65 साल की रामरति देवी को ब्रेन ट्यूमर है. बिहार में इलाज नहीं हो पाया तो रिश्तेदारों से कर्ज लेकर बेटे के साथ दिल्ली आ गईं. लेकिन यहां पर कोई उनकी अगवानी के लिए तो था नहीं. एक महीने का समय एम्स का चक्कर काटने में निकल गया. डॉक्टर से भेंट ही नहीं होती थी. जो भी एम्स में नंबर लगाने गया होगा, उसे पता होगा कि वहां क्या होता है. जैसे-तैसे न्यूरो सर्जरी विभाग में नंबर मिला. जांच के बाद बीमारी की पहचान हुई. उसके बाद अस्पताल वालों ने चार यूनिट ब्लड और 32 हजार रुपये जमा करने को कहा. रामरति के बेटे गुलाब इसके लिए तैयार हो गये. मां को बचाना था. इलाज तो कराना ही था.
पर ये पर्याप्त नहीं था. मां-बेटे को असली शॉक लगना बाकी था. ऑपरेशन की डेट 2020 की थी. 3 साल बाद की.
गुलाब कहते हैं,' निजी अस्पताल में इलाज कराने में सक्षम नहीं हूं. मां दर्द से परेशान रहती है. यहां तक कि उठने-बैठने में दिक्कत होती है. अस्पताल की तरफ से जो तारीख मिली है, उसके बाद मां को लेकर बिहार वापस लौटने को मजबूर हूं. अगर मां यदि जिंदा रही तो तीन साल बाद सर्जरी के लिए लेकर आऊंगा.एम्स का ये कोई पहला किस्सा नहीं है. मई 2013 में 13 साल की अंजलि न्यूरो सर्जरी विभाग की पेशेंट के तौर पर रजिस्टर हुई थी. अंजलि को ब्रेन ट्यूमर के साथ मिरगी की प्रॉब्लम थी. तो तुरंत उपचार की जरूरत थी. लेकिन एम्स की तरफ से जो डेट मिली वो 7 साल बाद 2020 की थी.

Source- AIIMS Twitter
उसी साल बबिता नाम की पेशेंट को 2019 की डेट मिली थी. अगस्त 2016 में एम्स के इस रवैये को देखते हुए पेशेंट मीरा देवी के पति ने दिल्ली हाईकोर्ट में अस्पताल के खिलाफ पेटिशन डाला था. मीरा देवी को ब्रेन ट्यूमर की जांच करना था. जिसके लिए उन्हें 2 महीने का समय दिया गया. जिसके बाद मीरा की फैमिली ने MRI प्राइवेट हॉस्पटिल से कराया. जांच के बाद मीरा के पति रामजी सिंह इलाज के लिए फिर से एम्स आ गये. जहां उन्हें सर्जरी की तारीख 2018 का मिला. ओपीडी के डॉक्टरों ने कहा, अगर वो चाहे तो मीरा की सर्जरी प्राइवेट वॉर्ड में करा लें. 1.25 लाख खर्च आयेगा. इतनी बड़ी रकम रामजी ऑफोर्ड नहीं करत सकते थे. तो मजबूरी में रामजी सिंह ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया. जिसके बाद कोर्ट ने अस्पताल को नोटिस भेजा.
इलाज करने वाले न्यूरोसर्जन डॉ. दीपक अग्रवाल ने कहा कि मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा होती है. हम मरीजों को लंबी तारीख नहीं देना चाहते हैं लेकिन हमारी भी मजबूरी होती है. एम्स प्रवक्ता डॉ. अमित गुप्ता भी कहते हैं कि भीड़ इतनी होती है कि हम सबको एक साथ, एक ही समय इलाज मुहैया नहीं करा सकते हैं. फिर भी हमारी कोशिश होती है कि कोई भी मरीज बिना इलाज वापस न जाये.
ये स्टोरी भारती ने की है.












