अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा है कि अगर ईरान को वॉशिंगटन के साथ डील करनी है तो उसे अपने न्यूक्लियर यूरेनियम कैपेसिटी में कटौती करनी पड़ेगी. उन्होंने रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू में सीधा सवाल किया कि अगर ईरान न्यूक्लियर हथियार नहीं चाहता तो 60 फीसदी एनरिच्ड यूरेनियम का क्या करेगा? उन्होंने एक और बात पर गौर किया. कहा कि ये कभी साफ नहीं हो पाता है कि ईरान के लिए फैसले कौन ले रहा है.
'परमाणु बम नहीं बनाना तो यूरेनियम का क्या करोगे?' जेडी वेंस ने ईरान से पूछा बड़ा सवाल
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान से सीधा सवाल किया कि अगर ईरान परमाणु हथियार बनाना नहीं चाहता, तो उसको 60% एनरिच्ड फ्यूल की ज़रूरत क्यों है?

रॉयटर्स के साथ बातचीत के मुताबिक जेडी वेंस ने कहा,
‘अगर आप (ईरान) परमाणु हथियार नहीं चाहते, तो आपको 60% एनरिच्ड फ्यूल की ज़रूरत क्यों है? अगर आप यह दिखाना चाहते हैं कि आप परमाणु हथियार नहीं बनाएंगे, तो ज़्यादा एनरिच्ड फ्यूल न बनाएं.’
जेडी वेंस ने अपने बयान में एक बात और साफ़ कर दी कि अमेरिका केवल शब्दों की जाल में फंसा नहीं रहेगा. अमेरिका-ईरान के बीच हाल ही में स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज खोलने के लिए प्रपोजल एक्सचेंज हुए थे. लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने उसे ठुकरा दिया था. अमेरिका ने कहा है कि नवंबर में मिड-टर्म चुनाव के बाद मिलिट्री ऑपरेशन बढ़ाया जा सकता है.
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ईरान में फैसले कौन ले रहा?जेडी वेंस ने आगे कहा कि अमेरिका, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान और विदेश मंत्री अब्बास अराघची के साथ बातचीत कर रहा है. लेकिन ये साफ़ नहीं है कि ईरान के सत्ता ढांचे में उनके पास कितनी ताकत है. खासकर अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों में मारे गए सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के बाद. उनका कहना है कि ये कभी पता नहीं चल पाता कि ईरान में फैसले कौन ले रहा है.
दूसरी तरफ, ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघई ने इस बात को ख़ारिज किया है. उन्होंने बताया कि ये अमेरिका है जो मिक्स्ड सिग्नल देता है और बात कभी एक-सी नहीं होती.
ईरान जंग को शुरू हुए लगभग सात महीने बीत चुके हैं और अब भी ये जंग चल रही है. स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज पर तनाव बना हुआ है. उधर, बाब-अल-मंडेब स्ट्रेट पर हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच जंग छिड़ी हुई है. दोनों स्ट्रेट दुनिया के सबसे ज़रूरी तेल मार्ग में से एक हैं.
इसका नुकसान डॉनल्ड ट्रंप को चुनाव में भी हो सकता है. अमेरिका हर महीने ईरान के खिलाफ जंग लड़ने के लिए 3 बिलियन डॉलर खर्च कर रहा है, जो अमेरिकी टैक्सपेयर का पैसा है. एनर्जी और फ्यूल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं. ऐसे में ये ट्रंप पर बैकफायर कर सकता है.
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