फिल्म- राजा शिवाजी
डायरेक्टर- रितेश देशमुख
एक्टर्स- रितेश देशमुख, संजय दत्त, विद्या बालन, अभिषेक बच्चन, अमोल गुप्ते, सचिन खेडेकर, फरदीन खान
रेटिंग- 2.5 स्टार्स
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फिल्म रिव्यू- राजा शिवाजी
छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन पर बनी 'राजा शिवाजी' कैसी है, जानने के लिए पढ़ें ये रिव्यू.


रितेश देशमुख ने छत्रपति शिवाजी महाराज पर एक फिल्म बनाई है. जिसका नाम है 'राजा शिवाजी'. रितेश ने इस फिल्म को डायरेक्ट किया है. छत्रपति के रोल में भी वो खुद नज़र आए हैं. ये फिल्म कमोबेश उसी यूनिवर्स का हिस्सा है, जिसमें 'तान्हाजी' और 'छावा' घटी थीं. इंडियन सिनेमा में बायोग्राफिकल फिल्में बनाना ट्रिकी काम है. उसमें भी अगर वो बायोपिक किसी हिस्टॉरिकल फिगर की है, जिनका नाम आज भी बड़े सम्मान से लिया जाता है, तो मामला और भी मुश्किल हो जाता है. एक चूक और सारा काम खराब. इस चूक की गुंजाइश को कम करने के लिए बेहद सैनिटाइज्ड किस्म की फिल्में बनानी पड़ती हैं. टिपिकल-कन्वेंशनल बायोपिक. जो सेट टेंप्लेट पर चलती हैं. 'राजा शिवाजी' में रितेश भी वही करते हैं. आपको आदमी के बारे में कम, उस पर्सनैलिटी के बारे में ज़्यादा बताया जाता है. उनके जीवन-करियर की मेजर हाइलाइट्स का मोंटाज बनाकर दर्शकों को चिपका दिया जाता है. उसमें थोड़ी से देशभक्ति की भावना डालिए, भगवा झंडा लहराइए, हर हर महादेव के नारे लगाइए और पिक्चर चलाइए. क्योंकि पब्लिक को वही चाहिए. जिस व्यक्ति का नाम सही से न लेने पर कॉमेडियंस के साथ हिंसा हो जाती हैं. ऑडिटोरियम में तोड़ दिए जाते हैं. उनकी कहानी दिखाने में रचनात्मक आज़ादी तो नहीं ही ली जा सकती.
'राजा शिवाजी' भी इसी लीक पर चलती है. फर्ज करिए कि हमारी या आपकी लाइफ पर कोई फिल्म बन रही है. और उसे देखकर आप खुद रिलेट नहीं कर पा रहे हैं. जबकि वो आपकी ही कहानी है. अगर छत्रपति शिवाजी महाराज आज होते, तो ये फिल्म देखकर उन्हें भी ऐसा ही लगता. यूं तो छत्रपति को देशभर में जाना और माना जाता है. सबको उनकी कहानी मालूम है. चूंकी ये एक फिल्म है और हमने देखी है, इसलिए हमारी ज़िम्मेदार बनती है कि आपको फिल्म की बुनियादी स्टोरीलाइन बताएं. ये कहानी है एक ऐसे व्यक्ति की जो बचपन से ही महान हैं. क्योंकि फिल्म उन्हें वैसे ही ट्रीट करती है. बचपन से लेकर बड़े होने तक उन्होंने जो-जो महान काम किए, वो सब आपको फिल्म में दिखाया-बताया जाता है. जिसमें सबसे मुख्य बात है उनका ख्वाब. हिंद स्वराज का ख्वाब.
'राजा शिवाजी' बड़ी महत्वाकांक्षी फिल्म लगती है. मगर सिर्फ दिखने में. इसके जेहन में ऐसी कोई बात नहीं है, जो आपको पहली बार बताई जाए. या ऐसे नज़रिए से बताई जाए कि आप हैरान-परेशान रह जाएं. ये एक ऑलरेडी महान आदमी की कहानी है, जिसे फिल्म के माध्यम से और ज़्यादा महान बनाने-बताने की कोशिश होती है. ये सिर्फ छत्रपति के शरीर की बात करती है. आत्मा में नहीं उतरती. ये बताती है कि वो लीडर कैसे थे. शाषक कैसे थे. आदमी कैसे थे, इस बारे में कोई बात नहीं होती. ये उनकी प्रोफेशनल बायोपिक है.
