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वाल्मीकि कॉरपोरेशन कथित घोटाले मामले में कर्नाटक सरकार में मंत्री रहे बी नागेंद्र गिरफ्तार, स्कैम की पूरी कहानी जानिए

ED ने कर्नाटक सरकार में पूर्व मंत्री बी नागेंद्र को गिरफ्तार किया है. बी नागेंद्र पर 94 करोड़ के घोटाले का आरोप है. जिसके चलते 6 जून को उनको अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था. इस मामले में बीजेपी कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का इस्तीफा मांग रही है.

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कर्नाटक के पूर्व मंत्री बी नागेंद्र को ईडी ने गिरफ्तार किया है.

प्रवर्तन निदेशालय (ED) की टीम बीते 2 जुलाई को कर्नाटक पहुंची. जांच एजेंसी कर्नाटक सरकार में पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता बी नागेंद्र के घर पहुंची थी. मामला कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम लिमिटेड में कथित तौर पर हुई 94.73 करोड़ रुपये की हेराफेरी का था. ED ने पूछताछ के बाद बी नागेंद्र को हिरासत में ले लिया. 13 जुलाई की सुबह उनकी मेडिकल जांच हुई. और फिर संपीगेहल्ली स्थित MP MLA स्पेशल कोर्ट में पेश किया गया. ED ने कोर्ट में 14 दिन की रिमांड मांगी. लेकिन कोर्ट से ED को 18 जुलाई तक की कस्टडी मिली. इसके पहले 10 जुलाई को वाल्मीकि विकास निगम से कथित गबन के सिलसिले में बी नागेंद्र और कांग्रेस विधायक बसनगौड़ा दद्दाल से जुड़े अलग-अलग ठिकानों पर ईडी ने छापेमारी की थी.

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बी नागेंद्र कर्नाटक सरकार में अनुसूचित जनजाति कल्याण मंत्री थे. वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास लिमिटेड इसी मंत्रालय के अंतर्गत आता है. बी नागेंद्र पर 94 करोड़ के घोटाले का आरोप है. जिसके चलते 6 जून को उनको अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था. इस मामले को लेकर अब BJP कर्नाटक सरकार पर हमलावर है. और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के इस्तीफे की मांग कर रही है.

कथित घोटाले का पता कैसे चला?
 

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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंपनी अधिनियम 1956 के तहत स्थापित KMVSTDC  कर्नाटक के अनुसूचित जनजाति कल्याण मंत्रालय का एक हिस्सा है. यह स्वरोजगार योजनाओं के तहत सब्सिडी और कर्ज देता है. और आदिवासी समुदाय के आर्थिक विकास के लिए स्किल ट्रेनिंग देता है.
यह कथित घोटाला तब पहली बार सामने आया जब शिवमोगा निवासी KMVSTDC के अधीक्षक पी चंद्रशेखरन की आत्महत्या की खबर आई. उन्होंने छह पन्नों का एक सुसाइड नोट लिखा था. जिसमें उन्होंने निगम में चल रही गड़बड़ियों का जिक्र किया. उन्होंने लिखा कि उन पर संगठन के भीतर चल रहे भ्रष्टाचार को उजागर नहीं करने का बहुत दबाव था. शिवमोगी पुलिस ने मामले में आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए आईपीसी की धारा के तहत अप्राकृतिक मौत का केस दर्ज किया. इसके बाद शिवमोगा के BJP विधायक एसएन चन्नबसप्पा ने प्रेस कांफ्रेस की. और पी चंद्रशेखरन के लिखे लेटर को दिखाकर मामले में जांच की मांग की.

चन्नबसप्पा ने दावा किया कि निगम को अपने अलग-अलग खातों में टोटल 187.3 करोड़ रुपये का अनुदान मिला था. जिसमें से 85 करोड़ रुपये दूसरे खातों में ट्रांसफर कर दिए गए. और शक है कि इन पैसों का गबन किया गया है.

कथित घोटाला क्या है?

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29 मई को KMVSTDC  के मैनेजिंग डायरेक्टर राजशेखर ने यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (UBI) से 94.73 करोड़ रुपये के निकासी की शिकायत दर्ज कराई. उनका आरोप था कि बोर्ड के प्रस्तावों पर फर्जी सिग्नेचर करके 94.73 करोड़ रुपये अवैध रूप से अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किए गए.

राजशेखर ने बताया कि उन्होंने 23 मई को बैंक की एमजी रोड शाखा के चीफ मैनेजर को इसकी जानकारी दी थी. जिसके बाद निगम के खाते में तुरंत 5 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए. उन्होंने एफआईआर में बताया कि बैंक से उन्होंने सीसीटीवी फुटेज मांगी थी. लेकिन बैंक ने अब तक फुटेज उपलब्ध नहीं कराई है. जिसके बाद निगम ने 27 मई को UBI के डिप्टी जनरल मैनेजर (ईस्ट) को पत्र लिखकर पूरी रकम जमा करने को कहा.

