इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते वक्त यह भी कहा कि लोगों को परेशान किया जा रहा है. (फाइल फोटो)
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है. मंगलवार 19 जनवरी को कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा का दूसरे के साथ संबंध रखना लिव इन रिलेशनशिप नहीं है बल्कि यह अपराध की श्रेणी में आता है. कोर्ट ने कहा है कि अवैध संबंधों को संरक्षण का आदेश देना अपराध को संरक्षण देने जैसा है. कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह भी कहा,
"शादीशुदा महिला दूसरे पुरूष के साथ पति-पत्नी की तरह रहती है तो इसे लिव इन रिलेशनशिप नहीं माना जा सकता. वह जिस पुरूष के साथ रह रही है वह आईपीसी की धारा 494/495 के अंतर्गत अपराधी है."
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा,
"आदेश विधिक अधिकारों को लागू करने या संरक्षण देने के लिए जारी किया जा सकता है लेकिन किसी अपराधी को संरक्षण देने के लिए आदेश नहीं जारी किया जा सकता है. कानून के खिलाफ अदालत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकता."
ये था मामला इसके साथ ही हाथरस के सासनी थाना क्षेत्र की निवासी आशा देवी व अरविन्द की याचिका कोर्ट ने खारिज कर दी. याचिकाकर्ता आशा देवी महेश चंद्र की विवाहिता पत्नी है और दोनों के बीच तलाक नहीं हुआ है. लेकिन वह अपने पति से अलग दूसरे पुरूष के साथ पति-पत्नी की तरह रहती है. याचिका में पति के परिवार वालों से सुरक्षा प्रदान की मांग की गई थी. लेकिन जस्टिस एसपी केशरवानी और जस्टिस डॉ वाईके श्रीवास्तव की खंडपीठ ने आदेश दिया कि यह लिव इन रिलेशनशिप नहीं है वरन दुराचार का अपराध है. कोर्ट ने कहा कि जो कानूनी तौर पर विवाह नहीं कर सकते उनका लिव इन रिलेशनशिप में रहना गलत है. एक से अधिक पति या पत्नी के साथ संबंध रखना भी अपराध है. ऐसे लिव इन रिलेशनशिप को शादीशुदा जीवन नहीं माना जा सकता. ऐसे लोगों को कोर्ट से संरक्षण नही दिया जा सकता है. कोर्ट ने यह भी कहा कि शादीशुदा महिला के साथ धर्म परिवर्तन कर लिव इन रिलेशनशिप मे रहना भी अपराध है. जिसके लिए अवैध संबंध बनाने वाला पुरूष अपराधी है. ऐसे संबंध वैधानिक नहीं माने जा सकते.