बेंगलुरु, जो कभी 'हजारों झीलों' का शहर था, आज पानी की भारी कमी का सामना कर रहा है. बेंगलुरु के विकास में झीलों और टैंकों को अहम बताया जाता है. ये झीलें ही रही हैं, जिनसे बेंगलुरु की पानी की मांग पूरी करने में मदद मिलती रही है. एक ब्रिटिश कैप्टन ने बेंगलुरु को 'हजारों झीलों की भूमि' बताया था. इस अधिकारी को गवर्नर जनरल कॉर्नवालिस ने मद्रास और सेरिंगपट्टम (श्रीरंगपट्टनम) के बीच एक वैकल्पिक मार्ग खोजने का काम सौंपा था. यात्रा के दौरान वो बेंगलुरु पहुंचे थे.
बूंद-बूंद बचा रहा बेंगलुरु, कभी प्यास बुझाने के लिए इस शहर में थीं 'हजार' झीलें
आज बेंगलुरु पानी की भारी कमी से जूझ रहा है. कर्नाटक का ये शहर कभी 'हजार झीलों' से पोषित होता था. फिर ऐसा क्या हुआ कि अब हालात पानी की इतनी किल्लत तक पहुंच गए हैं.

बेंगलुरु की झीलें सजावटी नहीं थीं, उनका एक मकसद था. लेकिन कर्नाटक के शहर को झीलों की जरूरत क्यों पड़ी? इसका जवाब बेंगलुरु के भूगोल और भौगोलिक स्थिति में है.
बेंगलुरु समुद्र तल से लगभग 900 मीटर (3,000 फीट) की ऊंचाई पर स्थित है और इसके नजदीक कोई बड़ी नदी नहीं बहती है. बेंगलुरु की चार छोटी नदियां - हेब्बल, वृषभावती, कोरमंगला और चल्लाघट्टा - और उनकी धाराएं जो बाहर की ओर बहती हैं, शहर और आसपास के शहरों की पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं थीं.
ऐतिहासिक रूप से, कम वर्षा और इसके इलाके की ढलानों ने इस क्षेत्र पर शासन करने वाले राजाओं और साम्राज्यों को यहां झीलें और मीठे पानी के टैंक बनाने के लिए प्रेरित किया.
बेंगलुरु की विशाल झीलों का श्रेय जिस व्यक्ति को दिया जाता है, वह 16वीं शताब्दी में शहर के संस्थापक केम्पे गौड़ा थे. विजयनगर के गवर्नर केम्पे गौड़ा ने बेंगलुरु और आसपास के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट शुरू किए थे. गौड़ा ने अपने 46 साल के शासनकाल में टैंकों और सिंचाई कुओं के नेटवर्क की नींव रखी.
केम्पे गौड़ा ने झीलों को आपस में जोड़ा, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि पानी की एक भी बूंद बर्बाद न हो. ऐसी व्यवस्था की गई कि अधिक ऊंचाई पर स्थित झील में इकट्ठा हुआ बारिश का पानी नीचे स्थित झील में पहुंचे. एक-दूसरे से जुड़ी हुई झीलों में बारिश का पानी इकट्ठा होता और उनका इस्तेमाल किया जाता. इस तरह झीलें बेंगलुरु की जीवन रेखा बन गईं.
हालांकि, 'हजार झीलों' में से ज्यादातर झीलें आज के बेंगलुरु में कहीं नहीं दिखती हैं. डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, बेंगलुरु के 'हजार झीलों' में से अब लगभग 400 झीलें हैं. हालांकि, बायोम इंटरनेशनल की 2016 की स्टडी में कहा गया है कि झीलों की संख्या सिर्फ 200 है. ब्रुहत बेंगलुरु महानगर पालिका (BBMP) की झील विभाग की वेबसाइट के अनुसार बेंगलुरु में सिर्फ 17 'अच्छी झीलें' हैं.
बेंगलुरु के तेजी से शहरीकरण और तेजी से बढ़ती आबादी के साथ झीलों का अनियंत्रित अतिक्रमण और प्रदूषण बढ़ता गया. बिना प्लानिंग के और अवैज्ञानिक तरीकों से बनीं मानव बस्तियों ने बेंगलुरु के लिए अहम इन झीलों को नुकसान पहुंचाया. एक रिटायर्ड नौकरशाह, वी बालासुब्रमण्यम ने अपने 2013 के पेपर ‘झीलों की मौत और बेंगलुरु का भविष्य’ में निष्कर्ष निकाला था कि बेंगलुरु के टैंक और झीलों में 'सीवेज अपशिष्ट जल' जमा होता है.
सच तो ये है कि बेंगलुरु में पानी की स्थिति बेहतर होती, अगर शहर ने अपनी 'हजार झीलों' की उपेक्षा न की होती.
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