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80 घंटे... उत्तरकाशी टनल में फंसे मजदूरों को कब तक निकाला जाएगा?

आज के लल्लनटॉप शो में बात होगी उत्तरकाशी टनल हादसे और ऑर्गन डोनेशन में महिलाओं की हिस्सेदारी पर.

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उत्तरकाशी टनल हादसा, ऑर्गन डोनेशन में महिलाओं की हिस्सेदारी

आज बात सामान्य ज्ञान के एक प्रश्न से शुरू करेंगे. सवाल साधारण सा है. एक दिन में कितने घंटे होते हैं? 24 घंटे. अब इस सवाल को थोड़ा कठिन करते हैं. तीन दिन में कितने घंटे होते हैं? 24 गुणे 3 इज़ इक्वल टू 72 घंटे. जवाब मिल गया. अब सोचिए पिछले 72 घंटों में देश में क्या कुछ बड़ा हुआ है? दिवाली संपन्न हुई, भारत न्यूजीलैंड का मैच हुआ और ये बुलेटिन शूट होते वक्त भारत-न्यूजीलैंड का सेमीफाइनल मैच अपने आखिरी पड़ाव पर है. लेकिन क्या आपको याद है पिछले 72 घंटों से भी पहले देश के एक पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में एक ऑपरेशन शुरू हुआ. सुरंग में फंसी 40 जिंदगियों को बचाने का ऑपरेशन. जो अभी भी खत्म नहीं हुआ है. आज हम बताएंये ये रेस्क्यू ऑपरेशन कहां तक पहुंचा है? और इसे पूरा करने में क्या दिक्कतें आ रही हैं? और बात होगी देश में अंगदान को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट की. जिसमें बताया गया है कि महिलाएं अंगदान के मामले में भी पुरुषों से काफी आगे निकल गई हैं. सबसे पहले उत्तरकाशी चलते हैं.

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12 नवंबर की सुबह अंडरकंस्ट्रक्शन सुरंग का एक बड़ा हिस्सा धंस गया. ये सुरंग ब्रह्मखाल-यमुनोत्री नेशनल हाइवे पर बन रही थी. किसलिए? उत्तरकाशी के सिलक्यारा और डंडालगांव को जोड़ने के लिए. हादसे की वजह से इस टनल में काम कर रहे 40 मजदूर अंदर फंस गए. आज कैलेंडर पर 15 नवंबर की तारीख आते ही रेस्क्यू ऑपरेशन चौथे दिन में प्रवेश कर गया.  रेस्क्यू ऑपरेशन में देरी की नाराज़गी के कंसीक्वेंसेस  इस वीडियो के तौर पर हमारे सामने आए. 'हमारे आदमी निकालो' के नारे लगाकर पुलिस और रेस्क्यू टीम से भिड़ते ये उन मजदूरों के साथी हैं जो 12 नवंबर से अब तक सुरंग में जिंदगी और मौत के संघर्ष में फंसे हैं.

उत्तरकाशी सुरंग में बड़ी चुनौती क्या है?

अब बात इस सुरंग से मजदूरों को निकालने के लिए चलाई जा रही मुहिम के ताजा अपडेट्स की. इस वक्त स्क्रीन पर आपको भारतीय वायुसेना का हरक्यूलिस विमान दिख रहा होगा. आज ये मालवाहक विमान ड्रिलिंग की हेवी मशीन लेकर उत्तराखंड के चिन्यालीसौड़ हेलीपैड पर उतरा. कौन सी मशीन? ऑगर ड्रिलिंग मशीन. बताया जा रहा है कि इस मशीन से बचाव और राहत कामों में तेजी आएगी और सभी श्रमिकों को सुरक्षित बचा लिया जाएगा.

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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक ये ऑगर मशीन 4.42 मीटर लंबी, और 2.22 मीटर चौड़ी. इसका वजह 25 टन है. यानी 25 हजार किलोग्राम. बताया जा रहा है कि पाइप पुशिंग वाली इस मशीन के जरिए मलबे को भेद कर स्टील पाइप दूसरी तरफ पहुंचाए जाएंगे. जिसकी मदद से सुरंग के अंदर फंसे मजदूर बाहर आ जाएंगे. 

