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छत्तीसगढ़ के बस्तर में पुलिस वालों ने प्रदर्शन किया और कुछ एक्टिविस्टों और नेताओं के पुतले फूंके.
हां जी, पुलिस वालों ने पुतले फूंके, एक्टिविस्टों और नेताओं के. लाइन रिपीट की है ताकि यकीन पुख्ता हो जाए.
क्यों फूंके पुतले?
शनिवार को ही सीबीआई की एक रिपोर्ट सामने आई थी, जिसके मुताबिक, साल 2011 में सुकमा के तड़मेटला गांव में 160 घरों में जो आग लगी थी, वो पुलिस वालों ने ही लगाई थी. जबकि अब तक स्टेट का दावा था कि वो आग नक्सलियों ने लगाई थी.इस सीबीआई रिपोर्ट के बाद बस्तर पुलिस जाहिराना तौर पर नाराज है और नाराजगी लोकल कार्यकर्ताओं पर फोड़ रही है. जिले में कई जगह पुलिस के ऑग्जिलरी कॉन्स्टेबलों (सहायक आरक्षकों) ने इलाके में काम करने वाले एक्टिविस्टों के पुतले फूंके. जगदलपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, कोंडागांव, सुकमा और नारायणपुर में ये प्रदर्शन हुए. ज्यादातर पुलिस वालों ने इस दौरान वर्दी भी पहन रखी थी.
जिन कार्यकर्ताओं के पुतले फूंके गए, उनके नाम हैं, नंदिनी सुंदर, बेला भाटिया और हिमांशु कुमार. जिन नेताओं के पुतले फूंके गए, वे हैं AAP नेता सोनी सोरी और सीपीआई नेता मनीष कुंजाम हैं.नंदिनी सुंदर ने ही तड़मेटला आगजनी केस में कोर्ट में अर्जी डाली थी. इस मामले में 7 स्पेशल पुलिस अफसरों (SPO) को चार्जशीट किया गया है. अंग्रेजी अखबार 'द इंडियन एक्सप्रेस' के मुताबिक, प्रदर्शन करते हुए पुलिस वालों ने कहा कि वो इतने मुश्किल हालात में रोज लड़ाई करते हैं और उन्हें डेली बेसिस पर 'नक्सल समर्थकों' के आरोप झेलने पड़ते हैं.
1. हिमांशु कुमार, 2. बेला भाटिया, 3. सोनी सोरी, 4. नंदिनी सुंदर, 5. मनीष कुंजाम
इन प्रदर्शनकारी ऑग्जिलरी कॉन्स्टेबल्स में से कई पूर्व माओवादी से एसपीओ बनाए गए थे. लेकिन 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने 'सलवा जुडूम' और 'एसपीओ' को बैन कर दिया, जिसके बाद इन एसपीओ को 'ऑग्जिलरी आर्म्ड फोर्स' में शामिल कर लिया गया.

फोटो: विशेष इंतजाम
समस्त सहायक आरक्षक की ओर से एक चिट्ठी साइन करके इलाके के एसपी को दी गई. इस चिट्ठी में लिखा था, 'नंदिनी सुंदर, हिमांशु कुमार, बेला भाटिया, सोनी सोरी और मनीष कुंजाम नक्सल समर्थक हैं और पुलिस को बदनाम करते हैं. तड़मेटला में 76 जवानों की मौत हो चुकी है. उन्होंने कोर्ट को गुमराह किया है ताकि नक्सली उनकी जेबें भरते रहें.'कोंडागांव के एसपी संतोष कुमार ने कहा कि कॉन्स्टेबल पुलिस के खिलाफ आरोपों से नाराज हैं. उन्होंने कहा, 'वो गुस्से में हैं क्योंकि वो रोज अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर नक्सलियों से लड़ते हैं, फिर भी उन्हें इस तरह के सवालों का सामना करना पड़ता है. प्रोटेस्ट करने वाले सहायक आरक्षक थे. उन्हें लगता है कि उन्हें सबसे ज्यादा टारगेट किया जाता है. यहां तक कि सीबीआई रिपोर्ट में भी. '
डीयू में प्रोफेसर नंदिनी सुंदर ने कहा कि साफ है कि छत्तीसगढ़ पुलिस किसी एजेंसी और कोर्ट की बात का सम्मान करना नहीं चाहती. उन्होंने कहा, 'इस तरह की घटनाओं से मुझे मनीष कुंजाम जैसे लोगों की सुरक्षा को लेकर डर लगता है, जो लगातार बस्तर के लोगों के लिए काम कर रहे हैं. उन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सुरक्षा मिली हुई है, लेकिन उनके पास जो गनमैन है, उसके पास गन है ही नहीं. ये बहुत खतरनाक है.'











