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मोदी सरकार ने फेसबुक-ट्विटर पर लिखने के लिए क्या नियम बनाए?

एक ही जगह थी जो कमोबेश नियंत्रण से मुक्त थी – इंटरनेट. इसीलिए हाल के दिनों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा माध्यम इंटरनेट पर मौजूद सोशल मीडिया को माना गया. जो अभिव्यक्ति प्रिंट या टीवी जैसे माध्यमों पर संभव नहीं, वो सोशल मीडिया पर न सिर्फ कही जा सकती है, बल्कि वायरल होकर एक आंदोलन भी बन सकती है. अब ये सब मुश्किल होने जा रहा है. केंद्र सरकार सोशल मीडिया और OTT प्लेटफॉर्म्स को लेकर गाइडलाइन्स का ड्राफ्ट लेकर आ गई है. सादी भाषा में – फेसबुक, ट्विटर, ऐमज़ॉन प्राइम वीडियो और नेटफ्लिक्स के लिए गाइडलाइन. माने आप क्या पोस्ट करेंगे, क्या ट्वीट करेंगे और मनोरंजन के लिए क्या देख पाएंगे, उसके लिए गाइडलाइन.

पहले ये समझते हैं कि कैसे हुआ है?

रविशंकर प्रसाद प्रेस के सामने Minister of Electronics and Information Technology की हैसियत से आए थे. जैसा कि हमने पहले बताया, इंटरनेट पर मौजूद सामग्री को लेकर बहुत स्पष्ट नियम नहीं थे. इसीलिए सोशल मीडिया, एप्स और बाकी सभी चीज़ों का काम रविशंकर प्रसाद का मंत्रालय देखता था. याद कीजिए, जब चाइनीज़ एप बैन किए गए थे, तब भी IT एक्ट का इस्तेमाल हुआ था. लेकिन सरकार अब इंटरनेट पर मौजूद कंटेंट को नियंत्रित करने के लिए दो तरफा नीति अपना रही है. सोशल मीडिया इंटरमीडियरी माने फेसबुक, ट्विटर जैसी कंपनियों को लेकर नियम सूचना प्रोद्योगिकी विभाग ने ही बनाए हैं. माने रविशंकर प्रसाद का मंत्रालय.

लेकिन डिजिटल मीडिया माने इंटरनेट पर समाचार प्रस्तुत करने वाला मीडिया – जैसे कि दी लल्लनटॉप और over the top content provider, जैसे कि नेटफ्लिक्स, के लिए IT एक्ट के ही तहत नियम बनाने का काम सूचना और प्रसारण मंत्रालय को दिया गया. इसीलिए प्रेस कॉन्फ्रेंस में सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर भी आए थे. इस बात पर आपको ध्यान दिलाया ताकि आप नियंत्रण को लेकर सरकार की अप्रोच समझ सकें. डिजिटल मीडिया और OTT को सरकार प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह ही नियंत्रित करना चाहती है.

सारे नियम बनाए गए हैं Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021 के नाम से. रविशंकर प्रसाद ने ज़ोर देकर कहा कि वो नया कानून नहीं ला रहे. IT एक्ट के तहत ही कुछ नियम बना रहे हैं. ये नियम गजट में छपने के बाद से लागू होंगे. सिग्निफिकेंट सोशल मीडिया इंटरमीडियरी माने ट्विटर और फेसबुक जैसी कंपनियों के लिए ये नियम तीन महीने बाद लागू होंगे. लेकिन रविशंकर प्रसाद ने साफ किया कि वो उम्मीद करते हैं कि प्लेफॉर्म इन नियमों का पालन करेंगे, यहां ज़ोर आत्मनियंत्रण पर है. प्रसाद ने तो यहां तक कहा कि उनका मकसद सोशल मीडिया यूज़र को मज़बूत करना है.

ये स्पष्ट नहीं हुआ कि प्रसाद का इशारा था किस तरफ – किसान आंदोलन या सीमा पार आतंकवाद. लेकिन दर्शक जानते ही हैं कि किसान आंदोलन के दौरान किस तरह सोशल मीडिया और सरकार आमने सामने आए.

नियमों का ज़ोर असल में कहां है?

ये समझने के लिए आपको संक्षेप में इनके बारे में बताते हैं. पहले बात सोशल मीडिया की. सरकार ने सोशल मीडिया प्लेफॉर्म्स को इंटरमीडियरी माने बिचौलिया माना है. फिर सरकार ने सिग्निफिकेंट सोशल मीडिया इंटरमीडियरी और रेग्युलर सोशल मीडिया इंटरमीडियरी में भेद किया है. इसका मतलब बड़ी सोशल मीडिया कंपनी और छोटी सोशल मीडिया कंपनी. रविशंकर प्रसाद के बोलने से लगा कि 50 लाख से ज़्यादा यूज़र वाली कंपनियों को सिग्निफिकेंट सोशल मीडिया इंटरमीडियरी मानेगी. लेकिन अभी ये स्पष्ट नहीं है.

