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मोदी का मंसूबा टूट रहा है, बैंक खुद ब्लैक मनी को वाइट कर रहे हैं

अब तो खुलासा होना भी शुरू हो गया है. ये गोरखधंधा न जाने कब से चल रहा था.

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banks are helping to convert black money in whiter after 500, 1000 note ban

पूरा देश नए नोटों के लिए प्रतिबद्ध है, इसलिए कतारबद्ध है. खबरें बता रही हैं कि बैंकवालों को खुद अपने नोट बदलवाने का समय नहीं मिल पा रहा है. लोग उन्हें सपोर्ट नहीं कर रहे हैं. लग रहा है बैंक कर्मचारियों की हालत बहुत खराब है. लेकिन, एक की हालत सब पर लागू नहीं कर सकते. लॉजिक में इसे लॉजिकल फैलसी कहते हैं.

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तो हर बैंक कर्मचारी की हालत एक जैसी नहीं है. लाइन में लगे लोगों को उम्मीद है कि नोटबंदी से काला धन खत्म हो जाएगा, लेकिन चोट्टों ने अपने काले धन को ठिकाने लगाने और उसे सफ़ेद करने के ढेर सारे तरीके खोज लिए हैं. थोड़ा-बहुत काला धन बैंकवालों के पास भी है. वो इसे सरकार को नहीं दे रहे हैं, बल्कि मौका देखते ही सफेद किए ले रहे हैं. हम बात कर रहे हैं पटना के एक बैंक की.

पटना के सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में बैंक कर्मचारी ब्लैक मनी को वाइट करने वाले एक भरे-पूरे रैकेट का हिस्सा हैं. इस मामले को उजागर किया है सिद्धि एंटरप्राइजेज के मालिक मुकेश कुमार हिशारिया ने. इस बैंक के ब्रांच मैनेजर को लिखे पत्र में मुकेश ने कहा कि उन्होंने अपने पास जितने भी पांच सौ और हजार के नोट थे, उन्हें बिड़ला मंदिर शाखा में 10 नवम्बर को जमा कराए थे. इसके बाद उन्होंने कई दिनों तक कोई काम नहीं किया.

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उन्होंने आगे लिखा कि जब फिर से काम शुरू हुआ, तो पांच सौ और हजार के अलावा नए नोट आए. उन्होंने उन्हें भी जमा करा दिया. 16 नवम्बर को ढाई लाख रूपए, 17 नवम्बर को सत्तर हजार रूपए, 18 नवम्बर को पचास हजार रूपए अपने बैंक अकाउंट में जमा किए. इन दिनों में जो भी नोट जमा हुए, वो सौ-सौ के थे. लेकिन, यहां के बैंककर्मी ने सौ की जगह पांच सौ-हजार की स्लिप बनाई. कॉलम में सौ रुपए की जगह पांच सौ और हजार भरकर भरपाई की जाती थी. यानी दूसरे के या खुद के काले पैसों को इन रुपयों की आड़ में बैंक में शामिल किया जा रहा था.

हिशारिया का कहना है ये पूरा मामला मनी लॉन्ड्रिंग ऐक्ट के तहत आता है. जब सौ के नोट जमा करवाए जा रहे हैं, तो उन्हें सौ के कॉलम में न भरकर पांच सौ के कॉलम में क्यों भरा जा रहा है. इससे साफ पता चलता है कि बैंक वाले भी इस गोरखधंधे में शामिल हैं.

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इस मामले में बैंक के कैशियर रमाकांत सिंह का भी नाम आया है. इसकी जानकारी होने पर बैंक के सीनियर अधिकारी पहुंचे. फिलहाल कैशियर को सस्पेंड कर दिया गया है. पुलिस भी पहुंची. पीरबहोर थाना के दरोगा धीरेन्द्र कुमार ने पूछताछ शुरू की तो एक अधिकारी ने फ़ोन पर उनकी बात सीनियर पुलिस ऑफिसर से करवाई.

धीरेन्द्र कुमार से उनका बैच नंबर और नाम पूछा गया. यहां के मैनेजर सुजीत कुमार बार-बार अपने बयान बदल रहे हैं. अभी जांच चल रही है, लेकिन अब तक पता नहीं कितना पैसा किनारे लगाया जा चुका है. इतने बड़े स्तर पर ये सब हो रहा था, तो जाहिर है बड़े मगरमच्छ भी इसमें शामिल होंगे.


ये स्टोरी निशांत ने की है.


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