उत्तरकाशी सुंरग में हो रहा बचाव कार्य

ग्राउंड जीरो पर मौजूद आशुतोष मिश्रा कह रहे हैं कि सबसे बड़ी चुनौती इन स्टील पाइप्स को मलबे के उस पार पहुंचाना है. क्यों कि सुंरग के मुख्य मुहाने से लगभग 200 मीटर अंदर की तरफ 40 मजदूर फंसे हुए हैं और उनके ठीक आगे 50 मीटर से भी ज्यादा मलबा फैला हुआ है. सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात ये है कि टनल का ये हिस्सा बेहद कमजोर है. जैसे ही मजदूरों को निकालने के लिए मलबा हटाते हैं वहां फिर से मलबा इक्ट्ठा हो जाता है. ऐसा हो क्यों रहा है? इसका जवाब है... उत्तराखंड के पहाड़ों की प्रकृति.

एक के बाद एक सामने आ रही चुनौतियों की वजह से रेस्क्यू ऑपरेशन में देरी आ रही है. कल यानी 14 नवंबर की देर शाम बचाव कार्य के दौरान मलबा गिरने से भगदड़ मच गई. इसमें दो मजदूर भी घायल हो गए. इस बीच सुरंग में पाइप डालते वक्त ड्रिलिंग मशीन में भी गड़बड़ी हुई और प्लेटफॉर्म भी टूट गया. इसका नतीज ये हुआ कि घंटो तक राहत और बचाव कार्य प्रभावित रहा.

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आपको ये सब बताते हुए मेरे मन में एक सवाल कौंध रहा है कि इस वक्त सुरंग के अंदर फंसे मजदूरों पर क्या बीत रही होगी? 14 नवंबर को जानकारी आई थी कि फंसे मजदूरों में से 2 लोगों की तबीयत खराब हो गई है. जिसके बाद प्रशासन की ओर से उन्हें दवाई उपलब्ध कराई गई थी. इस मुश्किल वक्त में कुछ इंच के व्यास वाले पाइप्स के जरिए मजदूरों तक खाना-पीना कैसे पहुंच रहा है समझिए

दर्शकों की  जानकारी के लिए बता दें कि बचाव कार्य में (एनडीआरएफ), राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (एसडीआरएफ) और पुलिसकर्मियों की 200 से ज्यादा लोगों की टीम मिलकर काम कर रही हैं. इसके अलावा दूसरे देशों से मदद लेने पर भी विचार किया जा रहा है. रेस्क्यू टीम ने थाईलैंड की उस कंपनी से संपर्क किया है जिसने साल 2018 में थाईलैंड की गुफा में फंसे बच्चों को बाहर निकाला था. इसके अलावा नॉर्वे की एक एजेंसी से भी संपर्क किया गया है जिससे सुरंग के भीतर ऑपरेशन में विशेष सुझाव लिए जा सकें. इस हादसे के बारे हमने 13 नवंबर के शो में भी बात की थी. हमने बताया था कि इस सुरंग का निर्माण किस प्रोजेक्ट के अंडर हो रहा है. हमने कई दूसरी जानकारियां भी साझा की थीं. लिंक आपको डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगा. हम कामना करते हैं कि जल्द से जल्द सुरंग में फंसे 40 मजदूरों को सकुशल बाहर निकाला जाए.

उत्तरकाशी सुंरग में हो रहा बचाव कार्य

अब बुलेटिन की दूसरी बड़ी खबर पर आने से जम्मू कश्मीर के डोडा में हुए एक दुखद हादसे की जानकारी देते हैं. आज 15 नवंबर की सुबह डोडा के अस्सार इलाके में यात्रियों से भरी एक बस गहरी खाई में गिर गई. बताया जा रहा है कि बस में 40 से ज्यादा लोग सवार थे. बुलेटिन शूट होते वक्त मृतकों की संख्या 37 तक पहुंच गई है.

भारत में सबसे ज्यादा अंगदान कौन करता है?

