मप्र के इस शहर में कोरोना से जुड़ा सच भी अगर सोशल मीडिया पर लिख दिया तो बहुत बुरा होगा
दोषी पाए जाने पर अधिकतम 6 महीने की जेल या जुर्माना या दोनों भी हो सकते है.
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कोरोना से जुड़ी भ्रामक खबरें सोशल मीडिया पर शेयर करने पर जबलपुर में कानूनी कार्रवाई की जाएगी. (फ़ोटो- ट्विटर)
मध्यप्रदेश के जबलपुर जिला प्रशासन ने सोशल मीडिया पर कोरोना से जुड़ी भ्रामक और आपत्तिजनक ऑडियो-वीडियो और फ़ोटो शेयर करने पर रोक लगा दी है. भारतीय दंड संहिता (IPC) के सेक्शन 144(1) के तहत जबलपुर के जिलाधिकारी (DM) ने आदेश जारी कर इसकी सूचना दी है.
क्या है पूरा मामला
जबलपुर जिलाधिकारी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से जानकारी दी गई कि प्रशासन ने सोशल मीडिया पर भ्रामक और आपत्तिजनक सन्देश, ऑडियो-वीडियो और फोटो प्रसारित करने पर रोक लगा दी है. आदेश के मुताबिक़, असामाजिक तत्वों द्वारा कोरोना को लेकर सोशल मीडिया के माध्यम से भ्रामक और झूठी खबरें फैलाई जा रही हैं. इससे आम जनता में भय का वातावरण बन रहा है. साथ ही इसमें किसी धर्म या संप्रदाय के प्रति आपत्तिजनक बातें होने की भी संभावना है. इस कारण जिले में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है.
DM ने अपने आदेश में लिखा है कि आम जनता के बीच भय का माहौल ना बने और ऐसा करने वाले लोगो के ख़िलाफ़ कानून के मुताबिक़ उचित कार्रवाई की जा सके, इसके लिए ये आदेश जारी किया गया है. इस आदेश में कोरोना से जुड़े और किसी धर्म से जुड़े भ्रामक, आपत्तिजनक और भड़काऊ फोटो, ऑडियो-वीडियो और मैसेज को किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म जैसे वॉट्सऐप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर शेयर करने, पोस्ट करने, फॉरवर्ड करने और कमेंट करने पर रोक लगाने की बात कही गई है. जबलपुर DM कर्मवीर शर्मा के इस आदेश को तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है. ये आदेश अगले दो महीने तक के लिए जिले में प्रभावी रहेगा. इसका उल्लंघन करने वाले शख़्स के ख़िलाफ़ IPC की धारा 188 के अंतर्गत कार्रवाई की जाएगी. IPC के सेक्शन 188 के तहत दोषी पाए जाने पर अधिकतम 6 महीने की जेल या एक हजार रुपये जुर्माने की सजा हो सकती है या दोनों भी लगाए जा सकते हैं.
केंद्र सरकार ने हाल ही में सोशल मीडिया से जुड़े कुछ नियम बनाए हैं
आपको बता दें कि हाल ही में केंद्र की मोदी सरकार ने भी सोशल मीडिया पर शेयर किए जाने वाले कंटेंट्स को लेकर एक विस्तृत गाइडलाइंस जारी की थी. इसमें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को किसी पोस्ट या कंटेंट के फर्स्ट ओरिजिनेटर की जानकारी सरकार को देनी होगी. मतलब सरकार किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से यह पूछ सकती है कि किसी मेसेज या कंटेंट को सबसे पहले किसने डाला. हालांकि सरकार ऐसे ही मामलों में यह जानकारी मांग सकेगी जिनमें 5 साल तक की सजा का प्रावधान है. इतना ही नहीं, एक कानूनी आदेश मिलने के 72 घंटे के भीतर सोशल मीडिया कंपनी को आइडेंटिटी वेरिफिकेशन के मकसद से मांगी गई जानकारी सरकारी एजेंसियों को देनी होगी. साधारण भाषा में समझें तो अब सरकार किसी जांच के लिए यूज़र की जानकारी सोशल मीडिया कंपनी से मांग सकेगी.
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