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68 साल बाद अमेरिका से हिसार आकर पूर्व नेवी कमांडर ने चुकाई 28 रुपये की उधारी

दादा ने पिलाई थी पेड़े वाली लस्सी, पोते को लौटाया पैसा.

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Hisar आकर विनय को पैसे लौटाते BS उप्पल. तस्वीर- आजतक
कहते हैं आदमी की प्रसिद्धि उसकी ईमानदारी पर निर्भर करती है. लोग अपनी ईमानदारी से दुनिया में मिसाल पेश कर जाते हैं. ऐसा ही वाकया हरियाणा के हिसार में सामने आया है. यहां भारतीय नौसेना के एक रिटायर्ड कमांडर ने 68 साल पहले ली गई उधारी चुकाने के लिए अमेरिका से हिसार तक का सफर तय किया.
आजतक के प्रवीण कुमार की रिपोर्ट के मुताबिक, रिटायर्ड कमांडर BS उप्पल को एक हलवाई को 28 रुपए चुकाने थे, लेकिन उस वक्त की परिस्थिति में ये नहीं हो पाया. उधारी के पैसे इतने ज्यादा नहीं थे, लेकिन उप्पल इस बात को कभी नहीं भूले और उम्र के आखिरी पड़ाव में लंबा सफर तय कर उधारी चुकाने हिसार लौट आए. दिलचस्प बात ये रही कि जिस वक्त ये उधारी ली गई थी, तब मिठाई की दुकान पर शम्भू दयाल बंसल बैठते थे और अब उनके पोते विनय बंसल दुकान को संभालते हैं. उधारी की दिलचस्प कहानी बात साल 1954 की है,  जब उप्पल हिसार में रहते थे. उनके घर के पास में ही शम्भू दयाल बंसल की मिठाई की दुकान थी. उप्पल अक्सर शम्भू की दुकान पर मिठाई खाने जाया करते थे. उप्पल को लस्सी में पेड़े डालकर पीना बेहद पसंद था. एक बार पेड़े वाली लस्सी पीने के बाद उप्पल पैसे नहीं दे पाए. ये उधारी 28 रुपए की थी. उनको लगा कि दुकान पर उनका आना-जाना लगा ही रहता है, अगली बार आएंगे तो उधारी चुका देंगे. इसी बीच उप्पल की नेवी में नौकरी लग गई और उन्हें शहर छोड़कर बाहर जाना पड़ गया.
नौकरी के दौरान उन्हें हिसार लौटने का समय नहीं मिल पाया और कई साल गुजर गए. उप्पल नेवी से रिटायर हो गए. रिटायरमेंट के बाद वे अपने बेटे के पास रहने के लिए अमेरिका चले गए. अमेरिका में रहते हुए उन्हें उधारी की बात याद आती रहती थी. एक दिन उन्होंने हिसार वापस जाकर हलवाई की उधारी चुकाने का मन बना लिया और 85 साल की उम्र में उधारी लौटाने  चले आए.
हिसार स्थित हलवाई की दुकान. फोटो- मुनीश खन्ना (गूगल मैप्स)
हिसार स्थित हलवाई की दुकान. फोटो- मुनीश खन्ना (गूगल मैप्स)
28 रुपये के बदले 10 हजार लौटाए उप्पल ने दुकान पर पहुंच कर 28 रुपये के बदले 10 हजार लौटाने लगे. विनय ने इतनी बड़ी रकम लेने से इंकार कर दिया. लेकिन उप्पल के आग्रह करने पर विनय ने पैसे स्वीकार कर लिए. उप्पल ने पैसे लौटाते हुए विनय से कहा,
"आपकी दुकान पर मैं दही की लस्सी में पेड़े डालकर पीता था, जिसके 28 रुपये मुझे देने थे. फौजी सेवा के दौरान हिसार आने का मौका नहीं मिला और रिटायर होने के बाद मैं अमेरिका अपने बेटे के पास चला गया. वहां मुझे हिसार की दो बातें हमेशा याद रहती थीं. एक तो आपके दादा जी के 28 रुपये देने थे और दूसरा मैं हरजीराम हिन्दू हाई स्कूल जाना चाहता हूं. मैं दसवीं पास करने के बाद अपने स्कूल नहीं जा सका था. आपकी राशि का उधार चुकाने और अपनी शिक्षण संस्था को देखने के लिए मैं विशेष रूप से हिसार में आया हूं. मेरे सिर पर आपकी दुकान का ऋण बकाया है, इसे ऋण से मुक्त करने के लिए कृपया यह राशि स्वीकार कर लो. मैं अमेरिका से विशेष रूप से इसी कार्य के लिए आया हूं."
हालांकि जब उप्पल अपने स्कूल पहुंचे तो वो बंद मिला, जिसके बाद उन्हें निराश लौटना पड़ा. पाकिस्तानी जहाज गिराया BS उप्पल जब नेवी में कमांडर थे, उस वक्त भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध चल रहा था. उप्पल की ड्यूटी एक पनडुब्बी में लगाई गई. इस दौरान उनका सामना एक पाकिस्तानी जहाज से हो गया. उप्पल ने बहादुरी दिखाते हुए उस जहाज को गिरा दिया और अपने सभी साथियों को सुरक्षित वापस ले आए थे. इस बहादुरी के लिए भारतीय सेना ने उन्हें बहादुरी के नौसेना पुरस्कार से सम्मानित किया था.

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