिए सरकार सुविधाएं मुहैया करवाई जाएं.ये फैसला एक अच्छी पहल है. जब देश में करोड़ों केस अदालतों में पेंडिंग पड़े हों तो छुट्टी के दिन कोर्ट खुलवाकर फैसला देना और भी लोगों के लिए नज़ीर है. याकूब मेमन की फांसी की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट तो रात को बैठी थी, लेकिन ये मामला एक सामान्य सी बच्ची से जुड़ा था, जिसके साथ अमानवीय हरकत हुई थी. बच्ची का पिता एक कुली है, जो किसी तरह से काम करके अपने परिवार का खर्च चलाता है. अपनी बच्ची को पढ़ने के लिए भी भेजता था. वारदात के वक्त वो छठी क्लास में पढ़ती थी. उसके पड़ोस में रहने वाले ड्राइवर ने ही उससे रेप किया था. पेट में दर्द होने पर जांच करवाई तो पता चला कि वो गर्भवती है. इसके बाद से ही बच्ची का जीवन नारकीय हो गया. पढ़ाई से ज्यादा उसे थाने और कोर्ट के चक्कर काटने पड़े. जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय ने छुट्टी के लिए उसके लिए कोर्ट खुलवाकर जो फैसला दिया है, वो कोर्ट पर हमारे भरोसे को और भी पुख्ता करता है.
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