पहला नियम सोशल मीडिया कंपनियों में शिकायत निवारण को लेकर है. सरकार चाहती है कि सोशल मीडिया इंटरमीडियरी तीन अधिकारी नियुक्त करें –

#1
चीफ कंप्लायंस अफसर – ये ध्यान रखेगा कि कंपनी IT एक्ट के नियमों का पालन करे

#2
नोडल कॉन्टैक्ट पर्सन – ये अधिकारी सातों दिन, 24 घंटे कानूनी एजेंसियों के साथ तालमेल बनाए रखेगा

#3
रेज़िडेंट ग्रीविएंस अफसर – ये अधिकारी शिकायत निवारण प्रक्रिया का पालन करवाएगा.

इन तीनों अधिकारियों को भारत में रहना होगा. कंपनियां हर महीने एक कंप्लायंस रिपोर्ट भी जारी करेंगी. इसमें वे बताएंगी कि महीने भर में उनके पास कैसी और कितनी शिकायतें आईं, और उन पर क्या एक्शन लिया गया. ऐसी ही एक कंप्लायंस रिपोर्ट हर छह महीने में भी छापनी होगी.

Social Media Policy
सरकार ने सोशल मीडिया को रेग्युलेट करने के लिए सख्त प्रावधान तैयार कर दिए हैं. (फोटो – इंडिया टुडे)

कुछ और नियमों पर गौर कीजिए-

#1
सोशल मीडिया कंपनी का भारत में एक फिजिकल अड्रेस होना और उसे वेबसाइट या ऐप पर दिखाना जरूरी होगा. इसी के साथ प्लेटफॉर्म के नियम, प्राइवेसी पॉलिसी और यूज़र एग्रीमेंट जैसी जानकारी सार्वजनिक करनी होगी.

#2
एक खास वॉलेंटरी यूज़र वेरिफिकेशन मैकेनिज्म बनाना होगा. मतलब अगर कोई यूज़र अपनी इच्छा से अपना सोशल मीडिया अकाउंट वेरिफाई करवाना चाहता है तो उसे मौका दिया जाएगा. उस यूजर को वेरिफिकेशन के बाद एक खास निशान भी दिया जाए. यह वेरिफिकेशन कैसे किया जाएगा, इसका जिम्मा सोशल मीडिया के ऊपर ही डाला गया है.

#3

अगर कोई सोशल मीडिया कंपनी किसी यूजर का कंटेंट अपने आप हटाती है तो उस यूजर को भी अपनी बात रखने का मौका दिया जाए. कंटेंट हटाने से पहले यूजर को बताना होगा कि आखिर उसका कंटेंट क्यों हटाया जा रहा है.

#4
अगर कोर्ट या सरकारी एजेंसी किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को कोई जानकारी होस्ट करने या पब्लिश करने से मना करती है तो उसे वो मानना होगा. इस जानकारी में देश की एकता-अखंडता को खतरे में डालने वाली, कानून-व्यवस्था को भंग करने वाली, मित्र देशों से रिश्ते खराब करने वाली जानकारी शामिल हो सकती है.

# किसी भी यूजर की गरिमा को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को और सख्ती दिखानी होगी. खासतौर पर महिलाओं के मामले में. अगर कोई महिला किसी ऐसे कंटेंट के बारे में शिकायत करती है जिससे उसकी गरिमा को धक्का लगता है तो उसे 24 घंटे में हटाना होगा. मिसाल के तौर पर प्राइवेट पार्ट, अंतरंग तस्वीरें या फर्जी अकाउंट आदि. इस तरह की शिकायत यूजर या उसकी तरफ से कोई दूसरा भी कर सकेगा.

#5
प्लेटफॉर्म पर ऐसा कॉन्टेंट नहीं डाला जा सकेगा जिससे मानहानि हो, या वो अश्लील हो. कुल मिलाकर बात ये कि पहले से जो कानून हैं, उन्हें तोड़ने वाला कॉन्टेंट साझा नहीं होगा. मिथ्या जानकारी माने झूठे दावे या फेक न्यूज़ भी नहीं फैलाई जा सकेगी.

एक नियम बहुत खास है. क्यों?

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को किसी पोस्ट या कंटेंट के फर्स्ट ओरिजिनेटर की जानकारी सरकार को देनी होगी. मतलब सरकार किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से यह पूछ सकती है कि किसी मेसेज या कंटेंट को सबसे पहले किसने डाला. अगर विदेशी धरती से डाला गया होगा तो बताना होगा कि देश में उसे किसने फैलाया. हालांकि सरकार ऐसे ही मामलों में यह जानकारी मांग सकेगी जिनमें 5 साल तक की सजा का प्रावधान है. सरकार इसे देश की अखंडता के खिलाफ चलाए गए मेसेजों और सोशल मीडिया के जरिए मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं को रोकने के लिए उठाया गया कदम बता रही है.

