The Lallantop

जबड़ा फाड़कर खाना खाने वालों के लिए गुड न्यूज आई है

पढ़कर डकार लें.

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फोटो - thelallantop
दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं. एक वो, जिन्हें बाहर खाना पसंद होता है. घूम-घूमकर खाने वाले लोग. चुन-चुनकर खाने वाले लोग. दुनिया-जहान की डिशेज पर एकदम विनोद दुआ वाली राय रखने वाले लोग, 'मदनी वाले का मुर्ग मुसल्लम खाइए साहब, उसका जो सौंठ और काली मिर्च का इस्तेमाल है, कसम से मेरी दादी को मात करता है' या 'यहां के स्टेक्स ट्राय करो, मीडियम ग्रिल्ड; कसम से बहुत सही होता है'. ये लोग बाहर खाने के लिए पैसे खर्च करने में भी बड़े लिबरल होते हैं.
दूसरी कैटेगरी उन लोगों की होती है, जो बस जीने के लिए खाते हैं. ये बाहर तभी खाते हैं, जब इन्हें खाना पड़ता  है. मसलन कोई ऐसा दिन, जब दरवाज़े के बाहर रखा टिफिन खोलने का दिल न हो या जब मेस का खाना निगलने की हिम्मत न हो या जिस दिन टेस्ट चेंज करना हो. बस तभी. यही वो अभागे हैं, जो शू-शां जगह भी मनाते हैं कि जो भी मिले, हाफ ज़रूर मिले, क्योंकि फुल ज़्यादा होता है. पूरा खा नहीं पाते और पैसा अलग भुगतना पड़ता है. हाफ में चार पैसे बचते हैं सो अलग. यही वो लोग हैं, जो बाहर खाने से पहले पचास लोगों को फोन लगाते हैं कि साथ चल दो (ताकि बिल शेयर हो जाए).
पिक्चरः restaurantgroupie
पिक्चरः restaurantgroupie
दोनों कैटेगरी के लोगों के लिए एक अच्छी खबर है, लेकिन इसमें ज़यादा भला दूसरी कैटेगरी वालों का हो रहा है. अब किसी डिश के साथ 'हाफ' बोलने पर इनको वेटर के 'कोल्ड लुक' का शिकार नहीं बनना पड़ेगा, क्योंकि सरकार ऐसा कानून लाने के बारे में सोच रही है, जिसके बाद रेस्टोरेंट्स हाफ प्लेट देने से मना नहीं कर पाएंगे. और सोने पर सुहागा ये कि रेस्टोरेंट्स हाफ प्लेट ऑर्डर करने पर आपको एक्सट्रा चार्ज नहीं कर पाएंगे. माने हाफ प्लेट मंगाएंगे, तो फुल प्लेट से आधे पैसे ही लगेंगे. वरना अभी तो ऐसा है कि रेस्टोरेंट्स हाफ प्लेट देकर अहसान भी लादते हैं और हाफ से ज़्यादा पैसे झटक लेते हैं.
नवभारत टाइम्स  के हवाले से खबर है कि कंज़्यूमर मिनिस्ट्री अभी इसके लिए राय-मशविरा कर रही है. रेस्टोरेंट असोसिएशन से भी बातचीत होगी. याने कुछ वक्त लग जाएगा, पर अभी से खुश  होने में कोई नुकसान नहीं है. खुशी फुल हो या हाफ, फ्री ही होती है.


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