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भारतीय अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन क्या वापस आ गए हैं?

सेंसेक्स का पहली बार 50 हज़ार का आंकड़ा पार करना क्या बताता है?

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फोटो - thelallantop
दिनभर शेयर बाज़ार से आई एक ख़बर की खूब चर्चा रही. शेयर बाज़ार में सेंसेक्स ने आज पहली बार 50 हज़ार का आंकड़ा पार किया. और इसके बाद से अर्थव्यवस्था को लेकर बधाइयों का दौर शुरू हो गया. सेंसेक्स को ये बुलंदी मोदी सरकार की नीतियों से मिली है, ये कहकर बीजेपी ने क्रेडिट लेने में देरी नहीं की. बीजेपी ने ट्विटर पर लिखा कि कोरोना संकट के बावजूद अच्छी नीतियों की वजह से सेंसेक्स को ये कामयाबी हासिल हुई है. तो इस आंकड़े को हमें किस तरफ से पढ़ना चाहिए? क्या सेसेंक्स के 50 हज़ार से पार चले जाने का ये मतलब निकाला जाए कि भारत की अर्थव्यवस्था में सब सही रास्ते पर आ गया है? और जब जीडीपी के आंकड़े नकारात्मक आ रहे हैं, बेरोज़गारी की दर बढ़ी हुई है, तब सेंसेक्स में इतनी तेज़ी का क्या मतलब निकलता है? ये ही समझने की कोशिश करेंगे बड़ी खबर में. सबसे पहले तो सेंसेक्स को समझिए सेंसेक्स यानी सेंसिटिव इंडेक्स. दोनों शब्दों का थोड़ा थोड़ा हिस्सा मिलाकर सेंसेक्स शब्द गढ़ा गया. तो सेंसेक्स किसका सेंसिटिव इंडेक्स है? बॉम्बे स्टॉक एक्सजेंच यानी बीएसई का. बीएसई में लिस्टेड 30 टॉप की कंपनियों का सामूहिक इंडेक्स है सेंसेक्स. यानी उन 30 बड़ी कंपनियों के शेयर से ये अनुमान लगाया जाता है बीएसई ऊपर जा रहा है या नीचे. एक तरह से शेयर बाज़ार की धड़कन है सेंसेक्स. एक जनवरी 1986 से ये आंकड़ा जारी होना शुरू हुआ. और बेस ईयर माना गया 1979. 1 अप्रैल 1979 को सेंसेक्स की बेस वेल्यू 100 रुपये माने गई थी. और अब, 41 साल बाद ये 50, हज़ार हो गई है. यानी 500 गुना बढ़ गई है. सीधे शब्दों में इस तरह से समझिए कि 1979 में किसी ने 100 रुपये लगाए होते तो वो आज बढ़कर 50 हजार रुपये हो जाते. अब हम ये समझने की कोशिश करते हैं कि क्या मोदी सरकार के राज में ही सेंसेक्स इतनी तेज़ी से भाग रहा है या पहले की सरकारों में भी ऐसी ही रफ्तार रही थी. 16 मई 2014 को जब लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बहुमत मिला था तो शेयर बाज़ार ने पहली बार 25 हज़ार का आंकड़ा छुआ था. 25 हज़ार से अब हो गया है डबल यानी 50,000. साढ़े 6 साल में ही डबल हो गया है. और 25 हज़ार तक पहुंचने में कितने साल लगे थे, ये भी देख लीजिए. # 1990 में सेंसेक्स ने 1000 का आंकड़ा पार किया था. # अक्टूबर 1999 में जब एनडीए की सरकार बनी तो 5 हज़ार का आंकड़ा पार किया. # जब मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे तो फरवरी 2006 में 10 हजार का आंकड़ा पार किया. दिसंबर 2007 में ही सेंसेक्स 20 हज़ार के पार चला गया था. लेकिन फिर 2008 वाली वैश्विक मंदी के दौर में वापस नीचे आ गया और सत्यम स्कैम की वजह से 10 हजार के भी नीचे आ गया. # 2009 के बाद सेंसेक्स तेजी से बढ़ा और 2014 तक 25 हज़ार से थोड़ा दूर था. # 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने से तीन दिन पहले, माने 13 मई को 24 हजार पर था सेंसेक्स. # 2019 में जब पीएम मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बने, तो 40 हज़ार पर चला गया. # कोविड लॉकडाउन से पहले 42 हजार था. फिर कोरोना आया तो ग्राफ नीचे चला गया. 