इतना ही नहीं, एक कानूनी आदेश मिलने के 72 घंटे के भीतर सोशल मीडिया कंपनी को आइडेंटिटी वेरिफिकेशन के मकसद से मांगी गई जानकारी सरकारी एजेंसियों को देनी होगी. सादी भाषा में अब सरकार किसी जांच के लिए यूज़र की जानकारी कंपनी से मांग सकेगी.

अब बात करते हैं ओटीटी कंटेंट प्लेटफॉर्म पर नए नियमों की

OTT यानी ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म्स जैसे नेटफ्लिक्स, अमेजॉन प्राइम, ज़ी5. सरकार ने कहा है कि उनके पास 40 OTT प्लेटफॉर्म होने की जानकारी है. और इनके लिए अब कुछ गाइडलाइंस लाई गई हैं.

#1
पहली. OTT प्‍लेटफॉर्म्‍स को टीवी और अखबार की तरह एक सेल्‍फ रेगुलेशन बॉडी बनानी होगी. इसमें सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज या कोई और गणमान्य व्यक्ति होंगे. इसके ज़रिए शिकायत निवारण सिस्टम भी शुरू करना होगा.

#2
ओटीटी पर दिखाए जाने वाली सीरियल्स पर वैसी ही गाइडलाइंस लागू होंगी, जो टीवी के लिए हैं. यानी टीवी चैनलों के लिए बनाए गए प्रोग्राम एंड कोड के नियम ओटीटी को भी मानने होंगे.

#3
सरकार ने कहा है कि ओटीटी के लिए कोई सेंसरशिप नहीं लगाई जा रही, लेकिन ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को अपने स्तर पर ही दर्शकों की उम्र के हिसाब से कॉन्टेंट को अलग-अलग कैटेगरी में रखना होगा, जैसे 13+ या 16+ या वयस्कों के लिए.

#4
इसके अलावा पैरेंटल कंटेंट कंट्रोल की सुविधा देनी होगी. इससे लोग ये तय कर सकेंगे कि उनकी डिवाइस से किसी खास कैटेगिरी का कॉन्टेंट बच्चे न देख सकें. सूचना प्रसारण मंत्री ने कहा है कि सभी ओटीटी प्लेटफॉर्म्स सेल्फ रेग्यूलेशन शुरू नहीं करते हैं तो नए नियम लाए जाएंगे.

डिजिटल न्यूज़ मीडिया के लिए नियम

डिजिटल न्यूज़ मीडिया को लेकर भी सरकार के कुछ निर्देश आए हैं. प्रकाश जावडेकर ने कहा है कि सरकार पहले ये जानकारी जुटाएगी कि देश में कितने ऑनलाइन पोर्टल हैं.

#1
अब डिजिटल न्‍यूज मीडिया को अपने बारे में विस्‍तृत जानकारी देनी होगी. टीवी और अखबार की तरह उन्हें भी रजिस्‍ट्रेशन कराना जरूरी होगा.

#2
डिजिटल न्यूज मीडिया को बताना होगा कि उसका मालिक कौन है और उसमें किसने पैसा लगाया है.

#3
टीवी और अखबार की तरह डिजिटल न्यूज मीडिया में भी शिकायत निवारण सिस्टम लागू करना होगा. मतलब शिकायतों पर कार्रवाई का सिस्टम बनाना होगा. सरकार चाहती है कि हर डिजिटल मीडिया के लिए शिकायत निवारण अधिकारी नियुक्त हो. उनका भारत में होना ज़रूरी है. उनकी ये जिम्मेदारी रहेगी कि जो भी शिकायतें आएं उनका 15 दिन में निवारण हों.

#4
डिजिटल मीडिया के लिए एक या एक से ज़्यादा सेल्फ रेग्यूलेटरी बॉडी बनानी होंगी. इनमें 6 सदस्य होंगे और सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट या किसी गणमान्य व्यक्ति इस टीम के अध्यक्ष होंगे. इस संस्था का सूचना और प्रसारण मंत्रालय में रजिस्ट्रेशन ज़रूरी है. इसका काम ये होगा कि डिजिटल न्यूज़ मीडिया ने एथिक्स कोड का पालन किया है या नहीं और 15 दिन में शिकायत का निवारण हुआ है या नहीं.


विडियो- मोदी सरकार ने फेसबुक-ट्विटर पर लिखने के लिए क्या नए नियम बना दिए?

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