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जम्मू कश्मीर में इन वजहों से खत्म हुआ BJP-PDP गठबंधन

एक बार फिर राज्य में गवर्नर रूल लगने वाला है.

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3 साल भाजपा ने पीडीपी के साथ मिलकर सरकार चलाई. अब दोस्ती टूट गई है.
जम्मू कश्मीर में भाजपा और पीडीपी का गठबंधन आखिर टूट ही गया. कुछ दिनों से इस बात की चर्चा थी कि भाजपा सरकार से अलग होने के बारे में फैसला ले सकती है. 16 जून की  दोपहर आखिर भाजपा की तरफ से पार्टी महासचिव राम माधव ने इस फैसले का ऐलान कर दिया. इस बाबत एक चिट्ठी भाजपा की तरफ से जम्मू कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोहरा को भेज दी गई है. इसके कुछ देर बाद राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी अपना इस्तीफा गवर्नर को सौंप दिया.
नवंबर-दिसंबर 2014 में जम्मू कश्मीर में चुनाव हुए थे. अमित शाह तब मिशन 44 की बात करते थे. माने जम्मू कश्मीर में भाजपा की अपने दम पर सरकार. अनुच्छेद 370, देश की अखंडता और जम्मू कश्मीर को लेकर भाजपा के पारंपरिक स्टैंड के दम पर खूब प्रचार किया गया और इसका फायदा जम्मू डिविज़न में दिखा. भाजपा यहां 25 सीटें जीती. लेकिन कश्मीर और लद्दाख में भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली थी.
जम्मू कश्मीर की गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद प्रधानमंत्री मोदी के गले लगते मुफ्ती मुहम्मद सईद. फोटोः एपी)
जम्मू कश्मीर की गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद प्रधानमंत्री मोदी के गले लगते मुफ्ती मुहम्मद सईद. फोटोः (एपी)

दूसरी तरफ घाटी में भाजपा के जीत जाने का डर दिखाकर पीडीपी 28 सीटें जीत गई. नेशनल कॉन्फ्रेंस को 15 सीटें मिलीं और कांग्रेस को 12. तकनीकी रूप से ये तीनों पार्टियां मिलकर कश्मीर में सरकार बना सकती थीं लेकिन इसका मतलब ये होता कि जम्मू संभाग के लोगों को साथ लिए बिना चलती. इसीलिए कश्मीर मसले पर धुर विरोधी राय होने के बावजूद पीडीपी और भाजपा साथ आए. राम माधव ने लगातार जम्मू कश्मीर के दौरे किए और एजेंडा फॉर अलायंस तैयार किया गया जिसके तहत मार्च 2015 में भाजपा-पीडीपी की सरकार बनी और मुफ्ती मुहम्मद सईद मुख्यमंत्री बने. उप-मुख्यमंत्री का पद मिला भाजपा को.
लेकिन जनवरी 2016 में मुफ्ती मुहम्मद सईद का निधन हो गया और राज्य में दोबारा गवर्नर रूल लग गया जो 88 दिनों तक चला. इस दौरान मुफ्ती मुहम्मद सईद की वारिस और बेटी महबूबा मुफ्ती लगातार भाजपा के संपर्क में रहीं और दोबारा सरकार बनाने और उसमें भागीदारी और ज़िम्मेदारी तय करने बैठकें होती रहीं. अप्रैल में महबूबा मुफ्ती ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.
महबूबा मुफ्ती ने भाजपा के साथ सरकार चलाने से पहले खूब विचार-विमर्श किया था. क्योंकि भाजपा-पीडीपी की विचारधारा में बहुत अंतर है. फोटोःपीटीआई)
महबूबा मुफ्ती ने भाजपा के साथ सरकार चलाने से पहले खूब विचार-विमर्श किया था. क्योंकि भाजपा-पीडीपी की विचारधारा में बहुत अंतर है. (फोटोःपीटीआई)