हालांकि इस फिल्म की जो बात मुझे बेहतर लगी, वो ये कि इसमें देशभक्ति वाले जज्बे का ओवर द टॉप चित्रण नहीं था. अगर किसी आदमी के जीवन का एक्कै मक़सद है- हिंद स्वराज, तो वो आपको बताना ही पड़ेगा. मगर इस फिल्म का फोकस सिर्फ वही एक चीज़ करने पर नहीं है. इस फिल्म से मेरा सबसे मेजर और पॉजिटिव टेकअवे यही था. कि ये आज के माहौल को भुनाने की कोशिश नहीं करती. इसके लिए रितेश को साधुवाद.
फिल्म में छत्रपति शिवाजी महाराज का रोल रितेश देशमुख ने किया है. कुछ-एक सीन्स को छोड़कर आपको एक्टर और कैरेक्टर के बीच वो तारतम्यता महसूस नहीं होती. छत्रपति का जो ऑरा बताया जाता है, वो आपको रितेश में नज़र नहीं आता. मगर वो खटकते नहीं हैं. फिल्म में एक सीन है, जब वो अपने एक करीबी की मौत की खबर देने अपनी मां के पास जाते हैं. वो सीन सुंदर बन पड़ा है. क्योंकि उस सीन को जितना ह्रदयविदारक होना था, वो उतना होता है. संजय दत्त ने फिल्म के मेन विलन अफज़ल खान का रोल किया है. वो बेहद क्रूर और बुरा आदमी है. हिंदी सिनेमा में मुग़ल पात्रों के कैरेक्टराइजेशन के मामले में कुछ अलग ऑफर नहीं किया जाता. ये फिल्म भी नहीं करती. वो स्ट्रेट-आउट एक नेगेटिव आदमी है. उसमें कोई खूबी नहीं है. छत्रपति शिवाजी महाराज में खामी नहीं है. प्लेन एंड सिंपल. इसलिए ये फिल्म बड़ी सिंपल हो जाती है. बुराई पर अच्छाई की जीत.
अभिषेक बच्चन ने छत्रपति शिवाजी महाराज के बड़े भाई संभाजी का रोल किया है. वो परफॉरमेंस वाइज़ सबसे आकर्षक किरदार हैं. मुझे पहली बार अभिषेक बच्चन को स्क्रीन पर थोड़ी देर और देखने की इच्छा हुई. अमोल गुप्ते को बड़े रॉयल तरीके से वेस्ट किया गया है. विद्या बालन सरप्राइज़ एलीमेंट थीं. मगर उनका भी स्क्रीनटाइम बेहद सीमित है.
'राजा शिवाजी' की आप चाहे, जितनी तारीफ या आलोचना कर लें, इसे उससे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला है. ये उसके परे वाली फिल्म है. मगर इमोशनल डिसकनेक्ट इसका सबसे बड़ा मसला है. आप कहीं भी स्टोरी से जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते. फिल्म आपको कुछ फील नहीं करवा पाती. एक्शन सीक्वेंसेज़ अच्छे हैं. फिल्म के सेकंड हाफ में एक सीक्वेंस है, जिसमें अफज़ल खान और छत्रपति शिवाजी महाराज के बीच एक डेडलॉक जैसी सिचुएशन बन जाती है. वो हिस्सा फिल्म के हेवी मेलोड्रमैटिक टोन को घोलने का काम करता है. इसलिए वो मज़ेदार और थ्रिलिंग दोनों है. ये इकलौता सीक्वेंस है, जो छत्रपति की बुद्धिमत्ता और युद्ध कौशल का प्रमाण बनता है.
फिल्म में अगर CGI का काम बेहतर होता, तो थिएटर में फिल्म देखने के अनुभव को और समृद्ध करता. मगर आपके धैर्य की असली परीक्षा लेती है फिल्म की लंबाई. ये सवा तीन घंटे की फिल्म है, जिसे 'धुरंधर' की तरह आठ चैप्टर्स में तोड़ा गया है. अगर उसे थोड़ा काटा-पीटा जाता है, तो फिल्म की कुछ खामियां छुप जातीं. मैं ये नहीं कह रहा कि 'राजा शिवाजी' एक बुरी फिल्म है. क्योंकि ये उतनी खराब फिल्म है भी नहीं. हालांकि अगर ये खराब फिल्म होती भी, तो भी शायद मैं ये कह नहीं पाता. क्योंकि आज के समय में आप वो बात कह नहीं सकते. और यही इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी है.
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