इसके बाद पुलिस ने 2 को बेंगलुरु के हाई ग्राउंड्स पुलिस स्टेशन में कुछ UBI अधिकारियों के खिलाफ केस दर्ज किया. इनके खिलाफ IPC की धारा 149 (सामान्य उद्देश्य के लिए गैरकानूनी सभा) 409 (लोक सेवकों, बैंकरों आदि द्रारा आपराधिक विश्वासघात) 420 (धोखाधड़ी) और 467 (जालसाजी) लगाई गई.

एसआईटी जांच में क्या पता चला?

राज्य सरकार ने इस कथित घोटाले की जांच के लिए सीआईडी में आर्थिक अपराध के एडिशनल डीजीपी मनीष खरबीकर की अध्यक्षता में एक विशेष जांच दल (SIT ) का गठन किया था. SIT  ने अब तक इस केस में 11 लोगों को गिरफ्तार किया है. और 40 करोड़ रुपये जब्त किए हैं. जिसे फर्जी कंपनियों के 18 बैंक खातों में ट्रांसफर किया गया था.

SIT जांच में मिले डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक 31 मार्च को पैसे कुछ संगठनों के नाम से हैदराबाद स्थित RBL बैंक में खोले गए फर्जी खातों में ट्रांसफर कर दी गई थी. जांच के मुताबिक, 31 मार्च को समाप्त होने वाले वितीय वर्ष में राज्य के खजाने से निगम के प्राइमरी यूबीआई अकाउंट में 50 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए. उस समय खाते में 187.33 करोड़ रुपये थे.

उसी दिन बोर्ड की बैठक में यह डिसीजन लिया गया कि 50 करोड़ रुपये 12 महीने के लिए फिक्स डिपॉजिट के रूप में बचाए जाएंगे. और उसी दिन 50 करोड़ रुपये की फिक्स डिपोजिट को सिक्योरिटी के तौर पर दिखाकर 45 करोड़ रुपये का लोन भी ले लिया गया.

कर्नाटक पुलिस के एक अधिकारी ने बताया, ये सभी लेन-देन एक ही दिन में हुए. इसमें बैंक अधिकारियों के अलावा निगम के कई लोग भी शामिल हैं. आगे की जांच से पता चला कि जिन 15 खातों में पैसा ट्रांसफर किया गया था. उनमें से नौ अकाउंट हैदराबाद के आरबीएल बैंक में 31 मार्च को खोले गए थे.

इसके बाद SIT  ने KMVSTDC के पूर्व एमडी जेजे पद्मनाभ, अकाउंट ऑफिसर परशुराम जी दुरुगनवर और फर्स्ट फाइनेंस क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसाइडी लिमिटेड के चेयरमैन सत्यनारायण को हैदराबाद से गिरफ्तार किया. पुलिस को शक है कि फर्जी खाते बनाने में सत्यनारायण की बड़ी भूमिका थी.

3 जून को CBI ने UBI के डिप्टी जेनरल मैनेजर और बेगलुरु (ईस्ट) के रिजनल हेड महेशा जे की कंप्लेन के आधार पर मामला दर्ज किया. FIR में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की तत्कालीन एमजी रोड ब्रांच हेड सुचिस्मिता राउल और उस ब्रांच की डिप्टी ब्रांच हेड दीपा डी के साथ -साथ कुछ प्राइवेट लोगों और सरकारी कर्मचारियों के नाम शामिल है.

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ED जांच को लेकर आमने सामने  बीजेपी कांग्रेस

बी नागेंद्र जिन्होंने 6 जून को इस्तीफा दिया था. खुद को बेकसूर बताया है. और भरोसा जताया है कि जांच प्रक्रिया के दौरान उन पर लगे सभी आरोप गलत साबित होंगे.

वहीं दूसरी तरफ राज्य में विपक्षी पार्टी BJP और जेडीएस इस मामले को लेकर सरकार पर हमलावर है. BJP सांसद और केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे ने घोटाले में कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया को दोषी ठहराते हुए उनके इस्तीफे की मांग की है. उन्होंने कहा ,

 मैंने 3 जुलाई को केंद्रीय गृह मंत्री को पत्र लिखकर मामले की सीबीआई जांच की मांग की थी. जब CBI जांच चल रही थी. तब कर्नाटक सरकार ने घोटाले को छिपाने के लिए SIT गठित कर दी. अब SIT CBI  की मदद नहीं कर रही है.

शोभा करंदलाजे ने आगे बताया कि वित्त मंत्रालय सिद्धारमैया के पास है. और उनके निर्देश के बिना किसी भी बैंक से कंपनिओं को 187 करोड़ रुपये ट्रांसफर करने की हिम्मत नहीं होगी.
वहीं ईडी के छापे पर प्रतिक्रिया देते हुए कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा कि छापे गैरजरुरी थे. जब एसआईटी ने पहले ही जांच पूरी कर ली है. और पैसे बरामद कर लिए हैं. तो ईडी के छापे की कोई जरुरत नहीं थी.

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