2016 ही वो साल था जब केंद्र ने जम्मू कश्मीर में उग्रवाद के खिलाफ अपने अभियान तेज़ किए और जुलाई में (माने महबूबा के मुख्यमंत्री बनने के तीसरे महीने में) बुरहानी वानी मारा गया. इसके बाद घाटी में माहौल नाटकीय ढंग से बदला और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए जिनमें कई लोग मारे गए. सेना उग्रवादियों को मार तो रही थी लेकिन उनकी भर्ती पर अंकुश नहीं लग पा रहा था. अपनों को खोते देख कश्मीरियों में सरकार और खासकर पीडीपी के लिए काफी गुस्सा जमा होने लगा जिसे महबूबा इस्तीफा देने तक मैनेज ही करती रहीं. पीडीपी नाराज़गी को कम करने के लिए जो कहती, जो करती, वो भाजपा की पार्टी लाइन पर फिट नहीं बैठ पाता.
2018 के जनवरी में कठुआ में वीभत्स गैंगरेप हुआ जिसके बाद भाजपा के दो मंत्रियों ने आरोपियों के समर्थन में रैली निकाली. इसके चलते भी घाटी में पीडीपी को काफी गुस्सा झेलना पड़ा. खबरें आईं कि पीडीपी इस मुद्दे पर सरकार से अलग भी हो सकती है. तब भाजपा ने अपने दोनों मंत्रियों के इस्तीफे करवा दिए. लेकिन भाजपा और पीडीपी दोनों में अंदरखाने खटपट चलती रही.
बुरहान वनी के मारे जाने के बाद घाटी में बिगड़े हालात का सबसे बड़ा खामियाज़ा पीडीपी ने भुगता है. फोटोःरॉयटर्स
बुरहान वनी के मारे जाने के बाद घाटी में बिगड़े हालात का सबसे बड़ा खामियाज़ा पीडीपी ने भुगता है. फोटोःरॉयटर्स

पत्रकार अशरफ वनी बताते हैं कि महबूबा लगातार भाजपा पर दबाव बना रही थीं कि केंद्र कश्मीर में एकतरफा संघर्षविराम का ऐलान हो और केंद्र सरकार पाकिस्तान और अलगाववादियों से कश्मीर मसले पर बात करे. लेकिन भाजपा इन सारे मसलों पर 'पोज़ीशन ऑफ स्ट्रेंथ' से डील करना चाहती है. क्योंकि उसे देश की राजनीति में अपना झंडा बुलंद रखना है. लोकसभा चुनाव सिर पर हैं और भाजपा 'राष्ट्रीय सुरक्षा' के मुद्दे पर समझौता करती नहीं दिखना चाहती. इससे पीडीपी और भाजपा में दूरी बढ़ती रही.
इस साल रमज़ान के दौरान 17 सालों में पहली बार घाटी में एकतरफा संघर्षविराम का ऐलान हुआ. लेकिन इस दौरान लगातार उग्रवादियों के हमले हुए, फौजी औरंगज़ेब को अगवा करके मारा गया और राइज़िंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी की दिन दहाड़े हत्या भी हुई. इससे संघर्षविराम के विरोधियों को उसे असफल बताने का मौका मिल गया. महबूबा मुफ्ती चाहती थीं कि संघर्षविराम चलता रहे लेकिन केंद्र ने उसे रमज़ान के बाद खत्म कर दिया. तभी से जम्मू कश्मीर के अलग-अलग मुद्दों पर केंद्र सरकार और भाजपा लगातार बैठकें कर रहे थे. अंदरखाने इस बात का ज़िक्र लगातार हो रहा था कि भाजपा काडर में ये राय बन रही थी कि कश्मीर से जुड़े मसलों में महबूबा मुफ्ती को मिला फ्री-हैंड जम्मू में भाजपा के कोर वोटर को नाराज़ कर रहा था.
पीडीपी से गठबंधन के अंत का ऐलान करते राम माधव.
पीडीपी से गठबंधन के अंत का ऐलान करते राम माधव.

