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अरविंद केजरीवाल का आरोप: मोदी जजों के फोन टैप करवा रहे हैं

मामला जजों की नियुक्ति का.

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फोटो - thelallantop
अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट के पचास साल पूरे होने पर हो रहे एक फंक्शन में आरोप लगाया कि केंद्र की मोदी सरकार जजों के फोन टैप करवा रही है. उन्होंने कहा कि दो जजों को बात करते सुना कि फोन पर बात करना मुश्किल हो गया है. वो लोग डर रहे हैं. ये सब गलत है. हालांकि टेलीकॉम मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद ने तुरंत बात का खंडन किया. कहा कि मैं दो साल से मंत्री हूं. मैं कहता हूं कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है. ये बातें निकली हैं जजों की नियुक्ति के मामले को लेकर. पहले कॉलेजियम सिस्टम को लेकर बवाल था ही. सुप्रीम कोर्ट ने जुडिशियल कमीशन बनाने के सरकार के प्रस्ताव को असंवैधानिक बता दिया था. इसके बाद से जजों की नियुक्ति नहीं हो पा रही है. सुप्रीम कोर्ट ने जजों के नाम की लिस्ट सरकार को भेज दी है. पर ये लोग कोई एक्शन नहीं ले रहे हैं. शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार को इसे ईगो इशू नहीं बनाना चाहिए. जजों की नियुक्ति में देरी पूरी जुडिशियरी को तबाह कर देगी. ये सच भी है. देश का कोर्ट सिस्टम कम जजों के चलते लड़खड़ा रहा है.
मई 2016 में कांग्रेस ने भी मोदी सरकार पर जजों और अफसरों के फोन टैप करने का आरोप लगाया था. ये मामला था अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर की खरीद में हुई धांधली का. कांग्रेस के प्रवक्ता आनंद शर्मा ने कहा था कि मोदी सरकार फोन टैप करवाने के लिए क्षमता से बाहर काम कर रही है.
  जजों के फोन टैप करने की बात तो भयावह है. किसी के भी फोन टैप होने की खबर डर पैदा करती है. पर बड़े स्तर पर इन चीजों के होने की बातें हमेशा चलती रहती हैं. अमेरिका पर तो दुनिया के ताकतवर देशों के प्रमुखों के फोन टैप करने के आरोप लगे. माना भी. नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल पर भी ऐसे आरोप लगे हैं.

पर नियुक्ति में देरी की वजह क्या हो सकती है?

हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति ओपन में नहीं होती है. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम सिस्टम बनाया. 90 के दशक में सुप्रीम कोर्ट के दो फैसले आए जिनके मुताबिक चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की अध्यक्षता में एक कमिटी बनेगी जो जजों का नाम सरकार को सुझाएगी. इस कमिटी में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज ही रहेंगे.
पर इन महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति के बारे में कॉलेजियम सिस्टम को लेकर संविधान में कुछ नहीं लिखा है. फिर जजों के द्वारा जजों को चुनने में भाई-भतीजावाद होने के भी आरोप लगते हैं. हम सबने ऐसी कहानियां सुनी हैं जिनमें पूरा परिवार ही जज होता है. ये बात कहीं-कहीं सही भी साबित हो जाती है. सुप्रीम कोर्ट में दलित, अल्पसंख्यक और औरतों की हमेशा से कमी रही है. फिर कभी ये नहीं पता चल पाता कि किस प्रोसेस पर कैंडिडेट चुने गए.
  जब भाजपा की सरकार 2014 में सत्ता में आई तो 24 हाई कोर्ट में 906 जजों की सीटों में 270 खाली थीं. एक-तिहाई. उसके बाद सरकार ने कॉलेजियम सिस्टम को हटाने के लिए नेशनल जुडिशियल अपॉइटमेंट कमीशन का बिल पेश किया. इसके मुताबिक नई कमिटी बननी थी जिसमें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के अलावा सरकार की तरफ से मंत्री और बाहर से कुछ और लोग रहेंगे. ये कुछ और लोगों को चुनने के लिए एक और कमिटी बनाई जाएगी. इस बिल को पार्लियामेंट ने पास कर दिया. संविधान में संशोधन की बात थी. इस वाले के लिए राज्य सरकारों का भी अनुमोदन चाहिए था. 20 राज्यों ने भी पास कर दिया. पर सुप्रीम कोर्ट ने इस बिल को असंवैधानिक घोषित कर दिया. क्योंकि इससे कोर्ट के क्षेत्र में सरकार का दखल बढ़ रहा था. संविधान के मुताबिक कोर्ट, पार्लियामेंट और सरकार एक-दूसरे से कुछ हद तक स्वतंत्र रहेंगे. क्योंकि नहीं रहने पर देश में भ्रष्टाचार बढ़ने की संभावना हो जाती है. कल्पना करिए कि अगर ये सारे लोग मिल के काम करने लगें तो माहौल कैसा हो सकता है. तो सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद जजों की वैकेंसी बढ़ गई. अब 1079 जजों में 478 की पोस्ट खाली थी. क्योंकि रिटायरमेंट तो नहीं रुके थे. उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने फिर जजों की एक लिस्ट भेजी थी सरकार को, जिस पर अभी अमल नहीं हो पाया है. हालांकि नियुक्ति में पारदर्शिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जनता से राय मांगी थी. फिर मेमोरंडम ऑफ प्रोसीजर का प्रस्ताव दिया कि सरकार खुद ही इस मामले में पारदर्शिता को लेकर सुझाव दे. पर उसके बाद से बात बन नहीं पाई है.

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