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दबंगों की वजह से एक दलित महिला की लाश को 28 घंटे तक इंतजार करना पड़ा

क्योंकि मेढ़ पर से मैयत गुज़रने नहीं दी गई. सड़क पर अंतिम संस्कार हुआ.

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मुरैना में दलितों को श्मशान तक न पहुंचने देने के मामले पहले भी होते रहे हैं
ज़िंदगी का सफर हर कोई अकेले तय करता है. जब वो मर जाता है, तो चार लोग उठाकर उसे श्मशान-कब्रिस्तान ले जाते हैं. मध्य प्रदेश के मुरैना में अपने इस आखिरी सफर पर निकलने से पहले एक औरत को पूरे 28 घंटे इंतज़ार करना पड़ा. उसे श्मशान तक जाने का रास्ता ही नहीं दिया गया. श्मशान दबंगों के खेतों के पार था और वो मेढ़ पर से मैयत ले जाने के खिलाफ थे. ये औरत एक दलित परिवार से थी. मजबूरी में औरत का अंतिम संस्कार सड़क पर कर दिया गया.
कंचनिया माहोर मध्य प्रदेश के मुरैना में रहती थीं. उनके गांव का नाम था पीपरीपुरा. 11 अक्टूबर, 2017 को देर रात कंचन बाई ने अपनी आखिरी सांस ली. उनके परिवार वाले रीति-रिवाज़ के मुताबिक उन्हें श्मशान ले जाकर अग्नि देना चाहते थे. लेकिन सरकारी ज़मीन पर बने गांव के श्मशान तक पक्का रास्ता नहीं था. श्मशान तक जाने का रास्ता कुछ खेतों की मेढ़ पर से गुज़रता था, जो गांव के दबंगों के थे. उन्होंने वहां घूरा बना रखा था. घूरा माने कचरे का ढेर.
कंचनिया के पति शीतल माहोर ने गांव के सरपंच केदार खटिक (जो खुद भी दलित हैं) से कहा कि श्मशान तक का रास्ता साफ करवा दें ताकि मैयत उस पर से गुज़र सके. लेकिन उन्होंने हाथ खड़े कर दिए.
मध्यप्रदेश में 181 सीएम हेल्पलाइन पर फोन करने पर 24 घंटे में कार्रवाई का दावा किया जाता है
मध्यप्रदेश में 181 सीएम हेल्पलाइन पर फोन करने पर 24 घंटे में कार्रवाई का दावा किया जाता है

मजबूरी में माहोर परिवार ने सीएम हेल्पलाइन पर फोन किया. मध्य प्रदेश में 181 डायल कर के मुख्यमंत्री तक अपनी शिकायत पहुंचाई जा सकती है. सरकार का दावा है कि 24 घंटे में ऐक्शन ले लिया जाता है. वहां से जवाब मिला कि 24 घंटे में कार्रवाई होगी. जब पुलिस को मालूम चला कि एक दलित परिवार की मैयत अंतिम संस्कार के इंतज़ार में है और रास्ते में अगड़ी जातियों के लोगों के खेत हैं, तो वो किसी बवाल की आशंका दूर करने पीपरीपुरा गांव आई भी. लेकिन पुलिस शांति की तसदीक कर के लौट गई. उन्होंने माहोर परिवार की कोई मदद नहीं की.
माहोर परिवार अब तक समझ गया था कि उन्हें मदद मिलने की संभावना कम ही है. तो गुरुवार को कंचनिया बाई का अंतिम संस्कार करने का फैसला लिया. 28 घंटे तक मुखाग्नि का इंतज़ार करने के बाद कंचन बाई का अंतिम संस्कार हुआ, वो भी एक सड़क पर.
आखिर कंचनिया माहोर का अंतिम संस्कार सड़क पर कर दिया गया
आखिर कंचनिया माहोर का अंतिम संस्कार सड़क पर कर दिया गया

'दी लल्लनटॉप' ने इस मामले को लेकर एक स्थानीय पत्रकार से बातचीत की. उन्होंने कहा,
श्मशान गांव के दबंगों के खेतों के पार है और वो अपनी मेढ़ पर से किसी को गुज़रने नहीं देते, क्योंकि वो धीरे-धीरे श्मशान कब्ज़ा लेना चाहते हैं. जिनके पास बड़े रकबे की ज़मीन है, वो अपने खेत में ही अपने परिजनों का अंतिम संस्कार कर देते हैं. लेकिन शीतल माहोर के पास इतनी ज़मीन नहीं है कि वो एक कोने में अपनी पत्नी की चिता जला पाते. इसलिए श्मशान तक जाना उनकी ज़रूरत भी थी और मजबूरी भी.
ज़्यादा परेशान करने वाली बात ये है कि पुलिस ने गांव जाकर भी इस मामले में दखल नहीं दिया. पुलिस चाहती तो तहसीलदार के साथ मिलकर मेढ़ पर से रास्ता साफ करवा सकती थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. प्रशासन का पक्ष जानने के लिए 'दी लल्लनटॉप' ने अंबा (जिस तहसील में पीपरीपुरा पड़ता है) के सब-डिविज़नल मैजिस्ट्रेट उमेश शुक्ला से बात करने की कोशिश की. लेकिन उन्होंने बात करने में असमर्थता जताई.
इस खबर की क्लोज़िंग में हम कोई आख्यान नहीं देंगे. हम बस इतना चाहते हैं कि आप दो चीज़ें नोट कर लें -
#1. जब ये सब हुआ, तब भारत को आज़ाद हुए 70 साल एक महीना 28 दिन बीत गए थे. #2. जब ये सब हुआ, तब भारत को एक गणतंत्र बने 67 साल 8 महीने 17 दिन बीत गए थे.
*तस्वीरें और जानकारी – गिर्राज राजौरिया



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