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कोरोना काल के बाद दुनिया कैसे बदल जाएगी, इस दिग्गज बिजनेस पत्रकार ने बताया

ई-कॉन्क्लेव में बिजनेस जर्नलिस्ट मार्टिन वुल्फ ने महामारी के बाद की अर्थव्यवस्था पर बात की.

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इंडिया टुडे ई-कॉन्क्लेव में बिजनेस जर्नलिस्ट फाइनेंशियल टाइम्स के एसोसिएट एडिटर और चीफ इकोनॉमिक कमेंटेटर मार्टिन वुल्फ ने कोरोना महामारी और अर्थव्यवस्था से जुड़े कई सवालों के जवाब दिए. (Photo: World Economic Forum/Qilai Shen)
इंडिया टुडे ई-कॉन्क्लेव चल रहा है. कोरोना वायरस के दौर में अलग-अलग फील्ड के लोगों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये बात की जा रही है. 23 अप्रैल को कॉन्क्लेव से जुड़े चीफ इकोनॉमिक कमेंटेटर मार्टिन वुल्फ. उनसे बात की 'इंडिया टुडे' और 'आज तक' के न्यूज डायरेक्टर राहुल कंवल ने. कोरोना वायरस खत्म होने के बाद दुनिया के आर्थिक हालात कैसे होंगे? कोरोना वायरस महामारी से निपटने में दुनिया की अर्थव्यवस्था को कितना वक्त लगेगा. लॉकडाउन का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा? दिग्गज बिजनेस जर्नलिस्ट और 'फाइनेंशियल टाइम्स' के एसोसिएट एडिटर और चीफ इकोनॉमिक कमेंटेटर मार्टिन वुल्फ ने इन सवालों के जवाब दिए. वर्तमान संकट की तुलना आप पहले के संकट से कैसे करेंगे?
यह संकट अपने मूल और प्रकृति में अलग है. लेकिन आर्थिक गिरावट के पैमाने पर इसकी तीव्रता अधिक रहेगी. उत्पादन में गिरावट काफी अधिक रहेगी. महामंदी के बाद की सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है. देशों को लॉकडाउन मजबूरी में लागू करना पड़ा है. अगर हम ऐसा नहीं करते हैं, तो बीमारी बड़े पैमाने पर अपना असर दिखाती.
भारत को इस तरह के शटडाउन से निकलने के लिए क्या तरीका अपनाना चाहिए?
सबसे पहले भारत के पास जितना मेडिकल रिसोर्स है, उसका इस्तेमाल इस महामारी से निपटने के लिए करना होगा. हम जानते हैं कि भारत के पास सीमित हेल्थ सिस्टम है. इसलिए चुनौती और बढ़ जाती है. आपको इससे निपटना होगा. फिर इस महामारी से ऐसे लोगों की रक्षा करनी होगी, जो नाटकीय रूप से प्रभावित हैं. आपको ये देखना होगा कि लोगों की नौकरियां न जाएं. लोगों को सैलरी मिलती रहे, इसका इंतजाम करना होगा. हालांकि यह महंगा है. इससे राजकोषीय घाटा बढ़ेगा. सार्वजनिक कर्ज बढ़ जाएगा. मुझे लगता है कि भारत को बड़े राजकोषीय घाटे के लिए तैयार रहना होगा.
भारत सरकार को अपने लिमिटेड रिसोर्स का बंटवारा किस आधार पर करना चाहिए?
अगर लोग काम करने के लिए घर से बाहर नहीं जा रहे हैं, तो उन्हें घर में मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता है. सरकार की पहली प्राथमिकता लोगों को सपोर्ट करना है. इसके बाद सरकार को कंपनियों का सहयोग करना होगा. बैंकों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए कि वो कंपनियों को सपोर्ट करें. लॉकडाउन में कुछ उद्योग-धंधे पूरी तरह तबाह हो जाएंगे. सरकार को इस तरह की इंडस्ट्री पर ध्यान देना होगा. उनके लिए बेलआउट पैकेज जारी करने होंगे. लेकिन इस समय सबसे बड़ी जरूरत ये है कि सरकार लोगों का जीवन स्तर सुधारे.
वैश्विक और भारतीय आर्थिक सुधार पर मार्टिन वुल्फ का कहना है कि जब तक पूरी दुनिया में ये महामारी खत्म नहीं हो जाती, तब तक विश्व की अर्थव्यवस्था सामान्य नहीं हो सकती. लेकिन ऐसा कब तक होगा, इस बात पर मतभेद है. उन्होंने कहा-
अगर हम जल्द ही लॉकडाउन खोलते हैं, तो फिर से वायरस के ऐक्टिव होने की आशंका है. अगर ऐसा होता है, तो अर्थव्यवस्था फिर से नीचे चली जाएगी. यह साल भयानक रहने वाला है. जैसा कि इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड (IMF) ने घोषणा की है,  ये दोगुना खराब रह सकता है.
न्यू इकोनॉमिक सुपर पावर पर मार्टिन वुल्फ का कहना है कि यह वायरस से तय नहीं होगा. यह इस बात से तय होगा कि कौन-सा देश किस तरह की पॉलिसी बना रहा है. उन्होंने कहा-
मैंने हमेशा महसूस किया है कि चीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा, अगर अमेरिका वास्तव में अच्छा प्रदर्शन नहीं करता है. अमेरिकी अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन उसके नेतृत्व पर निर्भर करेगा, जो वर्तमान में खराब है. मुझे लगता है कि अब से अगले पांच-छह साल तक हम पाएंगे कि महामारी ने बहुत कुछ बदल दिया है. उदाहरण के लिए, दूर से आयोजित की जाने वाली चीजें. विदेश यात्रा कुछ कम हो जाएगी.

जल्दीबाजी में लॉकडाउन खत्म करने पर कोरोना के किस दूसरी लहर की बात कर रहे यह एक्सपर्ट

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