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ममता बनर्जी की TMC से क्यों छिन गया राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा?

TMC सांसद ने कहा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (फाइल फोटो- PTI)

चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) समेत तीन राजनीतिक दलों से राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा छीन लिया. इनमें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP), कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) भी शामिल हैं. TMC को पहली बार सितंबर 2016 में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला था. टीएमसी पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में क्षेत्रीय पार्टी के तौर पर रहेगी. चुनाव आयोग के नोटिफिकेशन के मुताबिक, टीएमसी ने अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा गंवा दिया. इसलिए टीएमसी के राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी छिन गया है.

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क्यों छिना राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा?

राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा कैसे छिना, इससे पहले राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिलने की शर्तों को समझना होगा. चुनाव आयोग के नियम के मुताबिक, राष्ट्रीय पार्टी होने के लिए तीन मुख्य शर्तों में से एक का पूरा होना जरूरी है. 1- अगर किसी पार्टी को चार राज्यों में क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा मिला हो यानी कम से कम चार राज्यों में कुल 6 फीसदी या ज्यादा वोट शेयर मिले हों. 2- अगर कोई भी राजनीतिक दल चार लोकसभा सीटों के अलावा लोकसभा में 6 फीसदी वोट हासिल करे. 3- अगर तीन राज्यों में पार्टी कुल लोकसभा सीट का 2 फीसदी सीट जीती हो.

तृणमूल कांग्रेस को पहली शर्त यानी चार राज्यों में क्षेत्रीय पार्टी होने के कारण राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला था. पश्चिम बंगाल के अलावा अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और त्रिपुरा में टीएमसी की पहचान क्षेत्रीय पार्टी के तौर पर थी. लेकिन चुनाव आयोग ने रिव्यू किया. 2014 और 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में पार्टी ने शर्तों को पूरा नहीं किया. इसी तरह मणिपुर के विधानसभा चुनावों में भी पार्टी ने क्षेत्रीय पार्टी होने की शर्तों को पूरा नहीं किया.

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चुनाव आयोग के मुताबिक, 2019 लोकसभा चुनाव में टीएमसी अरुणाचल और मणिपुर में चुनाव नहीं लड़ी. 2019 के अरुणाचल विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने हिस्सा नहीं लिया. वहीं 2017 मणिपुर विधानसभा चुनाव में पार्टी को सिर्फ 1.41 फीसदी वोट मिले थे.

चुनाव आयोग के मुताबिक, जुलाई 2019 में TMC को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था कि राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा क्यों नहीं वापस होना चाहिए. पार्टी ने जवाब में चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश के पैरा 6C का हवाला दिया था. इस पैरा को 2016 में ही जोड़ा गया था. इसमें कहा गया था कि पार्टी का दर्जा अगले लोकसभा या विधानसभा चुनाव में प्रदर्शन पर निर्भर करेगा. इसलिए टीएमसी ने 2024 लोकसभा चुनाव तक का वक्त मांगा था. टीएमसी 2014 के बाद अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में लोकसभा या विधानसभा चुनाव में क्षेत्रीय पार्टी होने के किसी शर्तों को पूरा नहीं कर पाई.

आयोग का कहना कोरोना महामारी के कारण रिव्यू प्रक्रिया को रोक दिया गया था. फिर दोबारा ये प्रक्रिया दिसंबर 2021 में शुरू हुई. इसके बाद पार्टी और चुनाव आयोग के बीच कई पत्र व्यवहार हुए. आखिरकार, आयोग ने राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा छीन लिया. 

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कोई फर्क नहीं पड़ेगा-TMC सांसद

राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा जाने के बाद TMC की ओर से अब तक आधिकारिक बयान नहीं आया है. हालांकि समाचार एजेंसी ANI ने तृणमूल सूत्रों के हवाले से बताया है कि पार्टी चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने के लिए कानूनी विकल्प भी खोज रही है. वहीं TMC सांसद सौगत रॉय ने कहा कि पार्टी ने बहुत कठिनाइयों को पार किया है इसे भी हम पार कर जाएंगे. उन्होंने ANI से कहा, 

“इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा. हमें जो करना है वो करते रहेंगे. इसका 2024 लोकसभा चुनाव पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.”

ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर एक जनवरी 1998 को तृणमूल कांग्रेस की स्थापना थी. पार्टी की स्थापना के बाद बंगाल में लगातार दो चुनावों 2001 और 2006 में टीएमसी को हार मिली थी. फिर 2011 में लेफ्ट फ्रंट को हराकर टीएमसी ने राज्य में सरकार बनाई. ममता बनर्जी पहली बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनी. इसके बाद पार्टी ने 2016 में भी बहुमत से सरकार बनाई. हाल के सालों में TMC ने दूसरे राज्यों में भी खुद को स्थापित करने की कोशिश की. लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिली थी.

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