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निहलानी से सवाल पूछना जायज़ है, रिपोर्टर का तरीका बिलकुल नाजायज़

किसी की गलती उसे सरेआम बेइज़्ज़त करने का लाइसेंस नहीं बन सकती.

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फोटो - thelallantop

इट्स पहलाज टाइम. अगेन.

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पहलाज निहलानी ने टीवी पर मुंह खोलने से पहले कतई नहीं सोचा होगा कि उन्हें वोटिंग वाला आइडिया कितना महंगा पड़ेगा. उन्होंने कहा था कि वो इम्तियाज़ अली की फिल्म 'वेन हैरी मेट सेजल' में 'इंटरकोर्स' शब्द को तब पास करेंगे जब चैनल उन्हें उसके पक्ष में एक लाख वोट लाकर देगा. उन्होंने वोटिंग के नियम भी बदल कर देखे. लेकिन चैनल एक लाख वोट ले ही आया. तो बात ये हो गई है कि पहलाज समझ नहीं पा रहे कि अब क्या करें. पहलाज कितने 'असहाय' हो गए हैं, उसका अंदाज़ा उस वीडियो से मिल जाता है जो 'मिरर नाऊ' ने अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया है. 'बगलें झांकने' का मतलब नहीं जानते थे तो ये वीडियो आपके लिए ही है. देखिएः
पहलाज पर ये नौबत क्यों आन पड़ी, ये नहीं जानते तो हम बता दें. 19 जून को ‘वेन हैरी मेट सेजल’ का दूसरा मिनी प्रोमो रिलीज़ हुआ. इसमें अनुष्का का कैरेक्टर एक जगह ‘इंटरकोर्स’ कहता है. लेकिन ये प्रोमो टीवी पर नहीं चला क्योंकि उसके लिए सेंसर का सर्टिफिकेट चाहिए था जो अब भी अधर में लटका है. पहलाज ने फिल्म के ट्रेलर को U/A सर्टिफिकेट देने के लिए ये शर्त रखी थी कि उसमें से (और फिल्म से भी) ‘इंटरकोर्स’ शब्द हटा लिया जाए. पहलाज को जब लगा कि शाहरुख और अनुष्का ट्विटर पर यूं एक लाख वोट ले आएंगे तो उन्होंने अपनी डिमांड अपडेट कर दी. बोले कि जिस चैनल को बाइट दी थी, उसी को वोट लाने होंगे, ट्विटरबाज़ी नहीं चलेगी. और वोट होने चाहिए 36 साल से ज़्यादा उम्र वालों के. माने वोट देने लायक उम्र से दोगुनी उम्र तक नहीं पहुंचे हैं तो आप डिस्क्वालिफाई हो जाएंगे. पहलाज का लॉजिक था -
मकसद उन माता-पिता की राय इकट्ठा करना है जिनके 12 साल के बच्चे हों. वो चाहेंगे कि उनके बच्चे 'इंटरकोर्स' जानें तो अपन मानेंगे. इसलिए वोटर की उम्र कम से कम 36 साल होनी चाहिए. पहलाज ने मान लिया था कि 23 की उम्र में शादी करने वाले लोगों का 36 की उम्र तक पहुंचने पर 12 साल का बच्चा होगा !
वोट मांगते पहलाजः   ऐ साहिब ये ठीक नहीं... चैनल का दावा है कि वो इन शर्तों पर खरे उतरने वाले एक लाख से ऊपर वोट ले आया है. तो उन्होंने एक क्यूरियस पत्रकार को पहलाज के पीछे भेज दिया. पीछे इसलिए कहा क्योंकि वीडियो देख कर यही लगा कि वो पहलाज के पीछे-पीछे जा रही हैं. पहलाज लिफ्ट में चढ़ते हैं तो वो लिफ्ट में भी चढ़ जाती हैं. इस वीडियो में पहलाज को ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं देखने में एक तरह का सुख मिलता है. एक फीलिंग आती है, हिसाब बराबर करने वाली- कि चलो कोई तो निकला जो पहलाज और उनकी बेवकूफी से जीत गया. हंसने के लिए हम दो-तीन बार वीडियो प्ले कर के देखते हैं. लेकिन फिर नज़र आने लगता है कि ये भी एक तरह की बुलींग ही है. रिपोर्टर अपने सवाल पहलाज के दफ्तर में नहीं पूछ रही थी. वो उनका पीछा कर रही थी. हम पहलाज को ''don't follow me'' (मेरा पीछा मत करो) कहते हुए सुनते भी हैं. फिर भी वो लिफ्ट में घुस आती हैं. बाकी लोगों की मौजूदगी में पहलाज से सवाल करती रहती हैं. पहलाज अपमानित महसूस कर रहे होंगे. एक एजेंडे के तहत फिल्मों पर बे-सिर-पैर के कट लगाने की कीमत पहलाज की प्राइवेसी पर हमले से नहीं वसूली जा सकती. ऐसा करते ही आप पत्रकार से पैपराज़ी में तब्दील हो जाते हैं. किसी की गलती उसे सरेआम बेइज़्ज़त करने का लाइसेंस नहीं बन सकती. इस वीडियो में पहलाज पर हंसिए. लेकिन रिपोर्टर की हरकत पर को सही मानने की गलती करने से हर हाल में बचिए.   
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