30 हजार से भी नीचे आ गया. शेयर बाज़ार में कोहराम मच गया. लेकिन 91 फीसदी बढ़ते के साथ आज इसने 50 हजार को छू लिया है. शेयर की डिमांड क्यों और कब बढ़ती है? अब ये तो बात हुई सेंसेक्स के सफर की. लेकिन सेंसेक्स के बढ़ने से ये संकेत नहीं मिलता है कि देश अर्थव्यवस्था भी उसी रफ्तार से बढ़ रही है या आम लोगों को भी उतनी ही तरक्की मिल रही है. ये 50 हजार वाला आंकड़ा सिर्फ उन 30 बड़ी कंपनियों की तरक्की का है जो सेंसेक्स में शामिल हैं. यानी कंपनियों के शेयर बढ़ने से सेंसेक्स बढ़ रहे हैं. और कंपनियों के शेयर के दाम डिमांड और सप्लाई के हिसाब से बढ़ता है. शेयर खरीदने वाले ज्यादा होंगे तो शेयर के दाम बढ़ेंगे. और शेयर की डिमांड क्यों और कब बढ़ती है ये फैक्टर कई चीजों पर डिपेंड करता है, जैसे कंपनी की तरक्की, सरकार की नीतियां, अर्थव्यवस्था को लेकर एक्सपेक्टेशन. एक और बात. सेंसेक्स के बढ़ने से ''पर कैपिटा इनकम'' या मज़दूरी बढ़ने का कोई सीधा संबंध नहीं है. ये ग्राफ देखिए. इसमें लाल लाइन सेंसेक्स की है और नीली वाली लाइन ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी के रेट की. 1998 से लेकर 2004 तक ये पैरलल चलता है लेकिन उसके बाद सेंसेक्स तेज़ी से बढ़ता है. तुलनात्मक रुप से रूरल वेजे कम बढ़ते हैं. और अब ये हालत है सेंसेक्स तेज़ी से बढ़ रहा है तो भी रूरल वेज घट रहे हैं. कहने का मतलब ये है कि सेंसेक्स का घटना इकनॉमी का सिर्फ एक इंडिकेटर है, ऑवरऑल अर्थव्यवस्था में सुधार या तरक्की के दूसरे इंडिकेटर्स भी हैं जो अभी ठीक नहीं है. इसलिए सेंसेक्स के बढ़ने को लेकर किसी खुशफहमी में पड़ना ठीक नहीं होगा. कोरोना और लॉकडाउन के बावजूद शेयर बाज़ार ने अच्छी रिकवरी की लेकिन देश के बाकी सेक्टर्स के लिए ये बात सच नहीं है. जब पिछले साल कोरोना के सरकार ने राहत पैकेज का ऐलान किया था तो कई सेक्टर्स को लोन देने की बात थी. सरकार रेहड़ी पटरी वालों को भी लोन देने के लिए पीएम स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि नाम से योजना शुरू की थी. इसमें बिना गारंटी के लिए 10-10 हज़ार का लोन स्ट्रीट वेंडर्स को देने की बात थी. लोन पर ब्याज़ दर 7.25 फीसदी है लेकिन वक्त पर लोन चुकाने पर ब्याज में 7 फीसदी सब्सिडी देने का प्रावधान है. अकाउंट एनपीए हो रहे हैं? सरकारी आंकड़े के मुताबिक बैंक्स ने अब तक 17 लाख 93 हजार लोन आवेदनों को स्वीकृति दे दी है और करीब 1300 करोड़ का लोन दे भी दिया है. सब्जी और फलों की दुकानें लगाने वालों ने सबसे ज्यादा लोन लिए हैं. अब योजना तो ठीक ही है लेकिन बैंक हाथ खड़े कर दे रहे हैं. बैंक कह रहे हैं कि लोन वाले अकाउंट एनपीए हो रहे हैं. एक अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक अब बैंक निगर निगमों से कह रहे हैं कि हमने आपकी शिनाख्त पर ही स्ट्रीट वेंडर्स को लोन दिए थे, उसे रिकवर करने में हमारी मदद करिए. बैंकों के लिए लोन का NPA हो जाना अब कोरोना के बाद और बड़ा सिरदर्द बन गया है. और लोन एनपीए कैसे होते हैं ये भी समझिए. जब कोई व्यक्ति या संस्था बैंक से लोन लेती