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क्या है धारा 35 (A), जिसका जिक्र होते ही कश्मीरी भभक उठते हैं

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भारतीय संविधान यानी वो लिखित दस्तावेज, जिससे हमारा पूरा देश चलता है. संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को पारित किया और 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया. बनने में लगे दो साल, 11 महीने और 18 दिन. कुल 114 बैठकें हुईं और फिर 21 भागों में विभाजित 395 अनुच्छेदों और आठ अनुसूचियों के साथ इसे लागू किया गया. इसी संविधान के सहारे आज़ाद भारत की पूरी व्यवस्था चलने लगी लेकिन आजादी के बाद से ही जम्मू-कश्मीर पर विवाद रहा. 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ. कश्मीर रियासत के महाराज हरि सिंह ने कश्मीर के भारत में विलय को मंजूरी दे दी, जिस पर 27 अक्टूबर 1947 को गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन ने दस्तखत कर दिए.

जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने के लिए संविधान में एक धारा लाई गई थी 370. इसके जरिए संसद को अधिकार मिला कि वो रक्षा, विदेश मामले और संचार के बारे में जम्मू-कश्मीर के लिए कानून बना सकती है, जिसे राज्य सरकार की मंजूरी लेनी होती है. ये प्रावधान अब भी लागू है लेकिन जम्मू-कश्मीर से जुड़ा एक और प्रावधान है, जो लागू है और सबसे विवादित भी है. ये प्रावधान है धारा 35 A.

Jammu-kashmir
शेख अब्दुल्ला और जवाहर लाल नेहरू के बीच 1952 में दिल्ली समझौता हुआ था.

जम्मू-कश्मीर के भारत में शामिल होने के बाद शेख अब्दुल्ला वहां के अंतरिम प्रधानमंत्री बने. 1952 में जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला और भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के बीच एक समझौता हुआ, जिसे दिल्ली समझौता कहा जाता है. प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने दिल्ली समझौते पर संसद में एक भाषण दिया था, जिसके प्रमुख अंश हैं-

“नागरिकता का सवाल उठना जायज़ है. महाराजा हरि सिंह के वक्त में लंबे समय तक नियम था कि कोई भी बाहरी आदमी कश्मीर में न तो ज़मीन खरीद सकता है और न ही वहां का नागरिक बन सकता है. पुराने दिनों में महाराजा को इस बात का डर था कि बहुत सारे अंग्रेज वहां आएंगे और जमीन खरीदकर वहां बस जाएंगे, क्योंकि वहां का मौसम उनके अनुकूल होता था. इसलिए अंग्रेजी शासनकाल में भी महाराजा ने ये नियम बना रखा था कि कश्मीर में कोई भी ज़मीन नहीं खरीद सकता है, जो अब भी जारी है. इसलिए अब भी जम्मू-कश्मीर में जो सरकार है, वो भी इस बात से डरी हुई है कि बाहरी लोगों के आ जाने से जम्मू-कश्मीर के लोगों के पास पैसे के अलावा कुछ नहीं बचेगा. ये डर मुझे भी है. इसलिए हम इस बात पर सहमत हैं कि राज्य की विधानसभा को इस बात का अधिकार होगा कि वो स्थायी नागरिकता, ज़मीन-जायदाद खरीदने का मुद्दा और नौकरियों के मुद्दे को अपने हिसाब से परिभाषित कर सके.”

इस दिल्ली समझौते के तहत संविधान की धारा 370 (1) (D) के तहत भारत के राष्ट्रपति को जम्मू और कश्मीर के ‘राज्य विषयों’ के लाभ के लिए संविधान में “अपवाद और संशोधन” करने की ताकत देती है. इसका इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 14 मई 1954 को एक आदेश के जरिए धारा 35 A को लागू किया. ये धारा जम्मू-कश्मीर की सरकार और वहां की विधानसभा को जम्मू-कश्मीर का स्थायी नागरिक तय करने का अधिकार देती है. इसी धारा के आधार पर 1956 में जम्मू कश्मीर ने राज्य में स्थायी नागरिकता की परिभाषा तय कर दी, जो अब सबसे बड़ी विवाद की जड़ है.

Jammu-kashmir accedes
कश्मीर के भारत में शामिल होने के बाद अखबार में छपी खबर का अंश.

धारा 35 A के मुताबिक जम्मू कश्मीर का नागरिक उसे माना जाएगा, जो 14 मई 1954 से पहले राज्य का नागरिक रहा हो. वो 14 मई 1954 से पहले 10 साल तक जम्मू-कश्मीर में रहा हो और उसके पास जम्मू-कश्मीर में संपत्ति हो. इस नियम के तहत दूसरे राज्यों में भारतीय नागरिकों को जो मूल अधिकार मिल रहे हैं, उनके उल्लंघन को लेकर याचिका भी दाखिल नहीं की जा सकती है. यानी यह धारा दूसरे राज्यों के जैसे नागरिक अधिकार हासिल करने पर पूरी तरह से रोक देती है.

लड़कियां शादी करेंगी तो कश्मीरी नहीं रह जाएंगी

kashmiri girls
(फोटो : Kashmir News)

जम्मू-कश्मीर की नागरिकता हासिल की हुई कोई लड़की अगर किसी गैर कश्मीरी से शादी करती है तो एक कश्मीरी को मिलने वाले सारे अधिकार वो खो देती है. जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने 2002 में कहा था कि अगर कोई महिला किसी गैर कश्मीरी से शादी करती है तो वो अपने कश्मीरी अधिकार रख सकती है लेकिन उसके बच्चे को कोई अधिकार नहीं मिलेगा.

