अगर पश्चिम एशिया संकट जारी रहता है, तो चालू वित्तीय वर्ष (2026-27) में भारत की उर्वरक सब्सिडी रिकॉर्ड 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच सकती है. यह सब्सिडी इस साल के बजट में आवंटित 1.71 लाख करोड़ रुपये से करीब 75% ज्यादा है. एक सरकारी अधिकारी ने इकोनॉमिक टाइम्स को बताया कि अगर इंटरनेशनल मार्केट में फर्टिलाइजर के दाम बढ़ते हैं, तो इस मद में दी जानी वाली सब्सिडी की रकम और भी बढ़ सकती है.
ईरान युद्ध का असर खेती-किसानी तक, फर्टिलाइजर सब्सिडी पर बढ़ेगा बोझ
पश्चिम एशिया संकट की वजह से यूरिया और डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) जैसे प्रमुख पोषक तत्वों के साथ-साथ अमोनिया, सल्फर, फॉस्फोरिक एसिड और प्राकृतिक गैस जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ गई हैं


विशेषज्ञों ने नियंत्रण हटाने या सीमित स्तर पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है. पश्चिम एशिया संकट की वजह से यूरिया और डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) जैसे प्रमुख पोषक तत्वों के साथ-साथ अमोनिया, सल्फर, फॉस्फोरिक एसिड और प्राकृतिक गैस जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ गई हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि डॉलर के मुकाबले रुपये की भारी गिरावट ने भी बोझ को और बढ़ा दिया है.
भारत में जितनी डीएपी की खपत होती है उसका करीब 80% विदेशों से खरीदी जाती है. इसी तरह भारत के किसान जितनी यूरिया अपने फसलों में डालते हैं उसका करीब 70 परसेंट विदेशों से आयात किया जाता है. भारत में यूरिया का घरेलू उत्पादन कुल मांग का केवल 30-35% ही है. इससे भारत इन रासायनिक उर्वरकों का सबसे बड़ा आयातक बन गया है.
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सरकार देती है अरबों की सब्सिडीभारत में फर्टिलाइजर लागत मूल्य से कम पर बेचे जाते हैं, ताकि किसान इसे खरीद सकें. सरकार कंपनियों को बिक्री के बाद सब्सिडी देती है. भारतीय अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (ICRIER) के प्रोफेसर अशोक गुलाटी के अनुसार, 'भारत विदेशों से अपनी जरूरत का करीब 68-70 परसेंट उर्वरक आयात करता है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के प्रभावी रूप से बंद होने के कारण सप्लाई में रुकावट आने से यूरिया आयात की लागत कुछ ही हफ्तों में लगभग दोगुनी हो जाने से सरकार पर सब्सिडी का बोझ तेजी से बढ़ गया है.
एक्सपर्ट्स ने उर्वरक की कीमतों को कम करने के फैसले पर भी सवाल उठाए हैं. 25 मई को भारतीय अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद की तरफ से जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, डाई अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) और पोटैशियम युक्त उर्वरकों (एमओपी) की तुलना में यूरिया (नाइट्रोजन) की कीमतें काफी कम होने से फर्टिलाइजरों का इस्तेमाल गैर-कृषि कार्यों में होने लगा है. भारत सरकार यूरिया को उसकी वास्तविक लागत के 10% से भी कम कीमत पर बेचता है.
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