अब चलते हैं एक जरूरी खबर की तरफ. हाल में अंगदान यानी ऑर्गन डोनेशन को लेकर एक रिपोर्ट आई थी. भारत में ऑर्गन डोनेट करने वालों में 5 से 4 महिलाएं हैं. जबकि इन ऑर्गन को पाने वालों में 5 में 4 पुरुष हैं. यानी 5 में चार लोग पुरुष हैं जिनके शरीर के किसी अंग का ट्रांसप्लांट हो रहा है. अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया ने ये रिपोर्ट छापी है. इस रिपोर्ट में भारत में ऑर्गन ट्रांसप्लांट के 26 सालों के डेटा का विश्लेषण किया गया. 1995 से 2021 तक. पता चला है कि कुल 36 हजार 640 ट्रांसप्लांटेशन किये गए. इनमें 29 हजार से अधिक पुरुषों के लिए और 6 हजार 945 महिलाओं के लिए किये गए.

रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑर्गन डोनेट करने में महिलाओं और पुरुष के बीच ये बड़ा अंतर आर्थिक और वित्तीय जिम्मेदारियों, सामाजिक दबाव के कारण है. महिलाओं को हमेशा एक केयर टेकर के रूप में देखा जाता है. ज्यादातर मामलों में पुरुषों को घर चलाने वाला माना जाता है. वे किसी भी तरह की सर्जरी से परहेज करते हैं. इसलिए ये जिम्मेदारी महिलाओं के ऊपर दबाव के रूप में आ जाता है.

हम सभी जानते हैं कि अंगदान करके हम किसी बीमार व्यक्ति की जान बचा सकते हैं. दो तरह से अंगदान होते हैं. एक तो जीवित व्यक्ति करते हैं और दूसरा मृत व्यक्ति के शरीर से दान हो सकता है. कोई व्यक्ति अगर अपनी मृत्यु से पहले अपना विल रजिस्टर करवाता है कि वो अपने शरीर को डोनेट करेगा. तो उसकी मौत के बाद अंग डोनेट किये जाते हैं. अगर ऐसा नहीं भी किया तो उस व्यक्ति के परिवार वाले की इच्छा पर अंगदान किया जा सकता है. इससे कम से कम 8 से 9 लोगों की जान बचाई जा सकती है.

वहीं शरीर के कुछ अंग ऐसे भी होते हैं, जो जीवित व्यक्ति भी दान कर सकता है. जैसे कि- आंख, किडनी, लिवर. क्योंकि इंसान का काम तो एक आंख और एक किडनी से भी चल सकता है. ऐसे में कई बार करीबियों के लिए एक आंख या एक किडनी को लोग दान कर देते हैं. वहीं, लिवर का एक छोटा हिस्सा काटकर जरूरतमंद की बॉडी में ट्रांसप्लांट किया जाता है. पिछले कुछ मेडिकल साइंस ने बहुत तरक्की की है, इसलिए अब इस तरह की सर्जरी काफी आसान भी है. रिपोर्ट में 2021 में प्रकाशित एक्सपेरिमेंटल एंड क्लीनिकल ट्रांसप्लांटेशन जर्नल की रिसर्च का जिक्र है. इस रिसर्च का डेटा कहता है कि भारत में 80 फीसदी जीवित डोनर महिलाएं हैं. ज्यादातर पत्नी या मां होती हैं. वहीं 80 फीसदी अंग पाने वाल पुरुष हैं.

अखबार ने अपनी रिपोर्ट में एक अस्पताल का उदाहरण भी दिया है. पुणे के डीवाई पाटिल मेडिकल कॉलेज, अस्पताल और रिसर्च सेंटर की एक ऑर्गन ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर ने बताया कि वो पिछले 15 सालों से इस फील्ड में काम कर रही हैं. उनकी नजर में सिर्फ एक बार ऐसा हुआ, जब एक पति अपनी पत्नी के लिए ऑर्गन डोनेट के लिए आगे आया. वो बताती हैं कि आमतौर पर पत्नी, मां या पिता भी अंग डोनेट करते हैं.

