जब हम छोटे थे. तो अखबारों के सेकंड लास्ट पेज पढ़ा करते थे. इसकी वजह होती थी क्रिकेट की दीवानगी. पर इसी बहाने हम बाकी खेलों की खबरें भी पढ़ते थे. उन दिनों भारतीय बॉक्सिंग में विजेंद्र सिंह, मैरी कॉम का नाम नहीं हुआ करता था. एक ही नाम चलता था, वो था डिंको सिंह का. अखबारों में उनकी खबरें पढने को मिलती थी. बॉक्सिंग में देश को कई कामयाबी दिलाई डिंको ने. 1998 में बैंकॉक में हुए एशियाई खेलों में भारत के लिए डिंको सिंह ने गोल्ड मैडल जीता था. ये गोल्ड मैडल एशियाई खेलों में भारत को 16 साल बाद हासिल हुआ था. डिंको को देश के पहले बॉक्सिंग सुपर स्टार का दर्जा दिया गया है. आज यही बॉक्सर गुमनामी के अंधेरे में लीवर और बाइल डक्ट के कैंसर से जंग लड़ रहा है.
बैंकॉक में गोल्ड जीतने के बाद उन्हें अर्जुन अवार्ड, पद्मश्री जैसे अवार्ड से नवाजा गया. साथ ही मणिपुर सरकार ने उन्हें तीन कमरों का एक फ्लैट भी दिया. आज इसी घर को 30 लाख रुपए में बेचकर डिंको अपना इलाज करा रहे हैं. इस समय वो दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ लीवर एंड बाइलरी साइंसेज में एडमिट हैं. खेल मंत्रालय और साई ने अभी तक उनकी कोई मदद नहीं की है. डिंको साई इंफाल में सहायक निदेशक के तौर पर काम कर रहे हैं. और अगस्त से ही बीमार हैं. नवंबर में इंफाल से उन्हें दिल्ली के एम्स के लिए रेफर कर दिया गया. दिल्ली आकर वे लॉज में किराए पर रहकर इलाज के लिए बहुत दिनों तक भटकते रहे. पर एम्स में उन्हें एडमिट नहीं किया गया. नोटबंदी की मार ऐसी पड़ी कि उन्हें वापस इंफाल जाना पड़ा. कुछ दिनों पहले उनकी हालत ज्यादा खराब हो गई, तो दोनों बच्चों को छोड़कर उन्हें पत्नी बबाय के साथ फिर से दिल्ली आना पड़ा. मणिपुर के एक डॉक्टर ने एम्स के धक्के खाने की बजाय उन्हें लीवर इंस्टिट्यूट जाने की सलाह दी. वहां उनकी स्थिति देखकर उन्हें तुरंत दाखिल कर लिया गया. उनकी पत्नी के मुताबिक डॉक्टर ने 'कोलेंजिया कारसीनोमा' नाम का दूसरी या तीसरी स्टेज का कैंसर बताया. इसका ऑपरेशन बहुत कठिन है. और अवसर भी फिफ्टी-फिफ्टी है. बबाय बताती है कि ये बात उन्होंने डिंको को नहीं बताई. दो दिनों पहले उनका ग्यारह घंटो का लंबा ऑपरेशन हुआ है. ऑपरेशन के बाद डिंको की छह राउंड की कीमोथेरेपी होगी. उनकी पत्नी का कहना है कि वो साई से इतना चाहती हैं कि उनकी छुट्टियां खत्म हो गई हैं और इलाज लंबा चलेगा. बस उन्हें इस दौरान वेतन मिलता रहे. डिंको का ऑपरेशन करने वाली टीम के हेड डॉक्टर वीरेंद्र ने बताया,
"यह खतरनाक कैंसर है. बाइल की नली में ट्यूमर के केसेज नॉर्थ-ईस्ट राज्यों के लोगों में ज्यादातर देखे जाते हैं. ऑपरेशन बहुत ही मुश्किल था. और पोरटल वेन कटना पड़ा. उनका 70 परसेंटेज लीवर काट कर हटा दिया गया है."
ये स्टोरी आदित्य प्रकाश ने की है
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