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जनकपुर से शुरू की कैंपेनिंग, रामनवमी पर नेपाल के PM बनेंगे, बालेन शाह की पॉलिटिक्स क्या है?

रामायण के प्रतीकों के बार-बार इस्तेमाल ने सोशल मीडिया पर हलचल मचा दी है. कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या Balendra Shah भी इस हिंदु बहुल देश में ‘धर्म आधारित राजनीति’ करने जा रहे हैं?

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बालेन शाह रामनवमी के दिन प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं. (फाइल फोटो: इंडिया टुडे)

नेपाल के हालिया चुनाव में शानदार जीत दर्ज करने वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के नेता बालेन शाह रामनवमी के दिन प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं. इससे पहले नेपाल इलेक्शन के लिए उन्होंने अपना कैंपेन भी सीताजी की जन्मभूमि जनकपुर से शुरू किया था. नेपाल के इस लोकप्रिय नेता के ऐसे रामायण के प्रतीकों के बार-बार इस्तेमाल ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है. लोग पूछ रहे हैं कि क्या बालेन शाह भी हिंदु बहुल नेपाल में ‘धर्म आधारित राजनीति’ को बढ़ावा दे रहे हैं?

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बता दें कि इस साल रामनवमी यानी भगवान राम का जन्मदिन 27 मार्च को पड़ रहा है. इसी दिन बालेन शाह नेपाल के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे. शाह नेपाल के दक्षिणी तराई क्षेत्र के रहने वाले हैं और जनकपुर भी इसी इलाके में आता है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के रिटायर्ड प्रोफेसर एस.डी. मुनि नेपाल मामलों के एक्सपर्ट हैं. उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस को बताया,

“ बालेन शाह के इस कदम को हिंदू राजशाही के महिमामंडन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, जिसे नेपाल ने अब खत्म कर दिया है. बल्कि यह देश के हिंदुओं के लिए एक इशारा है. बालेंद्र शाह के समर्थक युवा हैं और राजशाही के विरोधी हैं.”

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हालांकि, नेपाल में कुछ लोगों का कहना है कि यह देश में राजशाही के पक्ष में उठ रही कुछ भावनाओं को शांत करने का एक तरीका हो सकता है, क्योंकि शाह के मतदाताओं में समाज का वह तबका भी शामिल है जो राजशाही को आज भी याद करता है. JNU के प्रोफेसर संजय भारद्वाज भी नेपाल के मामलों पर गहरी नजर रखते हैं. उनका कहना है कि इन सब बातों का मतलब सिर्फ यही है कि बालेन शाह यह साफ कर देना चाहते हैं कि वह हिंदू धर्म से खुद को दूर नहीं कर रहे हैं. जैसाकि उनसे पहले पूर्व प्रधानमंत्रियों ‘प्रचंड’ और के.पी. शर्मा ओली ने किया था. 

उन्होंने कहा,

"बालेन एक ऐसे हिंदू धर्म को बढ़ावा दे रहे हैं जो राजशाही के दिनों में दिखाए जाने वाले हिंदू धर्म से अलग है. जब नेपाल के राजा भगवान विष्णु का अवतार होने का दावा करते थे.”

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प्रोफेसर एसडी मुनि कहते हैं कि नेपाली राजनीति ने एक ऐसी राष्ट्रीय और धार्मिक पहचान गढ़ने की कोशिश की है, जो भारत से अलग है. इसके लिए उसने रामायण को एक खास नेपाली परंपरा का हिस्सा माना है. नेपाल पर नजर रखने वालों का कहना है कि शाह खुद भी धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करने वाले माने जाते हैं.

हिंदू प्रतीकों और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उपयोग

बालेन शाह ने सीधे तौर पर धर्म आधारित राजनीति का ऐलान तो नहीं किया है, लेकिन उनके कई फैसलों को हिंदू राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक गौरव से जोड़कर देखा गया है. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, काठमांडू के मेयर रहते हुए उन्होंने बॉलीवुड फिल्म 'आदिपुरुष' पर प्रतिबंध लगा दिया था. उनका तर्क था कि फिल्म में सीता को 'भारत की बेटी' कहना गलत है, क्योंकि वो नेपाल के जनकपुर में जन्मी थीं.

वहीं, भारत के नए संसद भवन में 'अखंड भारत' भित्तिचित्र के जवाब में उन्होंने अपने ऑफिस में 'ग्रेटर नेपाल' का नक्शा लगाया, जिसमें वर्तमान भारत के कुछ हिस्से नेपाल के क्षेत्र के रूप में दिखाए गए थे. इसे भी कट्टर राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक पहचान की राजनीति के रूप में देखा गया. हालांकि, उन्होंने अपनी धार्मिक मान्यताओं को व्यक्तिगत रखा है और सार्वजनिक रूप से कभी भी धर्म आधारित राज्य का समर्थन नहीं किया है. 

एक्सपर्ट्स का कहना है कि बालेन शाह प्रतीकों का उपयोग नेपाली स्वाभिमान और संस्कृति को दिखाने के लिए करते हैं, लेकिन उन्हें ‘धर्म केंद्रित राजनीति’ करने वाला नेता कहना अभी जल्दबाजी होगी. उनका पूरा ध्यान पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने पर रहा है. 

ये भी पढ़ें: कौन हैं बालेन शाह जो नेपाल में Gen Z की आवाज बन गए हैं?

बालेन शाह की ‘जनरेशन Z’ के बीच अच्छी-खासी पकड़ है. Gen Z के विरोध प्रदर्शनों के छह महीने बाद 5 मार्च को नेपाल में चुनाव हुए. रिजल्ट कई लोगों के लिए चौंकाने वाले थे, क्योंकि RSP ने सीधे चुने जाने वाली 165 सीटों में से 125 सीटें जीतीं. साथ ही आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के जरिए 57 और सीटें जीतीं. इस तरह RSP नेपाल के 275 सीटों वाले हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में दो-तिहाई बहुमत की ओर बढ़ गई.

वीडियो: नेपाल में फिर भड़का Gen-z प्रदर्शन, वजह क्या है?

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