'लिंफोसारकोमा ऑफ इंटेस्टाइन' (lymphosarcoma of the intestine) ये नाम ह्रषिकेश मुखर्जी की 1971 में आई फिल्म 'आनंद' में सुनने को मिलता है. फिल्म का मेन किरदार आनंद, जो सुपर स्टार राजेश खन्ना ने प्ले किया था. ये फिल्म मसाला फिल्मों से थोड़ा अलग है. इसमें हीरो आम सा हंसमुख इंसान है, एक ही मुलाकात में सबसे ऐसे घुल-मिल जाता है जैसे पानी में शक्कर. लेकिन हमेशा मजाक करने वाले आनंद की मीठी जिंदगी में एक कसक है, ‘लिंफोसारकोमा ऑफ इंटेस्टाइन.’ जो एक तरह का कैंसर है और आनंद के पास कुछ दिनों की जिंदगी बची है. भास्कर बनर्जी जिनका किरदार अमिताभ बच्चन ने निभाया था, आनंद को बचाने की हर मुमकिन कोशिश करते है. लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद वो आनंद को बचा नहीं पाते.
भारत में विदेशों के मुकाबले कैंसर का इलाज 3 गुना सस्ता कर देगी ये थेरेपी?
सवाल ये भी है कि सालों की तकनीकी तरक्की के बाद भी कैंसर से होने वाली मौतों में कोई कमी देखने को नहीं मिल रही है. लेकिन car-T cell therapy के रूप में एक उम्मीद की किरण जरूर देखने को मिल रही है. आइये समझते हैं कि ये क्या है और इससे भारत में कैंसर का इलाज कितना किफायती हो सकता है.
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मगर वो सत्तर के दशक की बात थी. कैंसर के इलाज की लिए तब ना तो कीमोथैरेपी (Chemotherapy) इतनी एडवांस हुई थी और ना ही दूसरे और तीसरे चरण का ट्रीटमेंट यानी इम्युनोथैरेपी (immunotherapy) और कार टी सेल थैरेपी (car-t cell therapy) ही अस्तित्व में आई थीं. अगर तब डॉ भास्कर बनर्जी के पास कार टी सेल थैरेपी का ऑप्शन होता तो आनंद शायद जि़ंदा होता.
साल 2022 में देश में कैंसर के करीब 14 लाख नए मामले देखे गए, और करीब 9 लाख लोगों ने इस बीमारी की वजह से अपनी जान गंवा दी. वहीं 2011 में ये आंकड़ा था, करीब 4.5 लाख का था. महज 11 सालों में ये आंकड़े दोगुने हो चुके हैं. सवाल ये भी है कि सालों की तकनीक और तरक्की के बाद भी कैंसर से होने वाली मौतों में कोई कमी देखने को नहीं मिल रही है, लेकिन हाल ही में एक उम्मीद की एक किरण जरूर देखने को मिल रही है. कार-टी सेल थेरपी. इस थैरेपी में बस एक दिक्कत है कि ये बेहद महंगी है. मगर अब इसका भी हल मिल गया है.
क्या स्वदेशी कार-टी सेल थैरेपी से मिलेगी महंगे विदेशी इलाज से राहत
भारत में हो सकने वाले कैंसर के इलाजों की लिस्ट में एक और नाम जुड़ गया है, कार-टी सेल थैरेपी. फोर्टिस मेेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रिंसिपल डॉयरेक्टर ( Principal Director and Chief of BMT, Fortis Memorial Research Institute, Gurugram) डॉ. राहुल भार्गव बताते हैं,
कार- टी सेल थैरेपी एक तरह की इम्युनोथैरेपी है. इसमें हमारे ही शरीर की कोशिकाओं को कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने के लिए प्रोग्राम किया जाता है.
PIB की एक रिपोर्ट के मुताबिक विदेशों में कार टी-सेल थैरेपी का खर्चा करीब 3-4 करोड़ पड़ता है. अमेरिका में ये खर्च 5-10 लाख डॉलर है, वहीं इजरायल के शीबा हॉस्पिटल में ये खर्च करीब 3-5 लाख डॉलर पड़ता है. रुपयों में बदलें तो अमेरिका और इजरायल वगैरह में इस इलाज की कीमत करीब 2.5-8 करोड़ तक पहुंच जाती है. जो घटकर भारत में अब करीब 45-50 लाख तक हो गयी है. डॉ राहुल ये भी बताते हैं कि फिलहाल ट्रीटमेंट से जुड़ी मशीनों वगैरह के लिए हम दूसरे देशों में निर्भर हैं. लेकिन उम्मीद है कि आगे जब हमारे देश में टेक्नोलॉजी और भी डेवलप हो जाएगी, तब ये थैरेपी 20-25 लाख में भी हमें मिल सकेगी.