इस नए नियम की वजह से उन लोगों को खास तौर पर दिक्कत होनी शुरू हुई जो देश विभाजन के बाद पाकिस्तान से हिंदुस्तान आए थे. पाकिस्तान से आए जो लोग जम्मू-कश्मीर पहुंचे, उन्हें धारा 35 A नागरिकता नहीं देती है, क्योंकि जब ये धारा लागू की गई, उस वक्त तक उन्हें आए हुए महज सात साल ही हो पाए थे. ऐसे में हजारों लोगों को नागरिकता नहीं मिल पाई. न तो वो वोटर रहे और न ही उन्हें किसी तरह के अधिकार दिए गए. वहीं जो लोग जम्मू-कश्मीर के अलावा देश के किसी और हिस्से में गए, उन्हें आम हिंदुस्तानी की तरह सारे अधिकार मिल गए. ऐसे में जो लोग पाकिस्तान से हिंदुस्तान बेहतरी की आस में आए थे, वो और उनकी पीढ़ियां 63 साल के बाद भी शरणार्थियों की तरह रहने को मजबूर हैं. ऐसे में ये लोग न तो जम्मू-कश्मीर में अपने लिए ज]मीन-जायदाद खरीद सकते हैं, न ही राज्य के लिए होने वाले चुनाव में वोट दे सकते हैं, राज्य में होने वाला चुनाव भी खुद नहीं लड़ सकते हैं. इसके अलावा वो सरकारी नौकरी भी हासिल नहीं कर सकते हैं.

हालांकि ये लोग भारत के नागरिक हैं, लोकसभा के लिए वोट दे सकते हैं और देश के किसी दूसरे राज्य में आने-जाने के लिए स्वतंत्र हैं. ये लोग राज्य के चुनाव में शामिल नहीं हो सकते लेकिन ये लोग राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक हो सकते हैं. 

पंजाब से भी लाए गए थे लोग

Kashmiri dispute
कश्मीर विवाद को शांत करने के लिए देश-विदेश में भी आवाज़ उठती रहती है.

एक आंकड़े के मुताबिक 1947 में 5764 परिवार पश्चिमी पाकिस्तान से आकर जम्मू में बसे थे. इन परिवारों में लगभग 80 प्रतिशत दलित थे, जिनकी चौथी पीढ़ी यहां रह रही है. इसके अलावा गोरखा समुदाय के भी लोग हैं, जिन्हें राज्य के नागरिक होने का कोई अधिकार हासिल नहीं है. वहीं 1957 में जम्मू-कश्मीर सरकार की कैबिनेट ने एक फैसला लिया था. इसके तहत वाल्मीकि समुदाय के 200 परिवारों को विशेष सफाई कर्मचारी के तौर पर बुलाया गया था. पिछले 60 साल से ये लोग जम्मू में सफाई कर्मचारी के तौर पर काम कर रहे हैं, जिन्हें जम्मू-कश्मीर के निवासी का दर्जा हासिल नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट में दी गई है चुनौती

save 35 A
जम्मू-कश्मीर की राजनैतिक पार्टियों के अलावा वहां के नागरिक भी 35 A को कायम रखना चाहते हैं.

धारा 35 A को चार अलग-अलग याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. इसके पीछे ये तर्क दिया गया है कि इस धारा को राष्ट्रपति के आदेश से लागू किया गया था, इसलिए इसकी वैधानिकता संदिग्ध है. अलग-अलग याचिकाओं में कहा गया है कि संविधान में प्रावधान बनाने, हटाने या जोड़ने का अधिकार संसद को है और इसके लिए भी संविधान संशोधन करना पड़ता है. ऐसे में इस धारा की वैधानिकता नहीं है और सुप्रीम कोर्ट को इस धारा को हटा देना चाहिए. कोर्ट में आरएसएस से जुड़े ‘वी द सिटीजन्स’ नामक एनजीओ के अलावा चारू वली खन्ना ने इस धारा के खिलाफ अपील दाखिल की है. इसके अलावा इससे जुड़ी दो अन्य याचिकाएं कोर्ट के पास हैं. इस मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पांच जजों की एक बेंच बनाई है, जिसके सामने केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों ने अपने-अपने पक्ष रख दिए हैं.

केंद्र सरकार ने कहा है कि मामला संवैधानिक तौर पर पेचीदा है. वहीं राज्य सरकार ने इस व्यवस्था को बनाए रखने का आग्रह किया है. इसके लिए सरकार ने तर्क दिए हैं कि यहां पर पिछले 60 साल से अधिक वक्त से ये व्यवस्था लागू है और ये व्यवस्था बेहतर तरीके से काम कर रही है.

जानकारों के भी हैं अपने-अपने तर्क

संविधान के जानकारों के मुताबिक संविधान में 35 (a) का जिक्र है, जो जम्मू-कश्मीर से जुड़ा हुआ नहीं है. राष्ट्रपति ने जम्मू-कश्मीर से जुड़ा जो आदेश दिया है, वो आर्टिकल 35 (A) है. वहीं संविधान में जब-जब संशोधन किया जाता है, उसका जिक्र संविधान की किताब में किया जाता है. अब तक के हुए संशोधनों में आर्टिकल 35 (A) का जिक्र नहीं है. हालांकि इस धारा को संविधान के परिशिष्ट (अपेंडिक्स) में शामिल किया गया है.

 धारा 35 A को समझने के लिए ये वीडियो देख सकते हैं


वीडियो में देखें ताजमहल से जुड़े सुबूत

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