अंग्रेजी अखबार द हिंदू ने भी अक्टूबर 2018 में इसी तरह की रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इसमें आरटीआई के जरिये पांच जगहों से 2008 से लेकर 2017 तक का डेटा इकट्ठा किया गया था. पता चला था कि किडनी डोनेट करने वालों में महिलाओं की संख्या 74 फीसदी है. अखबार ने कई और देशों के बारे में जानकारी दी थी. जहां इसी तरह का ट्रेंड था. अमेरिका में 62 फीसदी किडनी डोनेट वाली महिलाएं थीं. वहां भी अंग पाने वाली महिलाओं की संख्या कम थी. जैसे लीवर पाने वालों में 35 फीसदी और किडनी ट्रांसप्लांट में 39 फीसदी महिलाएं रिसीवर थीं. ये सही है कि महिलाओं को हमेशा केयर गिवर के रूप में देखा जाता है. लेकिन जब उनकी केयरिंग की बात आती है तो कई मामलों में रुढ़िवादी रवैया अपनाते हुए बढ़ते रहते हैं. ऑक्सफैम इंटरनैशनल की 2020 की रिपोर्ट घरेलू औरतों पर ही फोकस्ड थी. जो अपने घर संभालती हैं, परिवार का ख्याल रखती हैं. रिपोर्ट में उन औरतों की स्थिति पर डिटेल में बात की गई थी जो घर की देखभाल, परिवारवालों का ख्याल रखने में अपनी उम्र खपा देती हैं लेकिन उन्हें उसका मेहनताना नहीं मिलता है. ये औरतें हमारी अर्थव्यवस्था को चलाने में सबसे ज़रूरी भूमिका निभाती हैं, इंजन का काम करती हैं. लेकिन इनके योगदान को पूरी तरह नकार दिया जाता है.

हम वापस ऑर्गन डोनेशन के मुद्दे पर आते हैं. इसको लेकर कुछ जरूरी बातें हैं जो कर लेनी चाहिए. अंगदान से कई लाइलाज बीमारियां ठीक हो सकती हैं. जैसे कि हार्ट फेल की लास्ट स्टेज, फेफड़ों की बीमारियां, आंखों की कुछ बड़ी बीमारियां (जैसे पुतलियों के ख़राब होने के चलते अंधापन), अग्नयाशय की बिमारी, जली हुई स्किन.

भारत सरकार ने फ़रवरी 1995 में 'मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम' पास किया था. जिसके अन्तर्गत अंगदान और मस्तिष्क मृत्यु को क़ानूनी वैधता प्रदान की गई है. पिछले कुछ सालों में देश के भीतर अंगदान को लेकर जागरूकता बढ़ी है. लेकिन आज भी ये संख्या काफी कम है. भारत में 0.0001 परसेंट से भी कम लोग अंगदान करते हैं. मतलब दस लाख में से एक आदमी से भी कम (0.86). प्रति 10 लाख की आबादी में से अमेरिका में 26 और स्पेन में 36 अंगदान होते हैं.

एक गैर सरकारी संस्था 'ऑर्गन इंडिया' के अनुसार, भारत में हर साल 5 लाख लोगों को ऑर्गन ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है. लेकिन ऑर्गन उपलब्ध नहीं होने के कारण अधिकतर की मृत्यु हो जाती है. मरीजों में सबसे ज्यादा जरूरत किडनी की है. करीब 2 लाख. इसके बाद 50 हजार हार्ट और लिवर की जरूरत है. इसी तरह देश में हर साल 2 लाख आंखों यानी कॉर्निया की जरूरत होती है. लेकिन सिर्फ 4 में से एक व्यक्ति को आंख मिल पाती है. कॉर्निया आंखों की सबसे आगे वाली परत को कहते हैं. ये ट्रांसपेरेंट होता है. इसमें ख़राबी आने के कारण आंखों की रोशनी चली जाती है या कुछ लोगों में एकदम कम हो जाती है. इसे कॉर्नियल ट्रांसप्लांट के जरिये ठीक किया जाता है.

ये डेटा हमने आपको बताया ताकि आप गंभीरता को समझ सकें. चाहे आंख हो, किडनी हा या लिवर, मिथकों के कारण कई मरीज ठीक नहीं हो पाते हैं. लोग अंगदान करने से डरते हैं. जैसे लिवर डोनेट करने को लेकर एक मिथक है कि लिवर ट्रांसप्लांट के बाद मरीज या डोनर को कोई दिक्कत होगी. एक और मिथक है कि लिवर ट्रांसप्लांट के बाद मरीज ज्यादा समय तक नहीं जीता. जबकि डॉक्टर्स कहते हैं कि ऑपरेशन के बाद डोनर और मरीज दोनों सुरक्षित होते हैं. ऐसा ही शरीर के दूसरे अंगों को लेकर भी है. मृतक डोनर्स को लेकर भी धार्मिक मान्यताएं बाधा बनती हैं.

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