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पर ये अब्दुल उर्फ मुंशी है कौन? और काहे इस पर पिच्चर बन रही है, काहे ये इत्ता फेमस है?
दरअसल मुंशी का असली नाम हाफिज मोहम्मद अब्दुल करीम था. वो झांसी पास ललितपुर में पैदा हुआ था. तब इंडिया में अंग्रेज थे. साल 1863 था. जब अब्दुल 24 का हुआ तो उसकी किस्मत खुल गई. इंडिया की तरफ से दो नौकरों को महारानी को गिफ्ट में दिया गया. उनमें से एक अब्दुल था. 1887 का साल था. मौक़ा था विक्टोरिया के ब्याह के 50 साल होने का. आगरा के कलेक्टर ने खुद इंटरव्यू लेने के बाद उसे विदेश भेजा था.
बाद में वहां जाकर अब्दुल विक्टोरिया का चहेता बन गया. नाम मिला मुंशी. एक साल के अंदर ही वो महारानी को उर्दू और हिन्दी सिखाने लगा. इंडिया वाले मसलों में राय देने लगा. महारानी ने उसको इंडिया सेक्रेटरी बना दिया. इंडिया में जगह-जमीन दी. जहां जातीं उसको साथ में ले जातीं.

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कुछ लोग उससे चिढ़ते भी थे. कहते हैं महारानी उसको चिट्ठी लिखती तो लास्ट में चुम्मी भी बनाती थी. हालांकि कुछ चिट्ठियों में महारानी ने 'तुम्हारी मां' और 'तुम्हारी सबसे खास दोस्त' भी लिखा है, लेकिन उसको लोग हलके में बताते हैं. उसमें इतना रस नहीं आता न. फिर इसका दूसरा वर्जन भी है, प्रिंस अल्बर्ट, रानी के पति जब मरे तब रानी ने उनको अपना पति, करीबी दोस्त मां और पिता बताया था. कहने वाले कहते हैं, ऐसा ही गहरा रिश्ता उनका मुंशी के साथ भी था.

अल्बर्ट, महारानी और नौ बच्चे source- marefa
कुछ उसको महारानी का लास्ट लव कहते हैं. विक्टोरिया तो उसको नाइट की उपाधि भी देने वालीं थीं. पर बीच में कोई पेंच अड़ा दिया. दे नहीं पाई. जॉन ब्राउन करके एक बंदा था. स्कॉटिश था. 1861 में प्रिंस अल्बर्ट जब मरे तब से खूब खास था विक्टोरिया का. लेकिन मुंशी उससे भी खास निकल गया. महलों में जैसे चोंचले होते हैं, दरबार और राजपरिवार वाले मुंशी से खूब किलसते थे. लेकिन रानी के डर से कुछ कबार नहीं सकते थे उसका.
जब 1901 में महारानी की मौत हुई तब मुंशी के बुरे दिन शुरू हुए. एडवर्ड सप्तम ने नौकरी से निकाल दिया. उनके सारे कागज और चिट्ठियां जो महारानी के साथ संदेश वगैरह थे, सब नष्ट करा दिए. वो वापस आगरा लौट आए. आगरा आने के बाद अब्दुल करीम, बाग फरजाना में उनको मिली जमीन पर लॉज बनाकर रहने लगे. 20 अप्रैल 1909 को वहीं चल बसे. 46 बरस की उम्र थी तब सिर्फ. पचकुइया कब्रिस्तान में दफना दिए गए.

मरने के बाद ब्रिटिश सरकार ने पचकुइंयां कब्रिस्तान में उनका मकबरा बना दिया गया. यहां उनकी कब्र पर ब्रिटिश सरकार ने षटकोणीय छतरी भी बनवा दी थी. अब भी वहां सालाना उर्स लगता है. आसपास के लोग आया करते हैं.
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