है तो ज़रूरी नहीं कि वो लोन वापस करे ही करे. कभी मजबूरियों के चलते और कभी इसलिए कि उसका लोन लेते वक़्त ही फ़्रॉड करना उद्देश्य था, व्यक्ति या संस्था पूरा लोन या बचे हुए लोन की किस्तें देना बंद कर देती है. इन लोन वापस न करने वालों को डिफ़ॉल्टर कहा जाता है. हो सकता है डिफ़ॉल्टर कुछ दिनों बाद पैसे देने शुरू दें, या एक दो किस्तों के बाद शायद. या फिर कुछ फ़ॉलो-अप वग़ैरह लेने के बाद. लेकिन अगर काफ़ी दिनों बाद और सारे लीगल हथकंडे अपना चुकने के बावजूद बैंक को अपना पैसा इन डिफ़ॉल्टर्स से वापस नहीं मिलता तो वो मान के चलते हैं कि अब ये पैसे वापस नहीं आने वाले. इस हिसाब को अपने खातों में रखना माने अपनी बैलेंस शीट में ‘एसेट’ वाले कॉलम में रखना, अपनी बैलेंस शीट को ख़राब करना ही माना जाता है. तो इसलिए उस अमाउंट को किसी और मद में रख दिया जाता है, ताकि बैंक की ऑडिट रिपोर्ट ना खराब हो. माने कोई बाहर से देखे तो लगे, सब चंगा सी. इसी मद को कहा जाता है ‘एनपीए’ यानी ‘नॉन परफ़ॉर्मिंग एसेट’. काफ़ी समय बाद जब बैंक निश्चित हो जाता है कि एनपीए अब नहीं मिलने वाला तो, उसे अब अपनी बैलेंस शीट में से भी हटा देता है. मतलब ‘राइट ऑफ़’ कर देता है. ये NPA विजय माल्या जैसे बड़े कारोबारियों से लेकर छोटे कर्ज़दारों तक के लोन होते हैं. ऐसे में अब बात हो रही है बैड बैंक की बैंकों की संस्था इंडियन बैंक एसोसिएशन यानी IBA ने पिछले साल 12 मई को वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक को यह प्रस्ताव दिया कि देश में एक 'बैड बैंक' की स्थापना की जाए. आईबीए ने सरकार से इसके लिए 10 हज़ार करोड़ रुपये की शुरुआती पूंजी की भी मांग की है. यह बैड बैंक असल में एक थर्ड पार्टी होगा जो बैंकों के बैड लोन यानी फंसे कर्ज खरीद लेगा और उसकी वसूली खुद करेगा. इस तरह बैंक अपने बहीखाते को साफ-सुथरा करेंगे और बैड बैंक फायदा कमाएगा. देश के वित्तीय तंत्र में बढ़ते NPA से उभरने का ये एक तरीका बताया जा रहा है. भारत में बैड बैंक बनाने का आइडिया सबसे पहले साल 2016-17 के इकोनॉमिक सर्वे में आया था. तब यह कहा गया था कि सार्वजनिक बैंकों के एनपीए की समस्या से निपटने के लिए एक पब्लिक सेक्टर रीहैबिलिटेशन एजेंसी बनानी चाहिए. इस विचार के साथ ही बैड बैंक का विचार आया. पिछले साल IBA ने इसका प्रस्ताव रखा और एक बार फिर ये चर्चा में इसलिए आया है क्योंकि रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा है कि वो बैड बैंक के प्रस्ताव पर विचार करेंगे. बैड बैंक का कॉन्स्पेपट अमेरिका से आया है, वहां 1988 मेलन बैंक ने 1988 में पहला बैड बैंक बनाया था. लेकिन भारत में इस तरह के प्रस्ताव को लेकर अर्थशास्त्रियों की राय बंटी हुई. मसलन पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन इस प्रस्ताव के खिलाफ थे. उनका मानना है ये एक पॉकेट से चीज़ दूसरे पॉकेट में रखने जैसा है कोई खास फायदा नहीं होगा. अभी सरकार के स्तर पर बैड बैंक को लेकर फैसले का कोई संकेत नहीं मिला है. आर्थिक मोर्चे की सभी खबरों पर हम बराबर काम कर रहे हैं. अगर आप इन मसलों में दिलचस्पी लेते हैं, तो आपको हमारा आर्थिक मामलों पर खास प्रोग्राम अर्थात ज़रूर देखना चाहिए.

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