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कुछ दिनों पहले ही हमारे देश में कार-टी सेल थैरेपी से इलाज शुरू हुआ है. हाल ही में दिल्ली के गायनेकोलाजिस्ट डॉ वी. के. गुप्ता इस थैरेपी से इलाज कराने वाले चुनिंदा शुरुआती लोगों में से एक बनें. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक इलाज के लिए 42 लाख रुपए लगे, हालांकि ये रकम भी कोई कम नहीं है. लेकिन विदेशों के करीब 3-4 गुना तक महंगे इलाज के मुकाबले थोड़ी ही सही मगर राहत मिलती जरूर नजर आ रही है.
बीते अक्टूबर को रिसर्च करने वाली कंपनी ImunnoACT को Central Drugs Standard Control Organisation (CDSCO) इस थैरेपी से इलाज को मंजूरी दी थी. जिसके बाद से nexCar19 देश के 30 से भी ज्यादा हॉस्पिटल और 10 शहरों में मौजूद है. ImunnoACT, टाटा मेमोरियल हास्पिटल और आई. आई. टी. बॉम्बे के साझा प्रयास से इलाज कर रहा है. लेकिन एक सवाल ये भी है कि भारत में तो वैसे भी कई दूसरे देशों के मुकाबले बहुत से मामलों में इलाज और दवाएं सस्ती हैं. तो क्या ये भारतीय कार-टी सेल थैरेपी भी ऐसी ही है, समझते हैं.

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क्या ये सस्ता इलाज कारगर भी है?लिंफोमा या ल्यूकीमिया जैसे ब्लड कैंसर में जब कीमोथेरेपी और बोन मैरो ट्रांसप्लांट जैसे शुरुआती इलाज जब बेअसर हो जाते हैं. तब उन मामलों में कार-टी सेल थैरेपी एक बड़े विकल्प के तौर पर सामने आती है. ये काफी कारगर साबित हो सकती है. दरअसल कार-टी सेल एक तरह की इम्युनोथैरेपी है. इसमें हमारे ही शरीर की कुछ खास तरह की कोशिकाएं, जिन्हें टी-सेल्स कहते हैं. इन टी-सेल्स (T-cell) कोशिकाओं का काम शरीर के भीतर के परजीवियों को मारने का होता है. चूंकि कैंसर की कोशिकाएं हमारे ही शरीर की कोशिकाएं होती हैं न कि कोई परजीवी कोशिकाएं. इसलिए टी-सेल्स कैंसर सेल्स और हेल्दी सेल्स में भेद नहीं कर पाती है. यहीं पिक्चर में आती है, जेनेटिक इंजिनियरिंग. जिसके जरिए आम टी-सेल्स को कैंसर खत्म करने वाली शक्तिमान कार-टी सेल्स में बदला जाता है.
फिर उन्हें लैब में ग्रो किया जाता है और शरीर में डाला(ट्रांसप्लांट) जाता है. आम टी-सेल्स के इतर कार-टी सेल्स कैंसर कोशिकाओं को पहचान कर खत्म कर सकती हैं. जिससे कारगर इलाज हो पाता है. मतलब इसमें किसी कैमिकल या दवा से नहीं बल्कि हमारे ही शरीर की कोशिकाओं से इलाज किया जाता है. शायद इसीलिए थैरेपी डेवलपमेंट के से शुरुआती दिनों से जुड़ी मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर न्यूयॉर्क(Memorial Sloan Kettering Cancer Center New York) की डॉ रेनियर जे. ब्रेंटजेंस (Renier J. Brentjens) इसे जीती जागती दवा या ‘लिविंग ड्रग कहती हैं.’
इस थैरेपी के डेवलपमेंट से सेल थैरेपी की फील्ड में इंवेस्टमेंट(investment) और एडवांसमेंट (advancement) की भी उम्मीद है.











