उत्तर प्रदेश के बांदा के चीफ़ जूडिशियल मजिस्ट्रेट (CJM) ने विद्युत विभाग के कर्मचारियों के ख़िलाफ़ FIR दर्ज कराई थी. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उनकी ये FIR ख़ारिज कर दी है और उन्हें फटकारा भी है. हाई कोर्ट के जस्टिस राहुल चतुर्वेदी और जस्टिस मो अज़हर हुसैन इदरीसी का मानना है कि CJM अपने पद का ‘रौब’ दिखाना चाह रहे थे. इसीलिए जानबूझकर झूठी FIR दर्ज करवाई.
डेढ़ लाख के बिल के चक्कर में मजिस्ट्रेट ने की थी FIR, हाई कोर्ट ने उन्हें ही फटकार लगा दी
हाई कोर्ट की बेंच ने माना कि CJM ने निजी हित के लिए पद का गलत इस्तेमाल किया. बिल भेजने पर बिजली विभाग के अफसरों पर फ़र्ज़ी केस कराया.
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साथ ही अदालत ने जजों और मजिस्ट्रेट्स से एक मर्यादित, उदार और सहनशील आचरण बरतने की बात पर ज़ोर दिया.
हुआ क्या था?लाइव लॉ में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़, CJM भगवान दास गुप्ता ने लखनऊ में वंदना पाठक नाम की एक महिला से घर ख़रीदा. फिर उन्होंने बिजली खाता (electricity account) बदलने के लिए अप्लाई किया, तो विद्युत विभाग के कर्मचारियों ने उन्हें बताया कि क़रीब 1,66,916 रुपए का बिल बकाया है. बिल जमा हो, तो ट्रांसफर का प्रोसेस शुरू हो सके. बिल जमा करने के लिए विभाग ने एक नोटिस भी भेजा.
नोटिस देख CJM भगवान दास बिफ़र गए. उन्होंने मकान की मालिक वंदना पाठक, उनके पति और बिजली विभाग के अफ़सरों के ख़िलाफ़ FIR दर्ज़ कराई. IPC की धारा 420 (धोखाधड़ी), 464, 467 (वसीयत आदि की जालसाज़ी), 468, 504 (जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति का अपमान करने या उकसाना), 506 (आपराधिक धमकी) के तहत. मामले की जांच के लिए लखनऊ की ACJM कोर्ट ने SIT टीम गठित की. जांच के आदेश दिए. लंबी क़ानूनी कार्यवाही के बाद कोर्ट ने केस ख़ारिज कर दिया. विद्युत विभाग के कर्मचारी एडिशनल सिविल जज की कोर्ट से बरी हो गए.
CJM गुप्ता इस फ़ैसले से संतुष्ट नहीं थे. सो उन्होंने बांदा कोतवाली में फिर से FIR दर्ज कराई. IPC की धारा 406 (आपराधिक विश्वास घात), 420 (धोखाधड़ी), 419 (प्रतिरूपण द्वारा छल), 464 (मिथ्या दस्तावेज़ बनाने से संबंधित), 386 (किसी व्यक्ति को मृत्यु या गंभीर आघात के चलते ज़बरदस्ती वसूली करना) के तहत. विद्युत विभाग के कर्मचारियों ने इस केस को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी.
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हाई कोर्ट में जस्टिस राहुल चतुर्वेदी और जस्टिस मोहम्मद अज़हर हुसैन इदरीसी की बेंच ने मामले की सुनवाई की. CJM ने बिजली विभाग के अफ़सरों पर घूस मांगने का आरोप लगाया. वहीं, बिजली विभाग के अफ़सरों ने कोर्ट में बताया कि जज ने 2,01,963 रुपए का बिल अब तक भरा नहीं है.
कोर्ट ने भी पूछा कि 14 सालों में CJM ने महज़ 5 हजार रुपए का ही बिजली बिल कैसे जमा किया, तो बोले कि सोलर पावर इस्तेमाल कर रहे हैं.
हाई कोर्ट की बेंच ने माना कि CJM ने निजी हित के लिए पद का गलत इस्तेमाल किया. बिल भेजने पर बिजली विभाग के अफसरों पर फ़र्ज़ी केस कराया. कहा,
ये एक CJM के लिए अशोभनीय है. संबंधित सी.जे.एम. लखनऊ में अपना केस हार गए, तो फिर केस किया. दूसरी बार में उन्होंने कथित कृत्य के लिए याचिकाकर्ताओं के खिलाफ हर तरह के ख़तरनाक़ आरोप लगाए.
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में हिदायत देते हुए कहा कि निचली अदालत का कोई भी जज बिना जिला जज की इज़ाज़त के FIR दर्ज न कराएं. हालांकि, गंभीर मामलों में केस करा सकते हैं.
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