19 जून, 2018 को दिल्ली में 15 भाजपा नेताओं की अमित शाह के साथ एक मीटिंग हुई जिसमें जम्मू कश्मीर से चार महासचिव भी शामिल हुए थे. इस मीटिंग से बाहर आए जम्मू कश्मीर के उप-मुख्यमंत्री कविंदर गुप्ता ने मीडिया से यही कहा कि भाजपा और पीडीपी की विचारधारा में अंतर है लेकिन गठबंधन अभी खत्म नहीं किया जाएगा.
लेकिन इस बयान के दो घंटे के अंदर भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव देशभर के न्यूज़ चैनलों पर लाइव नज़र आने लगे और उन्होंने भाजपा के सरकार से अलग होने का ऐलान कर दिया. राम माधव के साथ कविंदर गुप्ता भी थे और पीएमओ में राज्यमंत्री जितेंदर सिंह भी.
राम माधव ने गठबंधन टूट के ये कारण गिनाए -
1. गृह मंत्रालय की तरफ से जम्मू कश्मीर सरकार को सहयोग मिला. लेकिन घाटी में सुरक्षा का माहौल बिगड़ा. कट्टरपंथ बढ़ा. घाटी में हालात सुधारने में सरकार का पीडीपी धड़ा विफल रहा.
2. शुजात बुखारी की हत्या ने ये संदेश दिया कि राज्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी खतरे में है.
राम माधव का कहना था कि केंद्र से सहयोग के बावजूद महबूबा घाटी में शांति बहाल नहीं कर पाईं.
राम माधव का कहना था कि केंद्र से सहयोग के बावजूद महबूबा घाटी में शांति बहाल नहीं कर पाईं.
3. लद्दाख और जम्मू संभागों में ये राय बन रही थी कि विकास के मामले में उनसे भेदभाव हो रहा है.
4. रमज़ान के महीने में किए गए एकतरफा संघर्षविराम को अपेक्षित सहयोग नहीं मिला. न उग्रवादियों की तरफ से, न अलगाववादियों की तरफ से.
राम माधव की प्रेस कॉन्फ्रेंस के थोड़ी देर बाद महबूबा मुफ्ती ने अपना इस्तीफा गवर्नर को सौंप दिया. अमूमन गठबंधन टूटने के बाद सियासी जोड़तोड़ शुरू हो जाती है. राम माधव साफ कर चुके थे कि भाजपा गवर्नर रूल के पक्ष में है. प्रेस कॉन्फ्रेंस के खत्म होते-होते गुलाम नबी आज़ाद ने बयान दे दिया कांग्रेस पीडीपी के साथ सरकार बनाने में रुचि नहीं रखती है. यही बात उमर अबदुल्ला ने गवर्नर से मिलकर कही. रात आठ बजे एनएन वोहरा ने राष्ट्रपति को एक फैक्स भेजकर राज्य की स्थिति के बारे में बताया और जम्मू कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद 92 के तहत गवर्नर रूल की अनुशंसा कर दी. राष्ट्रपति इसपर केंद्रिय कैबिनेट की सलाह के बाद फैसला करेंगे. अब ये तय है कि जम्मू कश्मीर में आने वाले कुछ समय तक गवर्नर रूल रहेगा.
उमर अबदुल्ला गवर्नर से कह चुके हैं कि वो सरकार नहीं बनाना चाहते. राज्य में नए सिरे से चुनाव हों.
उमर अबदुल्ला गवर्नर से कह चुके हैं कि वो सरकार नहीं बनाना चाहते. राज्य में नए सिरे से चुनाव हों.

फायदा-नुकसान किसका, कितना?
भाजपा ने गठबंधन आगे रहकर तोड़ा. तो अब वो इस बात का प्रचार कर सकती है कि उसने 'देश की सुरक्षा और अखंडता' से समझौता करने के बजाय सत्ता त्याग दी. इसे मिलने वाला पॉलिटिकल माइलेज कितने फायदे में परिवर्तित होगा या नहीं, ये दूसरी बात है. पार्टी हाल ही में लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल का चुनाव हारी है.
असली नुकसान पीडीपी का हुआ है. पीडीपी घाटी में अपने कोर वोटर के बीच पहले से नाराज़गी झेल रही है. कि जिस पार्टी के खिलाफ प्रचार किया, बाद में उसी के साथ सरकार बना ली. उसके बाद घाटी में पीडीपी का जनाधार खिसका ही है. इसका एक सबूत ये है कि अनंतनाग की संसद सीट (जो छोड़कर महबूबा राज्य की मुख्यमंत्री बनीं) पर अभी तक चुनाव नहीं हो पाए हैं क्योंकि लोग चुनाव प्रक्रिया के ही खिलाफ खड़े हो गए हैं.
इस्तीफे के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में महबूबा मुफ्ती.
इस्तीफे के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में महबूबा मुफ्ती.

पीडीपी की थोड़ी लाज बजती अगर वो भाजपा से पहले सरकार से अलग होने का ऐलान कर देती. लेकिन अब वो सत्ता के कूचे से बड़ी बेआबरू होकर चली है. उसके पास से सत्ता गई है और अपने वोटर को देने के लिए उसके पास जवाब है नहीं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण इस्तीफे के बाद हुई महबूबा की प्रेस कॉन्फ्रेंस थी. इसमें महबूबा कश्मीर के अपने कोर वोटर को समझाने के लहज़े में बार-बार यूनिलैटरल सीज़फायर और कश्मीर के 11000 पत्थरबाज़ों के खिलाफ मुकदमे वापस लिए जाने का उल्लेख ही करती रहीं. बाकी सारी बातें वही थीं जो हम पीडीपी की पार्टी लाइन के तौर पर पहले से जानते हैं.
नेशनल कॉन्फ्रेंस घाटी में चुनाव चाहती है. लेकिन वो कब होंगे कोई नहीं जानता. ये 'कब' बड़े काम का है. क्योंकि घाटी में होने वाला चुनाव जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र की नए सिरे से परीक्षा लेगा और नई परिभाषा गढ़ेगा.


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